जब Competition में डर जाए बच्चा तो माता-पिता को क्या करना चाहिए? यहां जानिए कुछ आसान टिप्स

punjabkesari.in Wednesday, Jun 03, 2026 - 03:58 PM (IST)

नारी डेस्क: अगर आपका बच्चा कभी स्कूल के खेल दिवस या दौड़ प्रतियोगिता वाले दिन सुबह अड़ियल रवैया अपनाने लगता है, या कक्षा के सामने बोलने से मना कर देता है। तो आप अकेले नहीं हैं जो इस तरह की चिंता से जूझ रहे हैं। कुछ बच्चों में ऐसे अवसर गहरी चिंता और घबराहट पैदा कर देते हैं। उनके मन में सवाल उठते हैं अगर मैं सबसे धीमा निकला तो? अगर सब मुझे ही देख रहे हों तो? अगर मुझसे गलती हो गई तो? माता-पिता के लिए ऐसे समय में यह समझना मुश्किल हो सकता है कि क्या किया जाए। बहुत ज्यादा दबाव डालने पर सुबह का माहौल तनावपूर्ण हो सकता है, जबकि बच्चे को छूट देने पर यह चिंता सताती है कि कहीं उसे चुनौतियों से बच निकलना तो नहीं सिखा रहे। ऐसे में क्या कभी बच्चे की इच्छा के अनुसार चलना ठीक है? और अगली बार उसे कोशिश करने का बेहतर अवसर कैसे दिया जाए?

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डर का सामना करना क्यों जरूरी है

जब हम किसी ऐसी चीज से बचते हैं जिससे हमें डर लगता है, तो तुरंत राहत महसूस होती है। यह राहत बहुत असरदार होती है और हमारे मस्तिष्क को यह संदेश देती है कि बचना कारगर रहा। समय के साथ डर और बढ़ जाता है और उससे बचने की प्रवृत्ति भी मजबूत हो जाती है। यह केवल बच्चों के साथ नहीं, बल्कि हम सभी के साथ होता है। इसीलिए सामान्य तौर पर बच्चों के लिए यह बेहतर होता है कि वे अपने डर का सामना जल्द करें, उससे पहले कि उससे बचने की आदत बन जाए। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि बच्चे को उसकी घबराहट के बावजूद जबरन किसी स्थिति में धकेल दिया जाए। अत्यधिक दबाव उसके मन में यह धारणा और मजबूत कर सकता है कि स्थिति वास्तव में खतरनाक है। इसलिए बच्चे को डर का सामना करने में मदद करना जरूरी है, लेकिन यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके डर की वजह क्या है।


सबसे पहले समझिए कि आखिर क्या है परेशानी 


अगर आपको पहले से अंदेशा है कि कोई मुश्किल दिन आने वाला है, तो बच्चे से पहले ही उसकी भावनाओं के बारे में बात करें। धीरे-धीरे और सहज तरीके से यह समझने की कोशिश करें कि वह वास्तव में किस बात का विरोध कर रहा है। बच्चे हमेशा तुरंत अपने मन की बात शब्दों में नहीं कह पाते, इसलिए उन्हें समय दें। अक्सर आमने-सामने बैठकर बात करने के बजाय सोने से पहले, टहलते समय या साथ गाड़ी में सफर करते हुए ऐसी बातचीत करना ज्यादा आसान होता है। आंखों में सीधा संपर्क न होने पर बच्चों को कठिन भावनाओं के बारे में सोचना और बताना अपेक्षाकृत आसान लगता है। कोशिश करें कि तुरंत यह न कहें, ''सब ठीक हो जाएगा'' या ''चिंता की कोई बात नहीं है''। बच्चे को यह लग सकता है कि उसकी भावनाओं को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। कई बार सिर्फ ध्यान से सुनना ही बच्चे को खुलकर बात करने में मदद करता है।

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उसकी भावना को स्वीकार करें

जब आपको स्थिति की कुछ समझ हो जाए, तो समाधान सुझाने से पहले बच्चे को यह महसूस कराएं कि उसकी भावना स्वाभाविक है। जब बच्चों को लगता है कि उनकी बात सुनी गई है, तब वे समाधान के बारे में सोचने के लिए ज्यादा तैयार होते हैं। आप कह सकते हैं- ''मैं समझ सकता हूं कि यह बात अभी तुम्हें बहुत बड़ी लग रही है। ऐसे में चिंतित होना बिल्कुल स्वाभाविक है।'' इसके बाद कुछ क्षण चुप रहें। संभव है बच्चा रोने लगे। कई बार डर और चिंता को समझने तथा स्वीकार करने की प्रक्रिया का यह भी हिस्सा होता है। यही वह समय होता है जब माता-पिता का मन बच्चे को तुरंत बचाने या ढांढस बंधाने का करता है। लेकिन इसके बजाय उसके साथ बने रहने की कोशिश करें। आप उसे गले लगाकर बस इतना कह सकते हैं, ''यह सचमुच मुश्किल लग रहा है।''


क्या कभी बच्चे की इच्छा के अनुसार चलना ठीक है? 

कुछ परिस्थितियों में हां। अगर बच्चा बहुत ज्यादा परेशान है, तो कभी-कभी एक कदम पीछे हटना उसे दोबारा नियंत्रण महसूस करने में मदद कर सकता है। किसी एक अवसर पर भाग न लेना कोई बड़ी समस्या नहीं है। बच्चों को कुछ चीजें पसंद न हों, यह भी स्वाभाविक है। चिंता तब होती है जब यह एक आदत बन जाए जब बच्चा बार-बार बचने लगे या उन गतिविधियों से भी दूर रहने लगे जिन्हें वह वास्तव में करना चाहता है। अगर वह परेशान किए जाने (बुलिंग) का डर महसूस कर रहा है तो हो सकता है उसके साथ कुछ बुरा अनुभव रहा हो, तो किसी मनोवैज्ञानिक से परामर्श लेना उपयोगी हो सकता है।  कुछ बातें बार-बार दोहराना उपयोगी होता है। पहली बात, हर व्यक्ति का शरीर और मस्तिष्क अलग होता है। कुछ काम किसी को आसानी से आते हैं, तो किसी को नहीं। दूसरी बात, कौशल जन्मजात नहीं बल्कि अभ्यास का परिणाम होता है। तीसरी बात, बच्चों को दूसरों से तुलना करने के बजाय अपने पुराने प्रदर्शन की तुलना खुद से करना सिखाएं।
 


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Content Writer

vasudha

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