''वीनस ऑफ इंडियन सिनेमा'' कहलाती थीं मधुबाला, खूबसूरती को आज भी नहीं दे पाया कोई टक्कर

punjabkesari.in Friday, Feb 23, 2024 - 04:05 PM (IST)

किसी खूबसूरत चेहरे को देखते ही बेसाख्ता मुंह से निकल पड़ता है कि इसे ऊपर वाले ने फुर्सत में बनाया है। हिंदी फिल्मों की सबसे हसीन अदाकारा मधुबाला के बारे में बेशक यह बात कही जा सकती है। उन्होंने हर तरह की फिल्मों में अपनी खूबसूरती और अदाकारी का जलवा बिखेरा।  उन्हें उनकी खूबसूरती के चलते ‘वीनस ऑफ हिंदी सिनेमा'  भी कहा जाता था। फिल्मी दुनिया में मधुबाला का सफर बेशक बहुत छोटा रहा  लेकिन उन्हें चाहने वालों की लिस्ट बहुत लंबी है। 

PunjabKesari
मधुबाला .मूल नाम.मुमताज बेगम देहलवी. का जन्म दिल्ली में 14 फरवरी 1933 को हुआ था। उनके पिता अताउल्लाह खान में रिक्शा चलाया करते थे। तभी उनकी मुलाकात एक नजूमी (भविष्यवक्ता) कश्मीर वाले बाबा से हुयी जिन्होंने भविष्यवाणी की कि मधुबाला बड़ी होकर बहुत शोहरत पाएगी। इस भविष्यवाणी को अताउल्लाह खान ने गंभीरता से लिया और वह मधुबाला को लेकर मुंबई आ गये।  वर्ष 1942 में मधुबाला को बतौर बाल कलाकार ..बेबी मुमताज..के नाम से फिल्म बसंत में काम करने का मौका मिला। बेबी मुमताज के सौंदर्य से अभिनेत्री देविका रानी काफी मुग्ध हुयी और उन्होंने उनका नाम ‘मधुबाला' रख दिया। उन्होंने मधुबाला से बॉम्बे टाकीज की फिल्म‘ज्वार भाटा'में दिलीप कुमार के साथ काम करने की पेशकश भी कर दी। लेकिन मधुबाला उस फिल्म में किसी कारणवश काम नही कर सकी।

 

फिल्म ‘नीलकमल' से मिली पहचान

‘ज्वारभाटा' हिंदी की महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक है। इसी फिल्म से अभिनेता दिलीप कुमार ने अपने सिने कैरियर की शुरूआत की थी। मधुबाला को फिल्म अभिनेत्री के रूप में पहचान निर्माता निर्देशक केदार शर्मा की वर्ष 1947 मे प्रदर्शित फिल्म ‘नीलकमल' से मिली। इस फिल्म में उनके अभिनेता थे‘राजकपूर‘। नील कमल बतौर अभिनेता राजकपूर की पहली फिल्म थी। भले हीं फिल्म नीलकमल सफल नही रही लेकिन इससे मधुबाला ने बतौर अभिनेत्री अपने सिने कैरियर की शुरूआत कर दी। वर्ष 1949 तक मधुबाला की कई फिल्में प्रदर्शित हुयी लेकिन इनसे उन्हें कुछ खास फायदा नहीं हुआ। 

PunjabKesari

अपने दम पर पहुंची शोहरत की बुंलदियों पर

वर्ष 1949 में बांबे टॉकीज के बैनर तले बनी निर्माता अशोक कुमार की फिल्म ‘महल' मधुबाला के सिने कैरियर में महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुयी। रहस्य और रोमांच से भरपूर यह फिल्म सुपरहिट रही और इसी के साथ बॉलीवुड में. हॉरर और सस्पेंस. फिल्मों के निर्माण का सिलसिला चल पड़ा। फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने नायिका मधुबाला के साथ ही निर्देशक कमाल अमरोही और गायिका लता मंगेशकर को भी फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया। वर्ष 1950 से 1957 तक का वक्त मधुबाला के सिने कैरियर के लिये बुरा साबित हुआ। इस दौरान उनकी कई फिल्में असफल रही। लेकिन वर्ष 1958 मे फागुन, हावडा ब्रिज, कालापानी तथा चलती का नाम गाड़ी जैसी फिल्मों की सफलता के बाद मधुबाला एक बार फिर से शोहरत की बुंलदियो तक जा पहुंची। 

 

 दिलीप कुमार पर दिल हार बैठी थी मधुबाला

फिल्म हावडाब्रिज में मधुबाला ने क्लब डांसर की सटीक भूमिका अदा करके दर्शकों का मन मोह लिया। इसके साथ ही वर्ष 1958 मे हीं प्रदर्शित फिल्म चलती का नाम गाड़ी में उन्होंने अपने अभिनय से दर्शकों को हंसाते-हंसाते लोटपोट कर दिया। मधुबाला के सिने कैरियर मे उनकी जोडी अभिनेता दिलीप कुमार के साथ काफी पसंद की गयी। फिल्म‘तराना'के निर्माण के दौरान मधुबाला दिलीप कुमार से मोहब्बत करने लगी।उन्होंने अपने ड्रेस डिजाइनर को गुलाब का फूल और एक खत देकर दिलीप कुमार के पास इस संदेश के साथ भेजा कि यदि वह भी उनसे प्यार करते हैं तो इसे अपने पास रख लें। दिलीप कुमार ने फूल और खत दोनों को सहर्ष स्वीकार कर लिया।     

