Vitamin D Deficiency: भरपूर धूप के बावजूद क्यों हो रही विटामिन D की कमी!
punjabkesari.in Wednesday, Oct 21, 2026 - 05:14 PM (IST)
नारी डेस्क: भारत में साल के ज्यादातर महीनों में धूप निकलती है। ऐसे में आमतौर पर माना जाता है कि यहां रहने वाले लोगों को विटामिन डी की कमी नहीं होनी चाहिए। लेकिन हकीकत इससे अलग है। देश में बड़ी संख्या में लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं। चिंता की बात यह है कि यह समस्या केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों और किशोरों में भी इसका असर देखने को मिल रहा है। विटामिन डी शरीर में कैल्शियम को अवशोषित करने, हड्डियों को मजबूत रखने और मांसपेशियों को सही तरीके से काम करने में मदद करता है। ऐसे में इसकी कमी लंबे समय तक बनी रहे, तो सेहत पर कई तरह से असर पड़ सकता है। सवाल यह है कि जब भारत में इतनी धूप है, तो फिर लोगों के शरीर में विटामिन डी की कमी क्यों हो रही है?
11.6 लाख से ज्यादा टेस्ट में सामने आई विटामिन डी की कमी
मेट्रोपोलिस हेल्थकेयर के अनुसार, जनवरी 2025 से मई 2026 के बीच किए गए 11.6 लाख से अधिक विटामिन डी टेस्ट के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि जांच कराने वाले करीब 10 में से 7 लोगों में विटामिन डी का स्तर कम था या वह पर्याप्त नहीं था। यह आंकड़ा ध्यान खींचने वाला जरूर है, लेकिन इसे पूरी भारतीय आबादी की स्थिति नहीं माना जा सकता। यह जांच कराने वाले लोगों के नतीजों पर आधारित है। इसके बावजूद, यह इस बात की ओर इशारा करता है कि विटामिन डी की कमी को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। रिपोर्ट में बच्चों और किशोरों में भी विटामिन डी का कम स्तर सामने आया। किशोरों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिली। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, जैसे लंबे समय तक घर के अंदर रहना, बाहर खेलने या शारीरिक गतिविधि के लिए कम समय निकालना और भोजन में जरूरी पोषक तत्वों की कमी।

भारत में धूप होने के बाद भी विटामिन डी की कमी क्यों?
शरीर में विटामिन डी बनने की प्रक्रिया में सूरज की पराबैंगनी बी यानी यूवीबी किरणों की अहम भूमिका होती है। जब ये किरणें त्वचा पर पड़ती हैं, तो शरीर विटामिन डी बनाता है। लेकिन केवल धूप वाले देश में रहना पर्याप्त नहीं है। शरीर को कितनी मात्रा में विटामिन डी मिलेगा, यह कई बातों पर निर्भर करता है।
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दिनभर घर या ऑफिस में रहना
आजकल बहुत से लोगों की दिनचर्या ऐसी हो गई है कि वे सुबह घर से निकलते हैं और पूरा दिन ऑफिस, स्कूल या किसी दूसरी बंद जगह पर बिताते हैं। घर लौटते समय अक्सर शाम हो चुकी होती है। इस वजह से उन्हें दिन की प्राकृतिक धूप में बाहर रहने का पर्याप्त मौका नहीं मिल पाता। बच्चों और किशोरों की दिनचर्या में भी बदलाव आया है। बाहर खेलने के बजाय कई बच्चे मोबाइल, कंप्यूटर और दूसरे स्क्रीन उपकरणों पर ज्यादा समय बिताते हैं। इससे उनकी शारीरिक गतिविधियां कम हो सकती हैं और धूप में रहने का समय भी घट जाता है।
सुबह की धूप हमेशा पर्याप्त नहीं होती
