बॉडी के कौन-कौन से अंग एक बार डैमेज होने के बाद दोबारा ठीक नहीं होते?

punjabkesari.in Saturday, Sep 19, 2026 - 10:46 AM (IST)

नारी डेस्क:  हमारे शरीर में चोट लगने पर कई हिस्से अपने आप ठीक होने लगते हैं। त्वचा पर कट या खरोंच आए तो कुछ समय बाद नई त्वचा बन जाती है। इसी तरह शरीर के कुछ अंगों में भी खुद को रिपेयर करने की क्षमता होती है। लेकिन हर अंग ऐसा नहीं कर पाता। कुछ अंगों और टिश्यूज में अगर बहुत ज्यादा या स्थायी नुकसान हो जाए, तो शरीर उन्हें पहले जैसी स्थिति में पूरी तरह वापस नहीं ला पाता। इसका मतलब यह नहीं है कि हर ऐसी चोट के बाद अंग काम करना बंद कर देता है। कई बार शरीर बचे हुए स्वस्थ हिस्से की मदद से काम चलाता है और इलाज व रिहैबिलिटेशन से व्यक्ति की स्थिति में काफी सुधार भी हो सकता है। लेकिन जिस टिश्यू की स्थायी क्षति हो चुकी है, उसे बिल्कुल पहले जैसा बना पाना आज भी मेडिकल साइंस के लिए बड़ी चुनौती है।

दिल की मांसपेशियों को हुआ नुकसान

दिल हमारे शरीर का सबसे जरूरी अंग है, जो लगातार खून को पूरे शरीर में पंप करता रहता है। इसकी मांसपेशियों की कोशिकाओं को कार्डियोमायोसाइट्स कहा जाता है। जब हार्ट अटैक के दौरान दिल के किसी हिस्से में लंबे समय तक खून और ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, तो वहां की कई कार्डियोमायोसाइट्स मर सकती हैं। वयस्क इंसान के दिल में इन कोशिकाओं को बड़े पैमाने पर दोबारा बनाकर खोई हुई मांसपेशी को पहले जैसा कर देने की क्षमता बहुत सीमित होती है। इसके बजाय चोट वाली जगह पर फाइब्रस या स्कार टिश्यू बन सकता है। इसका असर दिल की पंप करने की क्षमता पर पड़ सकता है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हार्ट अटैक के बाद दिल काम करना बंद कर देता है। सही समय पर इलाज, दवाएं, जीवनशैली में बदलाव और कार्डियक रिहैबिलिटेशन से बचे हुए स्वस्थ हार्ट टिश्यू की कार्यक्षमता को बनाए रखने में मदद मिल सकती है। दिल की मांसपेशियों को बड़े स्तर पर दोबारा बनाना अभी भी शोध का महत्वपूर्ण विषय है। वैज्ञानिक इस बात पर लगातार काम कर रहे हैं कि खराब हो चुकी हार्ट मसल्स की बेहतर तरीके से मरम्मत कैसे की जाए।

दिमाग के न्यूरॉन्स की क्षति

दिमाग में अरबों न्यूरॉन्स होते हैं, जो शरीर के अलग-अलग हिस्सों तक संदेश पहुंचाने और उनसे जानकारी लेने का काम करते हैं। वयस्क इंसान के सेंट्रल नर्वस सिस्टम यानी दिमाग और स्पाइनल कॉर्ड के न्यूरॉन्स में चोट के बाद दोबारा सामान्य तरीके से जुड़ने और अपने पुराने कनेक्शन बनाने की क्षमता बहुत सीमित होती है। इसी वजह से ब्रेन स्ट्रोक, गंभीर सिर की चोट या दूसरी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के बाद कुछ लोगों में लंबे समय तक परेशानी बनी रह सकती है। हालांकि, यहां एक जरूरी बात समझना भी जरूरी है। ब्रेन डैमेज के बाद सुधार बिल्कुल असंभव नहीं होता। दिमाग में न्यूरोप्लास्टिसिटी यानी खुद को कुछ हद तक ढालने और बचे हुए न्यूरल नेटवर्क के जरिए नए तरीके से काम करने की क्षमता होती है। इसी वजह से फिजियोथेरेपी, स्पीच थेरेपी और दूसरी रिहैबिलिटेशन तकनीकों से कुछ मरीजों में कार्यक्षमता में सुधार हो सकता है। लेकिन मृत न्यूरॉन्स और पुराने कनेक्शन को हूबहू वापस बना देना अभी संभव नहीं है।

