आम हल्दी से अलग दिखती है ये नीली हल्दी, जानें सेहत के लिए क्यों है इतनी खास
punjabkesari.in Tuesday, Sep 15, 2026 - 01:02 PM (IST)
नारी डेस्क : आमतौर पर जब हल्दी का नाम आता है तो आंखों के सामने पीले रंग की हल्दी ही आती है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसी हल्दी देखी है, जिसे काटने पर अंदर से नीला या बैंगनी रंग नजर आता है? जी हां, नीली हल्दी भी होती है, जिसे ब्लैक टर्मरिक के नाम से भी जाना जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Curcuma caesia है। यह आम पीली हल्दी की तुलना में काफी दुर्लभ मानी जाती है और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसका इस्तेमाल लंबे समय से किया जाता रहा है। आइए जानते हैं नीली हल्दी आखिर क्या है, कहां मिलती है और इसके बारे में क्या खास माना जाता है।
क्या होती है नीली हल्दी?
नीली हल्दी अदरक परिवार से जुड़ी एक पौधे की प्रजाति है। बाहर से इसकी गांठ भूरे या गहरे कत्थई रंग की दिखाई दे सकती है, लेकिन इसे काटने पर अंदर का रंग नीला, नीला-बैंगनी या गहरा बैंगनी नजर आ सकता है। इसकी यही खासियत इसे आम पीली हल्दी से अलग बनाती है। नीली हल्दी भारत के कुछ हिस्सों में पाई जाती है और इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से पारंपरिक एवं आयुर्वेदिक चिकित्सा में किया जाता रहा है। इसमें मौजूद प्राकृतिक यौगिकों और आवश्यक तेलों के कारण इसे औषधीय महत्व वाला पौधा माना जाता है।

नीली और पीली हल्दी में क्या अंतर है?
पीली हल्दी का इस्तेमाल मुख्य रूप से खाना पकाने, मसाले और पारंपरिक घरेलू नुस्खों में किया जाता है। वहीं नीली हल्दी ज्यादा दुर्लभ है और इसका उपयोग पारंपरिक चिकित्सा, लेप और कुछ हर्बल तैयारियों में किया जाता है। दोनों का रंग और रासायनिक प्रोफाइल भी एक जैसा नहीं होता। इसलिए नीली हल्दी को सिर्फ इसलिए पीली हल्दी का ज्यादा ताकतवर विकल्प मानना सही नहीं है। इनके गुणों और इस्तेमाल में अंतर हो सकता है।
क्यों कहा जाता है ‘ब्लू गोल्ड’?
नीली हल्दी को कई जगहों पर ‘ब्लू गोल्ड’ भी कहा जाता है। इसकी वजह इसका अनोखा रंग, सीमित उपलब्धता और पारंपरिक औषधीय महत्व है। यह आम हल्दी की तरह हर बाजार या किराने की दुकान पर आसानी से उपलब्ध नहीं होती। इसके राइजोम यानी गांठ में विभिन्न प्राकृतिक यौगिक और वाष्पशील तेल पाए जाते हैं।
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सेहत के लिए क्यों खास मानी जाती है?
सूजन और दर्द: नीली हल्दी का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से शरीर में होने वाली सूजन और जोड़ों से जुड़ी तकलीफों में किया जाता रहा है। इसमें मौजूद कुछ प्राकृतिक यौगिकों में एंटी-इंफ्लेमेटरी गतिविधि देखी गई है, लेकिन इंसानों में इसके प्रभाव को लेकर पर्याप्त क्लिनिकल प्रमाण अभी सीमित हैं।
एंटीऑक्सीडेंट गुण: इसमें पाए जाने वाले कुछ बायोएक्टिव कंपाउंड्स एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि दिखाते हैं। एंटीऑक्सीडेंट शरीर को ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाने में भूमिका निभाते हैं।
पाचन से जुड़ा पारंपरिक इस्तेमाल: पारंपरिक चिकित्सा में नीली हल्दी का इस्तेमाल पाचन से जुड़ी कुछ परेशानियों के लिए किया जाता रहा है।
त्वचा के लिए इस्तेमाल: नीली हल्दी का इस्तेमाल कुछ पारंपरिक लेप और हर्बल तैयारियों में किया जाता है।

कहां मिलती है नीली हल्दी?
नीली हल्दी आम पीली हल्दी की तरह हर जगह आसानी से नहीं मिलती। भारत में इसकी खेती और प्राकृतिक उपलब्धता कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में बताई जाती है। इसे कुछ आयुर्वेदिक स्टोर, हर्बल मार्केट, ऑर्गेनिक उत्पाद विक्रेताओं और ऑनलाइन हर्बल स्टोर्स पर देखा जा सकता है। खरीदते समय इसकी सही पहचान और गुणवत्ता का ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि दुर्लभ जड़ी-बूटियों के नाम पर मिलावटी या गलत उत्पाद भी बाजार में हो सकते हैं।
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इस्तेमाल से पहले रखें सावधानी
नीली हल्दी प्राकृतिक जड़ी-बूटी जरूर है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसे हर व्यक्ति बिना किसी सावधानी के इस्तेमाल कर सकता है। इसकी सही मात्रा और सेवन का तरीका व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और अन्य दवाओं पर निर्भर कर सकता है। अगर आप इसे औषधीय उद्देश्य से लेना चाहते हैं या पहले से कोई बीमारी है, तो डॉक्टर या योग्य आयुर्वेद विशेषज्ञ की सलाह लेना बेहतर है।
नोट: नीली हल्दी को किसी गंभीर बीमारी का इलाज या दवा का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए। इसके संभावित स्वास्थ्य लाभों पर वैज्ञानिक प्रमाण अभी सीमित हैं।