PunjabKesari

पिता के कारण टूटा दिल

 बी आर चोपड़ा की फिल्म नया दौर में पहले दिलीप कुमार के साथ नायिका की भूमिका के लिये मधुबाला का चयन किया गया और मुंबई में ही इस फिल्म की शूटिंग की जानी थी। लेकिन बाद मे फिल्म के निर्माता को लगा कि इसकी शूटिंग भोपाल में भी जरूरी है। मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान ने बेटी को मुंबई से बाहर जाने की इजाजत देने से इंकार कर दिया। उन्हें लगा कि मुंबई से बाहर जाने पर मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच का प्यार परवान चढ़ेगा और वह इसके लिए राजी नही थे। बाद में बी आर चोपड़ा को मधुबाला की जगह वैजयंतीमाला को लेना पड़ा। अताउल्लाह खान बाद में इस मामले को अदालत में ले गये और इसके बाद उन्होंने मधुबाला को दिलीप कुमार के साथ काम करने से मना कर दिया। यहीं से दिलीप कुमार और मधुबाला की जोड़ी अलग हो गयी। 

 

दुनिया से छुपाए रखी अपनी बीमारी

पचास के दशक मे स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान मधुबाला को अहसास हुआ कि वह हृदय की बीमारी से ग्रसित हो चुकी हैं। इस दौरान उनकी कई फिल्में निर्माण के दौर मे थी। उन्हें लगा यदि उनकी बीमारी के बारे मे फिल्म इंडस्ट्री को पता चल जायेगा तो इससे फिल्म निर्माता को नुकसान होगा। इसलिये उन्होंने यह बात किसी को नहीं बतायी। उन दिनों मधुबाला के आसिफ की फिल्म मुगल आजम की शूटिंग में व्यस्त थी। उनकी तबीयत काफी खराब रहा करती थी। मधुबाला अपनी नफासत औरनजाकत को कायम रखने के लिये घर में उबले पानी के सिवाए कुछ नहीं पीती थी। उन्हें जैसमेलर के रेगिस्तान में कुंए और पोखरे का गंदा पानी तक पीना पड़ा। उनकी शरीर पर असली लोहे की जंजीर भी लादी गयी लेकिन उन्होंने ..उफ.. तक नहीं की और फिल्म की शूटिंग जारी रखी। 

PunjabKesari

मधुबाला की इच्छा के लिए किशोर कुमार ने की शादी

मधुबाला का मानना था कि‘अनारकली'के किरदार को निभाने का मौका बार बार नहीं मिलता। वर्ष 1960 में जब मुगले आजम प्रदर्शित हुयी तो फिल्म में उनके अभिनय से दर्शक मुग्ध हो गये। हांलाकि बदकिस्मती से इस फिल्म के लिये मधुबाला को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्म फेयर पुरस्कार नहीं मिला लेकिन सिने दर्शक आज भी ऐसा मानते है कि वह उस वर्ष फिल्म फेयर पुरस्कार की हकदार थीं। साठ के दशक में मधुबाला ने फिल्मों मे काम करना काफी कम कर दिया था। चलती का नाम गाड़ी और झुमरू के निर्माण के दौरान ही मधुबाला किशोर कुमार के काफी करीब आ गयी थीं। उनके पिता ने किशोर कुमार को सूचित किया कि मधुबाला इलाज के लिये लंदन जा रही है और वहां से लौटने के बाद ही उनसे शादी कर पायेगी। लेकिन मधुबाला को अहसास हुआ कि शायद लंदन में ऑपरेशन होने के बाद वह जिंदा नहीं रह पाये और यह बात उन्होंने किशोर कुमार को बतायी। इसके बाद मधुबाला की इच्छा पूरा करने के लिये किशोर कुमार ने मधुबाला से शादी कर ली। शादी के बाद उनकी तबीयत और ज्यादा खराब रहने लगी। हांलाकि इस बीच उनकी पासपोटर्,झुमरू,बॉय फ्रेंड,हाफ टिकट और शराबी जैसी कुछ फिल्में प्रदर्शित हुयी। वर्ष 1964 में एक बार फिर से मधुबाला ने फिल्म इंडस्ट्री की ओर रूख किया। लेकिन फिल्म चालाक. के पहले दिन की शूटिंग में मधुबाला बेहोश हो गयीं और बाद मे यह फिल्म बंद कर देनी पड़ी। अपनी दिलकश अदाओं से दर्शको के दिल में खास पहचान बनाने वाली मधुबाला 23 फरवरी 1969 को इस दुनिया को अलविदा कह गयीं। 
 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Writer

vasudha

Recommended News

Related News

static