बांझपन के लिए 50% जिम्मेदार पुरुष, Male infertility के चलते देश में बढ़ा IVF का बिजनेस
punjabkesari.in Thursday, Jul 23, 2026 - 10:58 AM (IST)
नारी डेस्क: भारत एक ऐसे 'साइलेंट' (छिपे हुए) रिप्रोडक्टिव हेल्थ संकट का सामना कर रहा है जिसके बारे में ज़्यादा बात नहीं होती। फर्टिलिटी से जुड़ी समस्याओं से जूझ रहे करोड़ों लोगों में से 40-50% मामलों में पुरुषों से जुड़े कारण ज़िम्मेदार होते हैं एक ऐसी सच्चाई जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। पुरुषों में बांझपन भारत के असिस्टेड रिप्रोडक्शन (सहायक प्रजनन) उद्योग के लिए विकास का एक मुख्य कारण बन रहा है।

तेजी से बढ़ रहा IVF बाजार
यह आंकड़ा उन पुरानी धारणाओं को चुनौती देता है जिनके तहत इनफर्टिलिटी का सारा बोझ मुख्य रूप से महिलाओं पर डाला जाता रहा है। पुरुषों में बांझपन की समस्या कई आधुनिक तनावों के कारण बढ़ रही है। इनमें धूम्रपान और शराब पीने जैसी खराब जीवनशैली की आदतों से लेकर बढ़ता मोटापा, पर्यावरण में मौजूद प्रदूषक और हार्मोनल असंतुलन जैसी चीजें शामिल हैं। फिर भी, सामाजिक शर्म और चुप्पी के कारण समय पर इसकी पहचान और इलाज में रुकावट आती रहती है।इसका सीधा असर (IVF) बाजार पर पड़ रहा है। देश में अभी हर साल लगभग 2,00,000-2,50,000 IVF साइकल होते हैं। उम्मीद है कि 2030 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 4,00,000 हो जाएगी, जिसमें छोटे शहरों का बड़ा योगदान होगा।
एडवांस प्रक्रियाओं की बढ़ रही मांग
बिज़नेस स्टैंडर्ड में छपे एक आर्टिकल में डॉक्टर की तरफ से बताया गया कि पहले, बांझपन के लिए हर चार में से एक मामले में पुरुषों से जुड़े कारण की पुष्टि होती थी। आज बेहतर जागरूकता और खराब स्पर्म काउंट, कम गतिशीलता (मोटिलिटी) और असामान्य स्पर्म मॉर्फोलॉजी जैसी स्थितियों में वास्तविक वृद्धि के कारण यह आंकड़ा हर तीन में से एक के करीब है। जांच और इलाज कराने वाले पुरुषों की संख्या में वृद्धि से परामर्श के तरीकों में बदलाव आ रहा है और इंट्रासाइटोप्लाज्मिक स्पर्म इंजेक्शन (ICSI) जैसी एडवांस प्रक्रियाओं की मांग बढ़ रही है।सालों तक बांझपन की जांच में सबसे पहले महिलाओं पर ध्यान दिया जाता था। अब यह बदल रहा है क्योंकि ज़्यादा जोड़े एक साथ जांच करवा रहे हैं और पुरुष भी जांच के लिए तैयार हो रहे हैं।"

IVF पर होता है इतना खर्च
इंडस्ट्री पर नज़र रखने वालों का कहना है कि कई छोटी IVF चेन में पुरुषों के बांझपन से जुड़ी सलाह, जांच और इलाज से कुल फर्टिलिटी रेवेन्यू का लगभग 40% हिस्सा आता है। दिल्ली की एक IVF फर्म के एक एग्जीक्यूटिव ने बताया कि ICSI का खर्च प्रति साइकिल ₹1.2 लाख से ₹2.5 लाख के बीच हो सकता है, जबकि उम्र और क्लिनिक की जगह के आधार पर सलाह और शुरुआती जांच का खर्च ₹20,000 से ज़्यादा हो सकता है। बांझपन का इलाज किसी एक पार्टनर के बजाय जोड़े के लिए प्लान किया जाता है, जिससे पुरुषों और महिलाओं के बांझपन से होने वाले रेवेन्यू को अलग-अलग करना मुश्किल हो जाता है। ज़्यादातर इलाज के तरीके, जिनमें इंट्रा-यूटेरिन इनसेमिनेशन (IUI) और IVF शामिल हैं, जोड़े की संयुक्त फर्टिलिटी प्रोफ़ाइल के आधार पर डिज़ाइन किए गए हैं।"

