12 मिनट में ब्रेन ट्यूमर की पहचान करेगा AI सिस्टम, महंगे टेस्ट और लंबे इंतजार की जरूरत नहीं
punjabkesari.in Saturday, Jun 20, 2026 - 10:05 AM (IST)
नारी डेस्क: ब्रेन ट्यूमर दुनिया की सबसे जटिल और गंभीर बीमारियों में से एक माना जाता है। इसकी सही पहचान और प्रकार का पता लगाने में अक्सर डॉक्टरों को काफी समय लग जाता है। कई मामलों में मरीजों को महंगे DNA टेस्ट करवाने पड़ते हैं और रिपोर्ट आने में एक से दो सप्ताह तक का समय लग सकता है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने एक ऐसी नई आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीक विकसित की है, जो महज 12 मिनट में ब्रेन ट्यूमर की पहचान करने और उसके प्रकार का अनुमान लगाने में सक्षम बताई जा रही है। यह नई तकनीक भविष्य में कैंसर की जांच को तेज, सस्ता और अधिक सुलभ बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकती है।
क्या है नया AI सिस्टम
वैज्ञानिकों द्वारा विकसित इस AI मॉडल का नाम Hetairos रखा गया है। हाल ही में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, यह सिस्टम सिर्फ पैथोलॉजी स्लाइड की डिजिटल तस्वीरों का विश्लेषण करके ब्रेन और सेंट्रल नर्वस सिस्टम (CNS) से जुड़े विभिन्न प्रकार के ट्यूमर की पहचान करने का प्रयास करता है। सबसे खास बात यह है कि इसके लिए अतिरिक्त DNA या जीन संबंधी जांच की आवश्यकता नहीं पड़ती। यानी जिन मामलों में पहले महंगे और समय लेने वाले परीक्षण जरूरी माने जाते थे, वहां अब शुरुआती स्तर पर बहुत तेजी से जानकारी हासिल की जा सकती है।

कैसे काम करता है यह AI मॉडल
विशेषज्ञों के अनुसार, Hetairos सामान्य टिश्यू स्लाइड्स में मौजूद उन सूक्ष्म पैटर्न को पहचान सकता है जिन्हें इंसानी आंखें आसानी से नहीं देख पातीं। इसे ऐसे समझा जा सकता है जैसे कोई अनुभवी मैकेनिक केवल इंजन की आवाज सुनकर समस्या का अंदाजा लगा लेता है। उसी तरह यह AI टिश्यू की तस्वीरों में छिपे संकेतों को पढ़कर ट्यूमर के प्रकार का अनुमान लगाता है।
हजारों मरीजों के डेटा पर हुआ परीक्षण
इस तकनीक को विकसित करने के लिए शोधकर्ताओं ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों से एकत्र किए गए बड़े डेटा का उपयोग किया। AI मॉडल को 9,606 मरीजों से प्राप्त 11,000 से अधिक स्लाइड नमूनों पर प्रशिक्षित और परखा गया। ये नमूने चार महाद्वीपों के 11 अलग-अलग चिकित्सा संस्थानों से जुटाए गए थे। शोध के दौरान AI ने 102 प्रकार के ब्रेन और CNS ट्यूमर की पहचान करने की कोशिश की और कई मामलों में उल्लेखनीय परिणाम दिए।
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सटीकता ने विशेषज्ञों को भी चौंकाया
अध्ययन में पाया गया कि AI मॉडल ने 50 से 70 प्रतिशत मामलों में काफी भरोसेमंद भविष्यवाणी की। जिन मामलों में यह आत्मविश्वास के साथ निष्कर्ष तक पहुंचा, वहां इसकी सटीकता लगभग 87 प्रतिशत तक दर्ज की गई। यह परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि ब्रेन ट्यूमर की पहचान कई बार अनुभवी विशेषज्ञों के लिए भी चुनौतीपूर्ण होती है।
अनुभवी डॉक्टरों से भी बेहतर प्रदर्शन
शोध का एक रोचक पहलू यह भी रहा कि जब केवल स्लाइड की तस्वीर देखकर ट्यूमर पहचानने की बात आई, तो Hetairos ने कई अनुभवी न्यूरोपैथोलॉजिस्ट से बेहतर प्रदर्शन किया। अध्ययन में शामिल पांच विशेषज्ञ डॉक्टरों की औसत सटीकता लगभग 30 प्रतिशत रही, जबकि AI मॉडल की सटीकता 68 प्रतिशत तक पहुंच गई। हालांकि वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि इसका अर्थ यह नहीं है कि AI डॉक्टरों की जगह ले लेगा, बल्कि यह उनके निर्णय लेने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में मदद करेगा।

12 दिन की जगह सिर्फ 12 मिनट
पारंपरिक आणविक और DNA आधारित जांचों में अंतिम रिपोर्ट आने में औसतन 10 से 14 दिन तक लग सकते हैं। इसके विपरीत Hetairos एक स्कैन की गई स्लाइड का विश्लेषण करके लगभग 12 मिनट में प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार कर सकता है। इससे मरीजों के इलाज में होने वाली देरी को कम किया जा सकता है और डॉक्टर जल्दी उपचार योजना बना सकते हैं।
छोटे अस्पतालों के लिए भी बन सकता है वरदान
विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक खासतौर पर उन अस्पतालों और चिकित्सा केंद्रों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है, जहां अत्याधुनिक DNA जांच सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे स्थानों पर यह AI सिस्टम शुरुआती स्तर पर ट्यूमर की पहचान का संकेत दे सकता है और डॉक्टरों को आगे की जांच व उपचार की दिशा तय करने में मदद कर सकता है।
डॉक्टरों की जगह नहीं, सहयोगी बनेगा AI
शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि Hetairos का उद्देश्य डॉक्टरों को प्रतिस्थापित करना नहीं है। यह तकनीक एक सहायक उपकरण के रूप में विकसित की गई है, जो विशेषज्ञों को तेजी से और अधिक सटीक निर्णय लेने में मदद करेगी। अंतिम निदान और उपचार का निर्णय हमेशा चिकित्सक ही करेंगे।
कैंसर जांच का भविष्य बदल सकती है तकनीक
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI आधारित तकनीकें कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों की पहचान के तरीके को पूरी तरह बदल सकती हैं। यदि इस तरह की प्रणालियां व्यापक स्तर पर सफल साबित होती हैं, तो मरीजों को तेजी से जांच रिपोर्ट मिल सकेगी, इलाज जल्दी शुरू हो सकेगा और स्वास्थ्य सेवाएं पहले से अधिक सुलभ और किफायती बन सकती हैं।

