क्या है Garba का अर्थ? नवरात्रि में गोल घेरा बनाकर क्यों किया जाता है यह नृत्य

punjabkesari.in Wednesday, Oct 14, 2026 - 11:58 AM (IST)

नारी डेस्क:  नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के साथ गरबा की धूम भी देखने को मिलती है। खासकर गुजरात में इस त्योहार का उत्साह अलग ही नजर आता है। रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े, ढोल की थाप, तालियों की गूंज और गोल घेरा बनाकर नाचते लोग नवरात्रि के माहौल को खास बना देते हैं। अब गरबा सिर्फ गुजरात तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई शहरों में भी इसे बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। आमतौर पर लोग गरबा को एक तरह का डांस मानते हैं, लेकिन इसका धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी है। नवरात्रि के दौरान गरबा को मां दुर्गा यानी देवी शक्ति की आराधना का एक तरीका माना जाता है। इसमें लोग संगीत की लय पर कदम मिलाते हुए गोल घेरे में नृत्य करते हैं। मान्यता है कि यह घेरा जीवन के निरंतर चलते रहने वाले चक्र और देवी शक्ति की निरंतरता का प्रतीक है।

आइए जानते हैं कि गरबा का असली अर्थ क्या है, नवरात्रि में इसका क्या महत्व है और इसे गोल घेरे में ही क्यों किया जाता है।

क्या है गरबा और इसका अर्थ क्या होता है

गरबा गुजरात का पारंपरिक लोकनृत्य है, जिसे खासतौर पर नवरात्रि के दौरान किया जाता है। मान्यता है कि गरबा शब्द संस्कृत के ‘गर्भदीप’ से जुड़ा हुआ है। इसका संबंध मिट्टी के उस घड़े से माना जाता है, जिसके अंदर दीपक जलाया जाता है। इस घड़े में छोटे-छोटे छेद होते हैं, जिनसे दीपक की रोशनी बाहर दिखाई देती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मिट्टी के घड़े को मानव शरीर और उसके अंदर जलने वाले दीपक को आत्मा का प्रतीक माना जाता है। दीपक की रोशनी जीवन और दिव्य ऊर्जा का संदेश देती है। इसी वजह से गरबा को केवल मनोरंजन या नृत्य तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि इसे देवी शक्ति की आराधना से भी जोड़कर देखा जाता है। परंपरागत रूप से नवरात्रि के दौरान महिलाएं घरों और मंदिरों के आंगन में एकत्र होकर देवी की पूजा करती थीं। इसके बाद भक्ति गीत गाते हुए तालियों के साथ गोल घेरा बनाकर गरबा किया जाता था। समय के साथ इस परंपरा में बदलाव आया और अब पुरुष, महिलाएं और युवा सभी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

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नवरात्रि में गरबा खेलने का क्या है धार्मिक महत्व

नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा और उनके नौ स्वरूपों की आराधना के लिए समर्पित है। इन दिनों भक्त पूजा-पाठ, व्रत और भजन-कीर्तन के जरिए मां की उपासना करते हैं। गुजरात में गरबा भी इसी भक्ति का एक खास हिस्सा है। गरबा के दौरान देवी शक्ति की स्तुति में गीत गाए जाते हैं और तालियों के साथ नृत्य किया जाता है। कई जगहों पर देवी की प्रतिमा या तस्वीर के सामने गरबा होता है, जबकि कुछ आयोजनों में बीच में मिट्टी का दीपक या पारंपरिक दीप सजाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि गरबा के जरिए भक्त अपनी श्रद्धा और भक्ति व्यक्त करते हैं। हालांकि, गरबा खेलने का तरीका हर जगह एक जैसा नहीं होता। अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों में इसकी अपनी परंपराएं हैं।

गरबा में गोल घेरा बनाकर ही क्यों नाचते हैं

गरबा की सबसे खास पहचान इसका गोल घेरा है। इसमें सभी लोग एक-दूसरे के साथ ताल मिलाकर गोल आकार में घूमते हैं। नृत्य के दौरान तालियां बजाई जाती हैं और संगीत की लय के अनुसार कदम बदले जाते हैं।इस गोल घेरे को जीवन के चक्र का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह जीवन लगातार आगे बढ़ता रहता है, उसी तरह गरबा का घेरा भी निरंतर घूमता रहता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे देवी शक्ति की निरंतरता से भी जोड़ा जाता है।

गरबा का घेरा लोगों के बीच एकता और सामूहिकता का संदेश भी देता है। इसमें हर व्यक्ति दूसरे के साथ तालमेल बनाकर नृत्य करता है। कोई अकेले नहीं, बल्कि सभी मिलकर एक ही लय में आगे बढ़ते हैं। यही वजह है कि गरबा को सामाजिक मेलजोल और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी माना जाता है। आमतौर पर गरबा की शुरुआत धीमी गति से होती है। जैसे-जैसे ढोल और संगीत की लय तेज होती जाती है, नृत्य के कदम भी तेज होने लगते हैं। यही बदलाव गरबा को और उत्साहपूर्ण बना देता है।

कैसे शुरू हुई गरबा की परंपरा?