रीढ़ की हड्डी की नसों को नुकसान

स्पाइनल कॉर्ड यानी रीढ़ की हड्डी हमारे दिमाग और शरीर के बीच संदेश पहुंचाने वाली मुख्य व्यवस्था का हिस्सा है। इसमें गंभीर चोट लगने पर नसों के कनेक्शन को पहले जैसा बनाना बेहद मुश्किल होता है। वयस्क सेंट्रल नर्वस सिस्टम के क्षतिग्रस्त एक्सॉन सामान्य तौर पर खुद से दोबारा लंबी दूरी तक नहीं बढ़ पाते। चोट के बाद बनने वाला वातावरण भी नए कनेक्शन बनने में रुकावट डालता है। इसी कारण स्पाइनल कॉर्ड इंजरी के बाद कुछ लोगों में हाथ-पैरों की कमजोरी, चलने में परेशानी या शरीर के किसी हिस्से की संवेदना में बदलाव जैसी समस्याएं लंबे समय तक रह सकती हैं। फिर भी रिहैबिलिटेशन से शरीर के बचे हुए नर्व नेटवर्क को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने और कुछ कार्यक्षमता वापस पाने में मदद मिल सकती है। इसलिए स्पाइनल कॉर्ड इंजरी में इलाज के साथ फिजियोथेरेपी और नियमित रिहैबिलिटेशन भी महत्वपूर्ण होते हैं।

कार्टिलेज को नुकसान भी आसानी से ठीक नहीं होता

कार्टिलेज हमारे शरीर का लचीला टिश्यू है, जो खासकर जोड़ों में हड्डियों के बीच कुशन की तरह काम करता है। घुटने, कूल्हे और दूसरे जोड़ों में मौजूद कार्टिलेज हड्डियों को आपस में सीधे रगड़ने से बचाता है। समस्या यह है कि आर्टिकुलर कार्टिलेज में खुद को ठीक करने की क्षमता काफी कम होती है। इसका एक बड़ा कारण इसकी सीमित ब्लड सप्लाई है। छोटे या कुछ खास तरह के नुकसान में शरीर कुछ हद तक रिपेयर कर सकता है, लेकिन गहरी या बड़ी क्षति अपने आप पहले जैसी नहीं बनती। इसी वजह से कार्टिलेज का नुकसान बढ़ने पर जोड़ों में दर्द, अकड़न और चलने-फिरने में परेशानी हो सकती है। ऑस्टियोआर्थराइटिस में कार्टिलेज का धीरे-धीरे घिसना इसका आम उदाहरण है।

किडनी के नेफ्रॉन दोबारा नहीं बनते

किडनी में मौजूद नेफ्रॉन खून को फिल्टर करने वाली छोटी-छोटी कार्यात्मक इकाइयां हैं। एक बार वयस्क इंसान में पूरा नेफ्रॉन नष्ट हो जाए तो शरीर नया नेफ्रॉन नहीं बना पाता। हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि किडनी की हर चोट स्थायी होती है। किडनी की नलिकाओं की कुछ कोशिकाएं हल्की या मध्यम चोट के बाद खुद को रिपेयर कर सकती हैं। बचे हुए नेफ्रॉन भी अतिरिक्त काम करके किडनी की कार्यक्षमता को कुछ हद तक संभाल सकते हैं।
लेकिन अगर लंबे समय तक बीमारी या गंभीर नुकसान के कारण बड़ी संख्या में नेफ्रॉन नष्ट हो जाएं, तो खोई हुई संरचना को पहले जैसा बनाना संभव नहीं होता।

फेफड़ों के मामले में तस्वीर थोड़ी अलग है

फेफड़ों को उन अंगों की सूची में सीधे-सीधे रखना सही नहीं होगा जिनके टिश्यू “एक बार डैमेज होने पर कभी ठीक नहीं होते।” फेफड़ों में कुछ हद तक रिपेयर और रीजेनेरेशन की क्षमता मौजूद है। रिसर्च में ऐसे सेल्स की पहचान हुई है जो चोट के बाद फेफड़ों के टिश्यू की मरम्मत में भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन गंभीर और लंबे समय तक रहने वाली बीमारी, जैसे फेफड़ों में फाइब्रोसिस या एम्फिसीमा, में होने वाला संरचनात्मक नुकसान हमेशा पूरी तरह वापस नहीं आता। इसलिए फेफड़ों की गंभीर क्षति को शुरुआती स्तर पर रोकना बहुत जरूरी होता है।

शरीर की मरम्मत की क्षमता हर अंग में अलग होती है

इन उदाहरणों से यह समझना जरूरी है कि डैमेज, रिपेयर और रीजेनेरेशन एक ही चीज नहीं हैं। किसी अंग की कार्यक्षमता में सुधार हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वहां नष्ट हुआ टिश्यू बिल्कुल पहले जैसा बन गया है। वहीं लिवर शरीर की बेहतर रीजेनेरेशन क्षमता वाले अंगों में शामिल है। लिवर चोट या सर्जरी के बाद अपने आकार और कार्य को काफी हद तक वापस पाने की क्षमता रखता है। इसलिए किसी भी अंग के बारे में यह कहना कि “डैमेज होते ही वह कभी ठीक नहीं हो सकता” सही नहीं होगा। नुकसान कितना हुआ है, किस हिस्से में हुआ है, बीमारी क्या है और इलाज कितनी जल्दी शुरू हुआ इन सभी बातों से रिकवरी पर असर पड़ता है। अगर किसी व्यक्ति को हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, गंभीर सिर या रीढ़ की चोट, किडनी की बीमारी या किसी अन्य गंभीर समस्या के लक्षण हैं, तो घरेलू इलाज या सिर्फ दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से समय पर जांच और इलाज कराना जरूरी है।
   
 


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Content Editor

Priya Yadav

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