भगवान जगन्नाथ का लगाया भोग जिसे आम लोग नहीं खा सकते, बहा दिया जाता जमीन पर
punjabkesari.in Tuesday, Jul 14, 2026 - 08:50 PM (IST)
नारी डेस्क : ओडिशा के पुरी में आयोजित होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा दुनिया के सबसे भव्य धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। इस यात्रा से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विषय हैं। इन्हीं में से एक है 'अधर पाना' का अनुष्ठान। इस परंपरा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा को विशेष पेय का भोग लगाया जाता है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इसके बाद यह प्रसाद भक्तों में वितरित नहीं किया जाता, बल्कि मिट्टी के घड़े को तोड़कर पेय जमीन पर अर्पित कर दिया जाता है। आइए जानते हैं इस अनोखी परंपरा का धार्मिक महत्व।
क्या है अधर पाना?
अधर पाना भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के दौरान होने वाला एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान है। यह अनुष्ठान आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी के दिन किया जाता है। इस अवसर पर मिट्टी के बड़े-बड़े पात्रों में विशेष पेय तैयार किया जाता है और भगवान जगन्नाथ, बलभद्र व सुभद्रा को अर्पित किया जाता है।

कैसे तैयार किया जाता है अधर पाना?
अधर पाना एक पारंपरिक मीठा पेय है, जिसे दूध, पानी, गुड़ या चीनी, केला, तुलसी, कपूर, काली मिर्च, दालचीनी और अन्य पारंपरिक सामग्रियों से तैयार किया जाता है। इस पेय को बड़े मिट्टी के पात्रों में भरकर भगवान के रथ पर अर्पित किया जाता है।
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जमीन पर क्यों बहा दिया जाता है अधर पाना?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान को भोग अर्पित करने के बाद मिट्टी के पात्र को तोड़ दिया जाता है, जिससे पूरा पेय जमीन पर गिर जाता है। मान्यता है कि यह अर्पण उन अदृश्य दिव्य शक्तियों, रक्षक देवताओं और सूक्ष्म जीवों के लिए होता है, जो रथ यात्रा के दौरान भगवान के रथों की रक्षा करते हैं। इसलिए यह प्रसाद श्रद्धालुओं को नहीं दिया जाता।

भक्त इस प्रसाद का सेवन क्यों नहीं करते?
पारंपरिक मान्यता के अनुसार आधार पान पेय भक्तों को पीने की मनाही इसलिए होती है, क्योंकि यह केवल भगवान को समर्पित होता है और जिसके बाद इसे दिखाई न देने वाली शक्तियों के लिए छोड़ दिया जाता है। इसमें भूत-प्रेत, पिशाच और वो देवता शामिल होते हैं, जो रथों की रक्षा करते हैं। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा को लेकर कहा जाता है कि, इसमें सिर्फ इंसान ही नहीं, बल्कि भूत-प्रेत, देवता और नकारात्मक शक्तियां भी शामिल होती हैं। इन्हें शांत रखने के लिए ही आधार पान जमीन पर गिराया जाता है। इसी वजह से इसे न तो भक्तों में बांटा जाता है और न ही इसका सेवन किया जाता है।
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रथ यात्रा में इस परंपरा का महत्व
यह परंपरा आम भोग से बिल्कुल अलग है। अधर पाना का अनुष्ठान रथ यात्रा के अंतिम चरणों में संपन्न होता है। यह एक खास तरह की पूजा पद्धति होती है, जो तीन दिनों तक चलती है। रथ यात्रा के 10वें, 11वें और 12वें दिन इस पेय को मिट्टी के तीन बड़े बर्तनों में भरकर रखा जाता है। इस भोग खास तरह के लोगों द्वारा तैयार किया जाता है, जिन्हें स्थानीय भाषा में महासूरा कहते हैं। यह परंपरा इस विश्वास का प्रतीक मानी जाती है कि भगवान की यात्रा केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि और अदृश्य लोकों के कल्याण से भी जुड़ी है। यही कारण है कि इस भोग को विशेष विधि-विधान के साथ अर्पित किया जाता है।

