बेटी और बहुएं भी कर सकती हैं श्राद्ध, माता सीता ने भी किया था अपने ससुर राजा दशरथ  का पिंडदान

punjabkesari.in Wednesday, Sep 30, 2026 - 06:08 PM (IST)

नारी डेस्क:  सनातन धर्म में पितृ पक्ष के समय को बहुत पवित्र माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दौरान किए जाने वाले तर्पण, पिंड दान और श्राद्ध कर्म से पितृलोक की आत्माओं को शांति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। गरुड़ पुराण में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि किसी भी परिस्थिति में पूर्वजों का श्राद्ध नहीं रोकना चाहिए। यदि पुत्र मौजूद न हो, तो घर की बेटी या बहू भी इस कर्तव्य को पूरा कर सकती हैं। इस बात का प्रमाण रामायण के उस प्रसंग से मिलता है, जब माता सीता ने स्वयं अपने ससुर, अयोध्या के राजा महाराज दशरथ का पिंड दान किया था।

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महाराज दशरथ ने बेटे से बिछड़ने के दुख में त्याग दिए थे प्राण

 वाल्मिकी रामायण में सीता माता द्वारा ससुर राजा दशरथ का श्राद्ध कर्म करने का वर्णन है । शास्त्रों के अनुसार जब श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता वनवास के दौरान दंडकारण्य में रह रहे थे, तब महाराज दशरथ ने राम से बिछड़ने के दुख में अपने प्राण त्याग दिए। समय बीतने पर, जब पितृ पक्ष का शुभ अवसर आया,तो श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी महातीर्थ गया धाम में फल्गु नदी के तट पर पहुंचे। यह स्थान पूर्वजों के तर्पण और पिंडदान के लिए बहुत प्रसिद्ध है। कथा के अनुसार, श्री राम और लक्ष्मण श्राद्ध की तैयारी के लिए ज़रूरी सामग्री लाने शहर की ओर गए और माता सीता तट पर ही उनकी प्रतीक्षा करने लगीं।


राजा दशरथ ने स्वीकार किया पिंडदान

समय बीतता गया, लेकिन भगवान राम और लक्ष्मण वापस नहीं आए। इस बीच, पिंड दान का शुभ समय भी निकलता जा रहा था। । ब्राह्मण देव ने माता सीता को आग्रह किया कि पिंडदान का समय निकलता जा रहा है। यह जानकर माता सीता असमंजस में पड़ गई, तब माता  ने समय के महत्व को समझते हुए यह निर्णय लिया कि वह स्वयं अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान करेंगी।  देवी सीता ने फल्गु नदी के किनारे बालू का पिंड बनाया और वटवृक्ष, केतकी फूल, नदी और गाय को साक्षी मानकर स्वर्गीय राजा दशरथ का पिंडदान किया। इस क्रिया के उपरांत जैसे ही उन्होंने हाथ जोड़कर प्रार्थना की तो राजा दशरथ ने माता सीता का पिंड दान स्वीकार किया। माता सीता को इस बात से प्रफुल्लित हुई कि उनकी पूजा दशरथ जी ने स्वीकार कर ली है, पर वह यह भी जानती थी कि प्रभु राम इस बात को नहीं मानेंगे क्योंकि पिंड दान पुत्र के बिना नहीं हो सकता है। 

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फल्गू नदी, गाय ने बोला झूठ

थोड़ी देर बाद भगवान राम और लक्ष्मण सामग्री लेकर आए और पिंड दान के विषय में पूछा तब माता सीता ने कहा कि समय निकल जाने के कारण मैंने स्वयं पिंडदान कर दिया।  प्रभु राम को इस बात का विश्वास नहीं हो रहा था कि बिना पुत्र और बिना सामग्री के पिंडदान कैसे संपन्न और स्वीकार हो सकता है। तब सीता जी ने कहा कि वहां उपस्थित फल्गू नदी, तुलसी, कौआ, गाय, वटवृक्ष और ब्राह्मण उनके द्वारा किए गए श्राद्धकर्म की गवाही दे सकते हैं। भगवान राम ने जब इन सब से पिंडदान किये जाने की बात सच है या नहीं यह पूछा, तब फल्गू नदी, गाय, कौआ, तुलसी और ब्राह्मण पांचों ने प्रभु राम का क्रोध देखकर झूठ बोल दिया कि माता सीता ने कोई पिंडदान नहीं किया। 


माता सीता ने दिया था श्राप

सिर्फ वटवृक्ष ने सत्य कहा कि माता सीता ने सबको साक्षी रखकर विधि पूर्वक राजा दशरथ का पिंड दान किया। पांचों साक्षी द्वारा झूठ बोलने पर माता सीता ने क्रोधित होकर उन्हें आजीवन श्राप दिया। सीता माता द्वारा दिए गए इन श्रापों का प्रभाव आज भी इन पांचों में देखा जा सकता है।  जहां इन पांचों को श्राप मिला वहीं सच बोलने पर माता सीता ने वट वृक्ष को आशीर्वाद दिया कि उसे लंबी आयु प्राप्त होगी और वह दूसरों को छाया प्रदान करेगा तथा पतिव्रता स्त्री उनका स्मरण करके अपने पति की दीर्घायु की कामना करेगी। शास्‍त्रों में श्राद्ध का पहला अधिकार पुत्र को दिया गया है. लेकिन जिस परिवार में कोई पुत्र नहीं है, उस परिवार की कन्‍या पितरों के श्राद्ध को अगर श्रद्धापूर्वक करती है और उनके निमित्त पिंडदान करती है तो पितर उसे स्वीकार कर लेते हैं। इसके अलावा पुत्र की अनुपस्थिति में बहू या पत्नी को श्राद्ध करने का अधिकार है। 


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Content Writer

vasudha

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