गरबा की शुरुआत कब और किस समय हुई, इसकी कोई एक निश्चित तारीख उपलब्ध नहीं है। इसकी परंपरा लंबे समय से गुजरात के लोकजीवन और धार्मिक आयोजनों से जुड़ी रही है। ग्रामीण समुदायों और परिवारों में नवरात्रि के दौरान देवी की पूजा के साथ सामूहिक नृत्य करने की परंपरा रही है। पहले गरबा मुख्य रूप से महिलाओं के बीच लोकप्रिय था। महिलाएं घरों, मंदिरों और मोहल्लों में एकत्र होकर देवी के गीत गाती थीं और पारंपरिक तरीके से नृत्य करती थीं। इस तरह लोकगीतों और नृत्य की परंपरा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही।

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समय के साथ पुरुष भी गरबा में शामिल होने लगे और यह बड़े सामुदायिक आयोजनों का हिस्सा बन गया। गुजरात के कई धार्मिक स्थलों और देवी पूजा की परंपराओं ने भी गरबा की लोकप्रियता को बढ़ाने में भूमिका निभाई। हालांकि, गरबा और रास की परंपराएं अलग-अलग हैं, लेकिन आज कई जगहों पर दोनों नृत्य एक ही आयोजन में देखने को मिलते हैं।

नवरात्रि में गरबा खेलने का सही तरीका क्या है?

गरबा खेलने के लिए किसी खास तरह के प्रशिक्षण की जरूरत नहीं होती। शुरुआत में कुछ आसान कदमों और तालियों के साथ भी इसमें हिस्सा लिया जा सकता है। अगर आप पहली बार गरबा खेलने जा रहे हैं, तो इन बातों का ध्यान रखें।

संगीत की लय समझें: सबसे पहले ढोल या गरबा गीत की ताल पर ध्यान दें। शुरुआत धीमी गति से करें और फिर धीरे-धीरे कदमों की गति बढ़ाएं।

गोल घेरे में शामिल हों: गरबा आमतौर पर गोल घेरे में किया जाता है। दूसरों के साथ उचित दूरी बनाकर चलें, ताकि सभी आसानी से नृत्य कर सकें।

तालियों के साथ कदम मिलाएं: पारंपरिक गरबा में तालियों का खास महत्व है। हाथों की ताल और पैरों के कदमों को संगीत के साथ मिलाने की कोशिश करें।

पारंपरिक कपड़े पहनें: गरबा के दौरान महिलाएं अक्सर चनिया-चोली और पुरुष केडियू जैसे पारंपरिक गुजराती कपड़े पहनते हैं। हालांकि, आरामदायक कपड़े पहनना ज्यादा जरूरी है।

भक्ति और उत्साह के साथ हिस्सा लें: गरबा का उद्देश्य केवल अच्छा डांस करना नहीं है। कई लोग इसे मां दुर्गा की आराधना और सामूहिक उत्सव के रूप में मनाते हैं। इसलिए अपनी श्रद्धा और खुशी के साथ इसमें शामिल हों।

अपनी सुविधा का ध्यान रखें: गरबा में लगातार घूमने और नाचने से थकान हो सकती है। बीच-बीच में पानी पीते रहें और जरूरत पड़ने पर आराम करें।

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गरबा सिर्फ डांस नहीं, गुजरात की सांस्कृतिक पहचान भी है

आज गरबा धार्मिक आस्था के साथ-साथ गुजरात की सांस्कृतिक पहचान का भी अहम हिस्सा बन चुका है। नवरात्रि के दौरान बड़े-बड़े मैदानों और सामुदायिक स्थलों पर गरबा के आयोजन होते हैं। इनमें अलग-अलग उम्र के लोग पारंपरिक पोशाक पहनकर शामिल होते हैं।गरबा लोगों को एक साथ आने, अपनी संस्कृति से जुड़ने और त्योहार का आनंद लेने का अवसर देता है। इसके गीत, संगीत, पारंपरिक कपड़े और नृत्य की शैली गुजरात की लोकपरंपराओं को जीवंत बनाए रखते हैं।

कुल मिलाकर, गरबा नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की आराधना, सामूहिक उत्साह और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ा एक खास लोकनृत्य है। इसके गोल घेरे को जीवन की निरंतरता और देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि नवरात्रि में गरबा का महत्व केवल नृत्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह भक्ति, एकता और उत्सव का संदेश भी देता है।  

 


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Content Editor

Priya Yadav

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