काशी में उन 10 हजार अजन्मी बेटियों का श्राद्ध किया गया, जो कभी दुनिया नहीं देख सकीं
punjabkesari.in Wednesday, Oct 07, 2026 - 03:11 PM (IST)
नारी डेस्क: धर्म और मोक्ष की नगरी काशी में पितृपक्ष के दौरान एक ऐसा अनुष्ठान हुआ, जिसने वहां मौजूद लोगों को भावुक कर दिया। दशाश्वमेध घाट पर करीब 10 हजार उन अजन्मी बेटियों के लिए श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण किया गया, जिन्हें जन्म लेने से पहले ही कोख में मार दिया गया था। गंगा किनारे वैदिक मंत्रों के बीच हुए इस अनुष्ठान का मकसद सिर्फ धार्मिक कर्मकांड करना नहीं, बल्कि कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ समाज को एक मजबूत संदेश देना भी था।
10 हजार अजन्मी बेटियों के लिए हुआ पिंडदान
पितृपक्ष की मातृ नवमी के अवसर पर दशाश्वमेध घाट पर ‘आगमन’ सामाजिक संस्था की ओर से यह विशेष आयोजन किया गया। संस्था के संस्थापक सचिव डॉ. संतोष ओझा के नेतृत्व में पांच वैदिक आचार्यों की मौजूदगी में करीब 10 हजार अजन्मी बेटियों के लिए पिंडदान और तर्पण कराया गया। अनुष्ठान के दौरान वैदिक मंत्रों का जाप किया गया और बेटियों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की गई। इस दौरान पिंडदान, तर्पण, पंचबलि और ब्राह्मण भोज जैसी धार्मिक विधियां भी पूरी की गईं।
हर बेटी के नाम से तैयार किए गए पिंड
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अनुष्ठान के लिए हजारों पिंड तैयार किए गए थे। एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जौ के आटे, शहद, देसी घी, काले तिल और गंगाजल से 10 हजार पिंड बनाए गए। इन्हें अजन्मी बेटियों के प्रतीक के रूप में स्थापित कर वैदिक विधि से पूजा की गई और फिर तर्पण की प्रक्रिया पूरी की गई। गंगा किनारे हुए इस पूरे आयोजन के दौरान माहौल बेहद भावुक रहा। धार्मिक विधियों के बीच उन बेटियों को याद किया गया, जिन्हें दुनिया देखने, परिवार का हिस्सा बनने और अपना जीवन जीने का मौका ही नहीं मिल सका।

सिर्फ श्राद्ध नहीं, कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ संदेश
इस आयोजन का उद्देश्य केवल अजन्मी बेटियों की आत्मा की शांति के लिए धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं था। इसके जरिए समाज में कन्या भ्रूण हत्या जैसी गंभीर सामाजिक बुराई के खिलाफ जागरूकता फैलाने का संदेश भी दिया गया। बेटे की चाहत में बेटियों को जन्म से पहले ही खत्म कर देना आज भी समाज के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे में काशी के घाट पर किया गया यह आयोजन लोगों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि जिस बेटी को दुनिया में आने का मौका तक नहीं मिला, उसके लिए भी समाज को संवेदना और सम्मान के साथ खड़ा होना चाहिए।
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डॉ. संतोष ओझा के नेतृत्व में हुआ आयोजन
इस पूरे अनुष्ठान का नेतृत्व ‘आगमन’ संस्था के संस्थापक सचिव डॉ. संतोष ओझा ने किया। संस्था लंबे समय से महिला सशक्तिकरण और कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ जागरूकता अभियान से जुड़ी रही है। हालिया रिपोर्टों में भी बताया गया है कि संस्था की ओर से अजन्मी बेटियों के लिए इस तरह का श्राद्ध अनुष्ठान कई वर्षों से किया जा रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस साल का आयोजन भी इसी सिलसिले की एक कड़ी था। अलग-अलग रिपोर्टों में इस परंपरा की अवधि को लेकर अलग विवरण सामने आए हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि काशी में अजन्मी बेटियों के लिए यह अनुष्ठान पिछले कई वर्षों से आयोजित होता रहा है।

बेटियों को याद करने के साथ दिया बराबरी का संदेश
दशाश्वमेध घाट पर हुआ यह आयोजन एक धार्मिक अनुष्ठान से आगे बढ़कर सामाजिक संदेश भी बन गया। इसमें बेटियों की सुरक्षा, उन्हें जन्म लेने का अधिकार देने और समाज में उन्हें बराबरी का स्थान देने की बात कही गई। जिन बेटियों ने कभी आंखें नहीं खोलीं, जिनका कोई जन्मदिन नहीं आया और जिन्हें परिवार के साथ जीवन बिताने का मौका नहीं मिला, उन्हें काशी के घाट पर याद किया गया। यह आयोजन एक बार फिर यही सवाल छोड़ गया कि आखिर किसी बच्चे की जिंदगी का फैसला उसके जन्म से पहले सिर्फ इसलिए क्यों किया जाए क्योंकि वह बेटी है।
काशी में हुए इस अनुष्ठान ने कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ एक संवेदनशील संदेश दिया बेटी को जन्म लेने का अधिकार मिलना चाहिए और उसे बोझ नहीं, जीवन के रूप में देखा जाना चाहिए।

