श्राद्ध में अंगूठे के पास से ही क्यों दिया जाता है जल? जानें इसके पीछे की मान्यता

punjabkesari.in Wednesday, Sep 16, 2026 - 04:25 PM (IST)

नारी डेस्क: पितृपक्ष में पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की परंपरा है। इस दौरान श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। तर्पण करते समय जल में काले तिल आदि मिलाकर पितरों को अर्पित करने की परंपरा भी कई जगहों पर निभाई जाती है। लेकिन क्या आपने कभी गौर किया है कि पितरों को जल देते समय इसे हथेली या उंगलियों के आगे वाले हिस्से से नहीं, बल्कि अंगूठे के पास से छोड़ा जाता है? धार्मिक मान्यताओं में इसके पीछे एक खास वजह बताई गई है।

2026 में कब से शुरू होगा पितृपक्ष?

पंचांग के अनुसार, 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी। इसकी शुरुआत पूर्णिमा श्राद्ध से मानी जाएगी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। इस दौरान लोग अपने पूर्वजों को उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार याद करते हैं और श्राद्ध, तर्पण व पिंडदान जैसे कर्म करते हैं।

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अंगूठे के पास से ही क्यों दिया जाता है जल?

धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितरों का तर्पण करते समय जल अंगूठे और तर्जनी के बीच के हिस्से से छोड़ा जाता है। हथेली के इस हिस्से को 'पितृ तीर्थ' कहा गया है। इसी वजह से पितरों को जल अर्पित करने का तरीका सामान्य पूजा से अलग माना जाता है। देवताओं को अर्घ्य या जल देते समय उंगलियों के आगे वाले हिस्से का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि पितृ तर्पण में अंगूठे के पास मौजूद इस हिस्से से जल अर्पित करने की परंपरा बताई गई है।

हथेली में बताए गए हैं चार तीर्थ

धार्मिक ग्रंथों और पारंपरिक मान्यताओं में हथेली के अलग-अलग हिस्सों को चार तीर्थों से जोड़ा गया है। इनके आधार पर अलग-अलग प्रकार का तर्पण या अर्पण करने की परंपरा बताई जाती है।

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देव तीर्थ: उंगलियों के सबसे आगे वाले हिस्से को देव तीर्थ माना जाता है। मान्यता है कि देवताओं को जल या अर्घ्य इसी हिस्से से दिया जाता है।

ऋषि तीर्थ: छोटी उंगली यानी कनिष्ठिका के मूल भाग को ऋषि या प्रजापति तीर्थ से जोड़ा गया है। इसी स्थान से ऋषियों के लिए तर्पण करने की मान्यता बताई जाती है।

ब्रह्म तीर्थ: हथेली के नीचे यानी कलाई के पास वाले हिस्से को ब्रह्म तीर्थ कहा गया है।

पितृ तीर्थ: अंगूठे और तर्जनी के बीच के हिस्से को पितृ तीर्थ माना जाता है। पितरों को तर्पण करते समय इसी जगह से जल छोड़ने की परंपरा है।

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पितृपक्ष में तर्पण क्यों किया जाता है?

पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का समय माना जाता है। इस दौरान लोग अपने दिवंगत परिजनों को याद करते हैं और उनकी तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं। तर्पण भी इसी प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, जल अर्पित करके पितरों का स्मरण किया जाता है। कई परिवारों और परंपराओं में जल के साथ काले तिल भी अर्पित किए जाते हैं। इसे पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का एक तरीका माना जाता है।

सर्वपितृ अमावस्या का क्या महत्व है?

पितृपक्ष के आखिरी दिन सर्वपितृ अमावस्या आती है। वर्ष 2026 में यह 10 अक्टूबर को होगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह दिन उन पूर्वजों के लिए खास माना जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं होती या किसी वजह से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो। इस दिन तर्पण, श्राद्ध और दान करने के साथ पूर्वजों का स्मरण करने की परंपरा है। हालांकि, श्राद्ध और तर्पण की विधि अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में कुछ भिन्न हो सकती है, इसलिए अपने कुलाचार या जानकार पंडित की सलाह के अनुसार विधि करना उचित माना जाता है।
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Content Editor

Priya Yadav

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