बच्चे के जन्म के बाद क्यों बढ़ जाती है कुछ महिलाओं में उदासी और चिंता? जानें कारण
punjabkesari.in Wednesday, Jul 08, 2026 - 03:45 PM (IST)
नारी डेस्क: मां बनने की खुशी के बीच छिपी हो सकती है मानसिक परेशानी बच्चे का जन्म किसी भी महिला के जीवन का बेहद खास पल होता है। इस दौरान परिवार में खुशी का माहौल रहता है, लेकिन हर नई मां इस समय सिर्फ खुशी और उत्साह ही महसूस करे, ऐसा जरूरी नहीं है। कई महिलाओं को डिलीवरी के बाद अचानक उदासी, घबराहट, डर, थकान और बार-बार रोने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। कई बार इन भावनाओं को लोग सामान्य मूड स्विंग या कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन अगर ये परेशानियां लंबे समय तक बनी रहें और महिला की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगें, तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन (Postpartum Depression) का संकेत हो सकता है।
क्या होता है पोस्टपार्टम डिप्रेशन
पोस्टपार्टम डिप्रेशन बच्चे के जन्म के बाद होने वाली एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या है। यह सिर्फ पहली बार मां बनने वाली महिलाओं को ही नहीं, बल्कि किसी भी महिला को हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, डिलीवरी के बाद शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव, नींद की कमी, शारीरिक थकान, बच्चे की जिम्मेदारियों का दबाव और मानसिक तनाव इसके पीछे बड़ी वजह हो सकते हैं।यह समस्या सामान्य "बेबी ब्लूज" से अलग होती है। बेबी ब्लूज में महिला कुछ दिनों तक भावनात्मक बदलाव महसूस कर सकती है, लेकिन आमतौर पर यह स्थिति अपने आप बेहतर हो जाती है। वहीं, पोस्टपार्टम डिप्रेशन के लक्षण कई हफ्तों या उससे अधिक समय तक बने रह सकते हैं और इसके लिए इलाज की जरूरत पड़ सकती है।

पोस्टपार्टम डिप्रेशन के प्रमुख लक्षण
हर महिला में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन कुछ सामान्य संकेत इस प्रकार हैं लगातार उदासी या खालीपन महसूस होना। बिना किसी स्पष्ट कारण के बार-बार रोना। बच्चे की देखभाल को लेकर अत्यधिक डर या चिंता। किसी भी काम में रुचि न रहना। बहुत ज्यादा थकान महसूस होना। नींद आने में परेशानी या जरूरत से ज्यादा सोना। खुद को बेकार या दोषी महसूस करना। परिवार और लोगों से दूरी बनाने लगना। कुछ गंभीर मामलों में महिला को खुद को नुकसान पहुंचाने या बच्चे को नुकसान पहुंचाने जैसे विचार भी आ सकते हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत विशेषज्ञ की मदद लेना जरूरी होता है।
समय पर इलाज न मिलने पर क्या हो सकता है असर
अगर पोस्टपार्टम डिप्रेशन को नजरअंदाज किया जाए, तो इसका असर सिर्फ मां की मानसिक स्थिति पर ही नहीं, बल्कि बच्चे और पूरे परिवार पर भी पड़ सकता है। मानसिक परेशानी से जूझ रही मां को बच्चे की देखभाल करने में कठिनाई हो सकती है। इसका असर मां और बच्चे के भावनात्मक रिश्ते पर भी पड़ सकता है। गंभीर स्थिति में महिला की मानसिक और शारीरिक सेहत पर लंबे समय तक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
किन महिलाओं में ज्यादा होता है खतरा
कुछ परिस्थितियों में पोस्टपार्टम डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है। इनमें शामिल हैं
पहले से डिप्रेशन या एंग्जायटी की समस्या होना
गर्भावस्था के दौरान ज्यादा तनाव महसूस करना
परिवार या साथी से पर्याप्त सहयोग न मिलना
आर्थिक या पारिवारिक परेशानियां
नींद की लगातार कमी
डिलीवरी से जुड़ी जटिलताएं

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हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि केवल इन्हीं कारणों से यह समस्या होगी। कोई भी नई मां इससे प्रभावित हो सकती है।
पोस्टपार्टम डिप्रेशन से बचाव के लिए क्या करें?
नई मां के लिए शारीरिक आराम के साथ मानसिक देखभाल भी जरूरी है। कुछ आसान कदम इस समस्या से बचाव में मदद कर सकते हैं पर्याप्त नींद लेने की कोशिश करें। परिवार और दोस्तों से मदद लेने में संकोच न करें। अपनी भावनाओं को किसी भरोसेमंद व्यक्ति के साथ साझा करें। पौष्टिक भोजन लें और हल्की शारीरिक गतिविधि करें। खुद पर हर समय परफेक्ट मां बनने का दबाव न डालें। अगर पहले मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी कोई समस्या रही है, तो डॉक्टर को इसकी जानकारी दें।
परिवार का सहयोग निभाता है बड़ी भूमिका
पोस्टपार्टम डिप्रेशन से जूझ रही महिला को सबसे ज्यादा जरूरत समझ और भावनात्मक सहारे की होती है। परिवार के लोगों को उनके व्यवहार में बदलाव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। नई मां को "कमजोर" या "ज्यादा सोचने वाली" कहने के बजाय उनकी बात ध्यान से सुननी चाहिए और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ तक पहुंचने में मदद करनी चाहिए। समय पर मिला सहयोग और सही इलाज महिला को इस स्थिति से बाहर आने में काफी मदद कर सकता है।
क्या पोस्टपार्टम डिप्रेशन सिर्फ महिलाओं को होता है
आमतौर पर यह समस्या नई मांओं में ज्यादा देखी जाती है, लेकिन कुछ मामलों में पिता भी बच्चे के जन्म के बाद मानसिक तनाव या डिप्रेशन का सामना कर सकते हैं। बच्चे के जन्म के बाद जीवन में आने वाले बड़े बदलाव दोनों माता-पिता को प्रभावित कर सकते हैं।
क्या यह समस्या अपने आप ठीक हो सकती है
कुछ हल्के मामलों में स्थिति समय के साथ बेहतर हो सकती है, लेकिन अगर उदासी, चिंता या अन्य लक्षण लगातार बने रहें या बढ़ने लगें, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। सही समय पर पहचान और उपचार मिलने से ज्यादातर महिलाएं इस समस्या से बेहतर तरीके से बाहर आ सकती हैं।

डिस्क्लेमर- यह लेख केवल सामान्य स्वास्थ्य जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