बहुत से लोग सेहत के लिए सुबह की सैर करते हैं। यह अच्छी आदत है, लेकिन विटामिन डी बनने के लिहाज से सुबह बहुत जल्दी की धूप हमेशा पर्याप्त नहीं होती। शरीर को विटामिन डी बनाने के लिए यूवीबी किरणों की जरूरत होती है, जिनकी उपलब्धता आमतौर पर दिन चढ़ने के साथ बढ़ती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर व्यक्ति को दोपहर में तेज धूप में ही रहना चाहिए। यूवीबी किरणों की मात्रा मौसम, स्थान, प्रदूषण और दूसरी परिस्थितियों के अनुसार बदलती है। इसलिए धूप में रहने का कोई एक तय समय सभी लोगों के लिए सही नहीं माना जा सकता। जरूरत से ज्यादा धूप लेने से त्वचा को नुकसान भी हो सकता है।
कपड़ों से ढका रहता है शरीर
कई बार लोग बाहर तो जाते हैं, लेकिन उनके शरीर का ज्यादातर हिस्सा कपड़ों से ढका रहता है। ऐसे में त्वचा तक पहुंचने वाली यूवीबी किरणों की मात्रा कम हो सकती है। त्वचा का रंग और व्यक्ति की उम्र जैसे कारक भी शरीर में विटामिन डी बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं।
खानपान में जरूरी पोषक तत्वों की कमी
विटामिन डी के प्राकृतिक खाद्य स्रोत सीमित हैं। अगर भोजन में इसके स्रोत शामिल नहीं हैं, तो शरीर की जरूरत पूरी करना मुश्किल हो सकता है। फोर्टिफाइड यानी विटामिन डी मिलाकर तैयार किए गए खाद्य पदार्थ, अंडे की जर्दी और तैलीय मछलियां इसके कुछ स्रोत हैं। शाकाहारी लोग अपनी जरूरत के अनुसार फोर्टिफाइड दूध और अन्य खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल कर सकते हैं। वायु प्रदूषण और मौसम की स्थिति भी त्वचा तक पहुंचने वाली यूवीबी किरणों को प्रभावित कर सकती है। हालांकि, विटामिन डी की कमी को केवल एक वजह से जोड़ना सही नहीं है। किसी व्यक्ति में इसकी कमी कई कारणों के मेल से हो सकती है।

हड्डियों और मांसपेशियों के लिए क्यों जरूरी है विटामिन डी
विटामिन डी का सबसे महत्वपूर्ण काम शरीर को कैल्शियम अवशोषित करने में मदद करना है। कैल्शियम हड्डियों और दांतों को मजबूत रखने के लिए जरूरी होता है। जब शरीर में लंबे समय तक विटामिन डी की कमी बनी रहती है, तो हड्डियों की सेहत प्रभावित हो सकती है। बच्चों में गंभीर कमी होने पर रिकेट्स नाम की बीमारी हो सकती है। इसमें हड्डियों का सामान्य विकास प्रभावित होता है और वे कमजोर या टेढ़ी हो सकती हैं। वहीं, वयस्कों में विटामिन डी की गंभीर कमी से ऑस्टियोमलेशिया हो सकता है, जिसमें हड्डियां नरम हो जाती हैं। इसके कारण हड्डियों में दर्द और मांसपेशियों में कमजोरी महसूस हो सकती है। विटामिन डी मांसपेशियों के सामान्य कामकाज के लिए भी जरूरी है। खासकर उम्रदराज लोगों में मांसपेशियों की कमजोरी से गिरने का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों और किशोरों के लिए इसका पर्याप्त स्तर महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस उम्र में हड्डियों का विकास तेजी से होता है। हालांकि, हड्डियों को स्वस्थ रखने के लिए केवल विटामिन डी ही काफी नहीं है। पर्याप्त कैल्शियम, संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि भी जरूरी हैं।
क्या केवल धूप लेने से विटामिन डी की कमी दूर हो सकती है
