बाल नोचकर क्यों बनते हैं जैन साधु? जानिए ‘केश लोचन’ का रहस्य और आध्यात्मिक महत्व

punjabkesari.in Tuesday, Apr 07, 2026 - 02:56 PM (IST)

नारी डेस्क:  फेमस यूट्यूबर और पॉडकास्टर रणवीर अल्लाहबादिया के पॉडकास्ट में हाल ही में डॉ. मुनि आदर्श ने जैन भिक्षु बनने और उनके जीवन की कठिन परंतु प्रेरणादायक प्रथाओं के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने खासकर जैन साधुओं के केश लोचन अनुष्ठान पर रोशनी डाली, जो कई लोगों के लिए डरावना लेकिन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

साधु जीवन और त्याग का महत्व

डॉ. मुनि आदर्श ने बताया कि जैन भिक्षु जीवन की सबसे बड़ी विशेषता है सादगी और त्याग। आधुनिक जीवन में लोग आराम और विलासिता के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, लेकिन जैन साधु हर जगह पैदल चलते हैं और हर चीज में सरलता अपनाते हैं। उनका मानना है कि छोटे-छोटे जीवन विकल्प ही आध्यात्मिक जीवन के निर्णायक सिद्धांत बनते हैं।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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केश लोचन अनुष्ठान क्या है?

जैन संन्यासियों की सबसे गहरी और कठिन प्रथाओं में से एक है केश लोचन। इसमें साधु अपने बालों को हाथों से छोटे-छोटे गुच्छों में नोचते हैं। यह बाल काटने जैसी सामान्य प्रक्रिया नहीं है। यह जानबूझकर और प्रतीकात्मक रूप से किया जाता है। कभी-कभी इससे रक्तस्राव भी हो सकता है। केश लोचन का उद्देश्य शरीर की आसक्ति और दिखावे से मुक्ति है। यह दर्शाता है कि शरीर क्षणभंगुर है और असली शक्ति मन में है।

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दर्द से मुक्ति और आध्यात्मिक अनुभव

डॉ. आदर्श के अनुसार, इस अनुष्ठान में होने वाला दर्द असहनीय हो सकता है। यह अचानक लगी चोट की तरह महसूस होता है। फिर भी, अभ्यास करने वाले लोग इसे सहकर मानसिक और आध्यात्मिक रूप से मजबूत बनते हैं। दर्द को सहना साधु को आध्यात्मिक जागरूकता की ऊंचाई तक ले जाता है। वह महसूस करते हैं कि मन की अनुमति से शरीर कहीं ज्यादा सह सकता है। इस प्रक्रिया से साधु भय और शारीरिक सीमाओं से स्वतंत्र हो जाते हैं। 

जैन साधु की सीख

डॉ. आदर्श कहते हैं कि जैन साधुओं के लिए यह अभ्यास सिर्फ खुद को तकलीफ देने के लिए नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता और मानसिक शांति पाने का तरीका है। यह हमें यह सिखाता है कि डर और तकलीफ से भागने की बजाय उनका सामना करना सच्ची आज़ादी और मानसिक शक्ति देता है। जैन साधु इस अनुभव के माध्यम से बाकी लोगों के लिए एक बुनियादी सवाल उठाते हैं: क्या हम अपने डर और शारीरिक सीमाओं के आगे खुद को परिभाषित करते हैं या उनसे ऊपर उठ सकते हैं?
 


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Content Editor

Priya Yadav

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