लाइसेंस के लिए 40 की उम्र में पास की दसवीं, बनीं पहली महिला ऊबर ड्राइवर

Wednesday, May 16, 2018 12:25 PM
लाइसेंस के लिए 40 की उम्र में पास की दसवीं, बनीं पहली महिला ऊबर ड्राइवर

जिंदगी की मुश्किलों को सहते हुए खुद को परेशानियों से निकालना ही हिम्मत है। जो लोग इस बात को समझ कर अपनी कोशिशों को जारी रखते हैं, वह दूसरों के लिए भी मिसाल बन जाते हैं। आज हम बात कर रहे हैं, दिल्ली में रहने वाली शानू बेगम की। जिन्होंने 40 की उम्र में दसवीं की परीक्षा पास करके ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया और दिल्ली में ही वह महिलाओं के लिए कैब ड्राइवर बनीं। इसके पीछे शानू की दर्द भरी कहानी है, जो दूसरी औरतों के लिए किसी प्रेरणा से कम नही है। 


तीन बच्चों की मां शानू सिंगल मदर है, घर को चलाने और बच्चों के पढ़ाने के लिए उन्होंने कुक से लेकर केयर टेकर तक का काम भी किया। वह चाहती थी कि अपने बच्चों को वह अच्छी शिक्षा दे सकें, इन छोटे-छोटे कामों मेहनत तो लगती थी लेकिन न तो अच्छी कमाई होती थी और न ही समय पर पैसे मिल पाते थे। फिर आजाद फाउंडेशन के जरिए उन्हें छह महीने के ड्राइविंग कोर्स के बारे में पता चला। पहले उन्होंने सोचा कि यह बहुत मुश्किल काम है लेकिन इससे बाद में नियमित आय का स्रोत मिल जाने की उम्मीद थी।


इसके बाद शानू ने गाड़ी चलाने की ट्रेनिंग शुरू की, एक साल तक उसने निजी उपयोग के लिए गाड़ी भी चलाई। उसके बाद फिर उसने सखा नाम की कैब सर्विस में काम करन शुरू किया। इस कैब सर्विस की खास बात यह थी कि यह खास तौर पर महिलाओं को कैब सर्विस मुहैया करवाने के लिए बनी थी। शानू अब ऊबर कार चलाती है। इसके लिए वह खुद पर गर्व भी महसूस करती है। शानू कहती हैं, 'अगर मैंने पढ़ाई नहीं की होती तो आज घर साफ कर रही होती या खाना पका रही होती। लेकिन इस काम में लोग मुझे सम्मान देते हैं और मुझे भी कैब ड्राइवर बनकर गर्व होता है।'
 

आमतौर पर लोगों का यह मानना होता है कि महिलाएं कार ड्राइवर का काम नहीं कर सकती या फिर ड्राइवर का काम महिलाओं को सम्मान नहीं देता लेकिन शानू का यह कदम लोगों की सोच को बदलने के लिए काफ है। कोई गलत काम करने से बेहतर है कि किसी अच्छे काम से मेहनत की कमाई की जाए। शानू आज ड्राइविंग के जरिए  घर के लिए सम्मान के साथ पैसा भी कमा रही है और महिलाओं की सुरक्षा के लिए उसका यह जरूरी कदम दूसरे लोगों के लिए मिसाल बन रहा है। 
 

दर्द भरी थी शानू की जिंदगी 
शानू ने पहले अपनी जिंदगी में यह कभी भी नहीं सोचा थी कि वह एक महिला ड्राइवर बनेगी। शानू की शादीशुदा जिंदगी अच्छी नहीं चल रही थी, उनका पति आए दिन उन्हें मारता-पीटता था। एक दिन उनके पति ने अपनी सारी हदें पार करते हुए उन पर पत्थर से हमला कर दिया। जब घरेलू हिसा की हदें पार हो गई तो शानू ने भी थप्पड़ से इसका जवाब दिया। इस हादसे के तीन साल बाद शानू के पति की मौत हो गई। घर की सारी जिम्मेदारिया शानू के कंधों पर आ गई। बच्चों से लेकर घर खर्च तक सारा काम शानू पर आ गया। इसके बाद उसे पढ़ाई का महत्व पता चला फिर भी बच्चों की पढ़ाई को आगे बढ़ने के लिए उसने कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अपनी बड़ी बेटी की शादी की, छोटी बेटी को बीए में एडमिशन दिलाया और बेटे को स्कूल में पढ़ा रही हैं। 


 


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