यह जरूरी नहीं है कि रोज धूप में बैठने वाले हर व्यक्ति के शरीर में विटामिन डी का स्तर पर्याप्त हो। शरीर में विटामिन डी बनने की मात्रा इस बात पर निर्भर करती है कि त्वचा को कितनी यूवीबी किरणें मिल रही हैं। इसके अलावा उम्र, त्वचा का रंग, कपड़े, मौसम और दिन के समय का भी असर पड़ता है। इसलिए हर व्यक्ति के लिए धूप में रहने का एक निश्चित समय बताना सही नहीं होगा। बहुत ज्यादा देर तक तेज धूप में रहने से सनबर्न और त्वचा को नुकसान पहुंचने का जोखिम भी रहता है। बेहतर है कि धूप का इस्तेमाल समझदारी से किया जाए और त्वचा को जरूरत से ज्यादा पराबैंगनी किरणों से बचाया जाए। अगर आपको विटामिन डी की कमी होने की आशंका है, तो केवल धूप पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लें। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर खून की जांच के जरिए शरीर में विटामिन डी का स्तर पता कर सकते हैं।
विटामिन डी की कमी दूर करने के लिए क्या खाएं
खानपान में कुछ बदलाव करके विटामिन डी की जरूरत पूरी करने में मदद मिल सकती है। इसके लिए इन विकल्पों पर ध्यान दिया जा सकता है
फोर्टिफाइड दूध और खाद्य पदार्थ: कुछ दूध, डेयरी उत्पादों और अन्य खाद्य पदार्थों में विटामिन डी मिलाया जाता है। इन्हें खरीदते समय पैकेट पर दी गई पोषण संबंधी जानकारी जरूर देखें।
अंडे की जर्दी: अंडे की जर्दी में थोड़ी मात्रा में विटामिन डी पाया जाता है।
तैलीय मछली: सैल्मन, सार्डिन और मैकेरल जैसी मछलियां विटामिन डी के अच्छे स्रोत हो सकती हैं।
संतुलित आहार: हड्डियों की सेहत के लिए विटामिन डी के साथ कैल्शियम और अन्य जरूरी पोषक तत्वों का पर्याप्त मात्रा में मिलना भी जरूरी है।
ध्यान रखें कि केवल भोजन से हर व्यक्ति की विटामिन डी की जरूरत पूरी हो जाए, यह जरूरी नहीं है। खासकर जिन लोगों में इसकी कमी की पुष्टि हो चुकी है, उन्हें डॉक्टर की सलाह के अनुसार आगे का कदम उठाना चाहिए।

क्या विटामिन डी सप्लीमेंट लेना चाहिए
विटामिन डी की कमी होने पर कुछ लोगों को सप्लीमेंट लेने की जरूरत पड़ सकती है। लेकिन बिना जांच या डॉक्टर की सलाह के इसकी गोलियां या ज्यादा मात्रा वाले सप्लीमेंट लेना ठीक नहीं है। विटामिन डी शरीर में वसा के साथ जमा हो सकता है। लंबे समय तक जरूरत से ज्यादा मात्रा लेने पर शरीर में कैल्शियम का स्तर बढ़ सकता है, जिससे मतली, उल्टी, कमजोरी, बार-बार पेशाब आने और किडनी से जुड़ी समस्याओं का खतरा हो सकता है। अगर आपको लंबे समय से हड्डियों में दर्द, मांसपेशियों में कमजोरी या विटामिन डी की कमी से जुड़ी कोई चिंता है, तो डॉक्टर से सलाह लें। केवल इन लक्षणों के आधार पर विटामिन डी की कमी की पुष्टि नहीं की जा सकती, क्योंकि इनके दूसरे कारण भी हो सकते हैं।
विटामिन डी की कमी से बचने के लिए बदलें अपनी दिनचर्या
भारत में धूप की उपलब्धता के बावजूद विटामिन डी की कमी का सामने आना बताता है कि इस समस्या के पीछे केवल मौसम नहीं, बल्कि जीवनशैली और खानपान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बच्चों को बाहर खेलने और शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना, नियमित व्यायाम करना, संतुलित भोजन लेना और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर से सलाह लेना फायदेमंद हो सकता है। खासकर बचपन और किशोरावस्था में हड्डियों की सेहत पर ध्यान देना जरूरी है।
याद रखें, विटामिन डी की कमी का समाधान केवल ज्यादा धूप लेना नहीं है। सही खानपान, संतुलित दिनचर्या और जरूरत के अनुसार चिकित्सकीय सलाह अपनाकर हड्डियों और मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद मिल सकती है।

