रील्स की लत छुड़ाने के लिए किताब पढ़ने पर पैसे देगा सिंगापुर, भारत में भी लागू हो सकता है...

punjabkesari.in Tuesday, Sep 15, 2026 - 02:56 PM (IST)

नारी डेस्क: आज के समय में मोबाइल खोलते ही रील्स और शॉर्ट वीडियो की लंबी फीड सामने आ जाती है। एक वीडियो खत्म होता है और तुरंत दूसरा शुरू हो जाता है। देखते-देखते लोगों का काफी समय इसी में निकल जाता है। ऐसे दौर में सिंगापुर ने लोगों को मोबाइल स्क्रीन से थोड़ा दूर करने और किताबों की ओर वापस लाने के लिए एक अनोखी पहल शुरू करने का फैसला किया है। यहां लोगों को किताब पढ़ने के बदले वर्चुअल कॉइन दिए जाएंगे, जिन्हें बाद में कैश में बदला जा सकेगा।

सिंगापुर में किताब पढ़ने पर मिलेंगे पैसे

सिंगापुर में सितंबर 2026 में एक नई राष्ट्रीय पहल शुरू होने जा रही है। इसके तहत देश में पहली बार National Reading Month का आयोजन किया जा रहा है। इसका उद्देश्य खास तौर पर वयस्कों और वरिष्ठ नागरिकों के बीच पढ़ने की आदत को फिर से बढ़ावा देना है।इस पहल की सबसे खास बात इसका रिवॉर्ड सिस्टम है। रिपोर्ट के मुताबिक, लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अपनी रोजाना की रीडिंग दर्ज करेंगे और इसके बदले उन्हें वर्चुअल कॉइन मिलेंगे। यानी किताब पढ़ने से सिर्फ जानकारी और ज्ञान ही नहीं मिलेगा, बल्कि एक छोटा आर्थिक इनाम भी मिलेगा।

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15 मिनट पढ़ने पर मिलेंगे 20 कॉइन

इस योजना के तहत अगर कोई व्यक्ति कम से कम 15 मिनट तक किताब पढ़ता है, तो उसे एक दिन में 20 वर्चुअल कॉइन मिलेंगे। हालांकि, एक दिन में सिर्फ एक रीडिंग सेशन के लिए ही कॉइन दिए जाएंगे। इन कॉइन्स को बाद में नकद राशि में बदला जा सकेगा। 1,000 वर्चुअल कॉइन के बदले 1 सिंगापुर डॉलर मिलेगा, जिसकी भारतीय मुद्रा में कीमत करीब 76 रुपये है। जाहिर है, इस योजना से कोई बड़ी कमाई नहीं होने वाली, लेकिन इसका मकसद पैसे कमाना नहीं बल्कि लोगों को रोजाना पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना है।

रील्स के दौर में किताबों की वापसी

सिंगापुर का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है, जब स्मार्टफोन और शॉर्ट वीडियो लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। रील्स की खासियत ही यही है कि कुछ सेकंड में नया कंटेंट सामने आ जाता है। एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा और फिर तीसरा वीडियो शुरू हो जाता है। इसके उलट किताब पढ़ने के लिए ज्यादा समय तक एक जगह ध्यान लगाना पड़ता है। पढ़ते समय व्यक्ति को धैर्य रखना पड़ता है और लगातार उसी कंटेंट पर फोकस करना होता है। यही वजह है कि सिंगापुर की यह पहल सिर्फ पढ़ने की आदत बढ़ाने की कोशिश नहीं, बल्कि लोगों के स्क्रीन टाइम और ध्यान को लेकर भी एक दिलचस्प प्रयोग मानी जा रही है।

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पहले भी पढ़ने को बढ़ावा देता रहा है सिंगापुर

सिंगापुर में पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए पहले भी कई पहल की जा चुकी हैं। National Reading Movement के जरिए लोगों को किताबों से जोड़ने की कोशिश होती रही है। अब National Reading Month और रिवॉर्ड सिस्टम के जरिए इस कोशिश को एक नया तरीका दिया जा रहा है। खास बात यह है कि इस अभियान में वयस्कों और वरिष्ठ नागरिकों पर विशेष ध्यान दिया गया है, ताकि पढ़ने की आदत को सिर्फ बच्चों या छात्रों तक सीमित न रखा जाए।

क्या भारत में भी शुरू हो सकती है ऐसी योजना?

सिंगापुर की पहल के बाद सबसे बड़ा सवाल भारत को लेकर उठता है। भारत में भी स्मार्टफोन और शॉर्ट वीडियो का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। Instagram Reels, YouTube Shorts और दूसरे छोटे वीडियो प्लेटफॉर्म लोगों के खाली समय का बड़ा हिस्सा अपने साथ जोड़ चुके हैं। इसका असर सिर्फ युवाओं तक सीमित नहीं है। अब बच्चे भी किताबों और आउटडोर एक्टिविटीज की तुलना में फोन पर काफी समय बिताते नजर आते हैं। ऐसे में अगर भारत में भी किताब पढ़ने को किसी तरह के रिवॉर्ड से जोड़ा जाए, तो लोगों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, फिलहाल भारत में सिंगापुर जैसी किसी राष्ट्रीय योजना की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत में भी किताब पढ़ने के बदले पैसे या डिजिटल रिवॉर्ड मिलेंगे।

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भारत में कितने लोग देखते हैं रील्स?

भारत में शॉर्ट वीडियो की लोकप्रियता का अंदाजा Meta के एक सर्वे से लगाया जा सकता है। कंपनी ने 33 शहरों में 3,500 से ज्यादा लोगों पर किए गए सर्वे का हवाला देते हुए बताया था कि 95% यूजर्स रोजाना रील्स देखते हैं। वहीं, 92% लोगों ने रील्स को अपना पसंदीदा वीडियो प्लेटफॉर्म बताया।

Meta के मुताबिक, भारत में रील्स की पहुंच टीवी और दूसरे एंटरटेनमेंट मीडिया से भी आगे निकल रही है। ऐसे में सिंगापुर का यह प्रयोग भारत जैसे बड़े और युवा डिजिटल बाजार के लिए भी चर्चा का विषय बन सकता है। फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कुछ मिनट किताब पढ़ने के बदले मिलने वाला छोटा-सा रिवॉर्ड लोगों को मोबाइल स्क्रीन से दूर कर पाएगा या नहीं। अगर यह प्रयोग लोगों की पढ़ने की आदत में सचमुच बदलाव लाता है, तो आने वाले समय में दूसरे देश भी इससे प्रेरणा ले सकते हैं।
   
  


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Content Editor

Priya Yadav

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