क्या सिगरेट की तरह चीनी खाने से भी हो सकता है कैंसर, जानिए क्या है दोनों का कनेक्शन ?

punjabkesari.in Wednesday, Jul 01, 2026 - 04:35 PM (IST)

नारी डेस्क: कई दशकों तक तंबाकू को पब्लिक हेल्थ के लिए सबसे बड़ा विलेन माना जाता रहा है। सिगरेट के पैकेट पर चेतावनी वाले लेबल लगाए गए और जागरूकता अभियानों में धूम्रपान के खतरनाक नतीजों के बारे में बताया गया। सिगरेट के उलट, चीनी उन चीज़ों में पाई जाती है जिन्हें लोग रोज खाते-पीते हैं। यह ब्रेकफ़ास्ट सीरियल, पैक्ड जूस, बिस्कुट, फ़्लेवर्ड योगर्ट, सॉस, एनर्जी ड्रिंक और यहां तक कि "हेल्दी" बताकर बेचे जाने वाले प्रोडक्ट्स में भी शामिल होती है। इसके आम होने की वजह से, बहुत से लोग शायद ही कभी इस बारे में सोचते हैं कि वे कितनी चीनी खा रहे हैं।

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 तंबाकू से क्यों हो रही है चीनी की तुलना?

डॉक्टर यह नहीं कह रहे हैं कि एक चम्मच चीनी खाना सिगरेट पीने के बराबर है। बात यह है कि ज़्यादा मात्रा में सेवन करने से सालों तक सेहत पर धीरे-धीरे असर पड़ सकता है, और अक्सर तब तक कोई साफ चेतावनी वाले संकेत नहीं मिलते जब तक कि काफ़ी नुकसान न हो चुका हो। दुनिया भर में मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज़, फैटी लिवर की बीमारी और दिल से जुड़ी बीमारियों के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञों द्वारा चीनी की तुलना तंबाकू से करने के सबसे अहम कारणों में से एक कारण हमारे दिमाग से जुड़ा है। जब भी कोई व्यक्ति रिफाइंड चीनी खाता है, तो उसका दिमाग डोपामाइन रिलीज़ करता है। यह एक ऐसा केमिकल है जो खुशी, प्रेरणा और इनाम (रिवॉर्ड) से जुड़ा होता है। इस प्रतिक्रिया से संतुष्टि का अहसास होता है और व्यक्ति को वही व्यवहार बार-बार दोहराने की इच्छा होती है।


बार- बार मीठा खाने का नुकसान

TOI में छपे एक आर्टिकल के मुताबिक चीनी और तंबाकू के बीच सबसे बड़ी समानता यह है कि ये दोनों ही दिमाग के रिवॉर्ड सिस्टम पर असर डालते हैं। दोनों ही डोपामाइन के रिलीज को बढ़ावा देते हैं, जो खुशी, इनाम और प्रेरणा से जुड़ा केमिकल है।  समस्या तब शुरू होती है जब यह चक्र रोज-रोज दोहराया जाता है। ज़्यादा चीनी वाले खाने की चीजाें के बार-बार सेवन से डोपामाइन के प्रति दिमाग की संवेदनशीलता धीरे-धीरे कम हो सकती है। आसान शब्दों में कहें तो, संतुष्टि का वही अहसास पाने के लिए दिमाग ज़्यादा मिठास की मांग करने लगता है। यही एक वजह है कि कई लोगों को डेज़र्ट, मीठे ड्रिंक्स या प्रोसेस्ड स्नैक्स की ज़बरदस्त तलब होती है, भले ही उन्हें शारीरिक रूप से भूख न लगी हो।

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क्या कहता है  WHO?

सालों तक, चीनी को अक्सर "खाली कैलोरी" (empty calories) का स्रोत मानकर नजरअंदाज किया जाता रहा। बहुत ज़्यादा चीनी खाने से शरीर के मेटाबोलिक सिस्टम पर कई तरह से असर पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, जीवन भर फ्री शुगर (free sugar) का सेवन कम करने से मोटापे और दांतों की बीमारियों का खतरा कम हो सकता है।  यह साबित हो चुका है कि स्मोकिंग से कैंसर होता है। चीनी को उस तरह से नहीं देखा जाता, और डॉक्टर इन दोनों की सीधे तौर पर तुलना करने से बचते हैं। हालांकि, रिसर्चर इस बात की जांच कर रहे हैं कि ज़्यादा चीनी वाली डाइट कैसे शरीर में ऐसी स्थितियां पैदा कर सकती है जो कैंसर को बढ़ावा देती हैं। ज़्यादा चीनी खाने से शरीर में 'एडवांस्ड ग्लाइकेशन एंड-प्रोडक्ट्स' (AGEs) और सूजन पैदा करने वाले केमिकल बढ़ते हैं। 


हेल्थ एक्सपर्ट्स ने किया अलर्ट

लंबे समय से यह माना जाता रहा है कि पुरानी सूजन कई बीमारियों, जिनमें कैंसर भी शामिल है, की एक वजह हो सकती है। कैंसर कोशिकाएं भी बढ़ने और फैलने के लिए ग्लूकोज़ का इस्तेमाल ऊर्जा के मुख्य स्रोत के तौर पर करती हैं  इस प्रक्रिया को 'वारबर्ग इफ़ेक्ट' कहा जाता है। अहम बात यह है कि इसका मतलब यह नहीं है कि चीनी से सीधे कैंसर होता है। इंसानी शरीर की बनावट इससे कहीं ज़्यादा जटिल है। हालांकि, रिफ़ाइंड चीनी वाली डाइट से मोटापा और इंसुलिन का स्तर बढ़ सकता है, और इन दोनों का संबंध कई तरह के कैंसर जैसे कोलोरेक्टल, ब्रेस्ट और पैंक्रियाटिक कैंसर  के ज़्यादा जोखिम से जोड़ा गया है। जैसे समाज ने कभी धूम्रपान के लंबे समय में होने वाले नुकसानों को कम करके आंका था, वैसे ही हेल्थ एक्सपर्ट्स को चिंता है कि ज़्यादा रिफाइंड चीनी खाने से सेहत पर पड़ने वाला बुरा असर अब पूरी तरह से सामने आ रहा है।
 


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vasudha

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