शोध में खुलासा! गांवों में बच्चों की जिंदगी पर भारी पड़ रहा परिवार का टूटना

punjabkesari.in Monday, Jun 22, 2026 - 01:32 PM (IST)

नारी डेस्क:  देश में जहां एक ओर तलाक के मामलों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है, वहीं दूसरी ओर बच्चों पर इसके प्रभाव को लेकर एक गंभीर अध्ययन सामने आया है। भारतीय शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जिन छोटे बच्चों के माता-पिता का तलाक हो जाता है या जिनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाती है, उनमें मृत्यु का खतरा सामान्य बच्चों की तुलना में लगभग दोगुना हो जाता है। यह इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेज, मुंबई के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक विस्तृत विश्लेषण के आधार पर सामने आया है।

2.32 लाख बच्चों के आंकड़ों का अध्ययन

शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए करीब 2.32 लाख बच्चों के डेटा का विश्लेषण किया, जो विभिन्न सामाजिक और पारिवारिक परिस्थितियों से गुजर चुके थे। रिपोर्ट में पाया गया कि ऐसे बच्चों में मृत्यु दर 62 प्रति हजार तक पहुंच जाती है, जबकि सामान्य परिस्थितियों में यह दर लगभग 34 प्रति हजार के आसपास रहती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह अंतर इस बात की ओर इशारा करता है कि पारिवारिक टूटन बच्चों के स्वास्थ्य और जीवन पर गहरा असर डाल सकती है।

PunjabKesari

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति अधिक गंभीर

अध्ययन में यह भी सामने आया कि शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में बच्चों पर इसका असर अधिक गंभीर दिखाई देता है। स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित उपलब्धता, आर्थिक दबाव और सामाजिक अस्थिरता जैसे कारण ग्रामीण बच्चों की स्थिति को और कमजोर बनाते हैं।

शिशु मृत्यु दर और यू-5-एमआर क्या है

रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में शिशु मृत्यु दर (Infant Mortality Rate - IMR) को प्रति 1000 जन्मों के आधार पर मापा जाता है। इसके अलावा पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर को अंडर-5 मॉर्टेलिटी रेट (U-5 MR) कहा जाता है। ये दोनों संकेतक किसी भी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक स्थिति को समझने में अहम भूमिका निभाते हैं।

ये भी पढ़ें:  बच्चन परिवार नहीं, भाई-भाभी के भी बेहद करीब हैं ऐश्वर्या राय, जानिए क्या करते हैं उनके बड़े भाई

धर्म और सामाजिक वर्ग के आधार पर अंतर

अध्ययन में यह भी सामने आया कि तलाक के बाद बच्चों की स्थिति सभी समुदायों में समान नहीं रहती। रिपोर्ट के अनुसार, मुस्लिम परिवारों में तलाक के बाद शिशु मृत्यु दर 94 प्रति हजार तक पहुंच गई, जो सबसे अधिक है। वहीं हिंदू परिवारों में यह दर 51 प्रति हजार दर्ज की गई। ईसाई समुदाय में यह दर 21 प्रति हजार और सिख समुदाय में 64 प्रति हजार पाई गई। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि इन आंकड़ों के पीछे के कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं और इसके लिए और गहन अध्ययन की आवश्यकता है।

PunjabKesari

सामाजिक वर्गों में भी दिखा फर्क

सामाजिक वर्गों के आधार पर विश्लेषण में पाया गया कि अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग में तलाक के बाद बच्चों पर अपेक्षाकृत कम असर दिखा, जहां मृत्यु दर 41 प्रति हजार दर्ज की गई। इसके बाद ओबीसी वर्ग में 48, सामान्य वर्ग में 56 और अनुसूचित जाति (SC) में 62 प्रति हजार का आंकड़ा सामने आया। दिलचस्प बात यह है कि सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु दर का क्रम इससे अलग दिखाई देता है।

तलाक के मामलों में लगातार बढ़ोतरी

आंकड़ों के अनुसार, देश में तलाक की दर लगभग 1 प्रतिशत के आसपास मानी जाती है, हालांकि कई मामलों के दर्ज न होने के कारण वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाती। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम 2024 के मुताबिक, देश में लगभग 3.5 प्रतिशत लोग तलाकशुदा हैं। केरल, तमिलनाडु और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में यह दर 6 से 12 प्रतिशत तक बताई जाती है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है।
 

 
 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Editor

Priya Yadav

Related News

static