सोनिया गांधी की लाल-काली ''पसापली'' संबलपुरी साड़ी क्यों है इतनी खास?

punjabkesari.in Sunday, Jul 26, 2026 - 03:53 PM (IST)

नारी डेस्क;  भारतीय राजनीति में जब भी सादगी और क्लासिक स्टाइल की बात होती है, तो सोनिया गांधी का नाम जरूर लिया जाता है। उनकी हैंडलूम साड़ियों का संग्रह अक्सर लोगों का ध्यान खींचता है। हाल ही में उनका लाल और काले रंग की खूबसूरत साड़ी वाला लुक सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। पहली नजर में यह साड़ी अपनी आकर्षक डिजाइन और रंगों की वजह से अलग दिखती है, लेकिन इसकी खासियत सिर्फ इतनी ही नहीं है। दरअसल, सोनिया गांधी ने जो साड़ी पहनी है, वह ओडिशा की प्रसिद्ध 'पसापली संबलपुरी इकत' साड़ी है, जिसे भारतीय हैंडलूम की सबसे खूबसूरत और पारंपरिक बुनाई में गिना जाता है।

क्या है 'पसापली' संबलपुरी साड़ी

'पसापली' शब्द संस्कृत के 'पासा' यानी चौसर या शतरंज के खेल से जुड़ा माना जाता है। इस साड़ी की सबसे बड़ी पहचान इसका पारंपरिक चेकरबोर्ड (Checkerboard) पैटर्न है, जो बिल्कुल चौसर के बोर्ड जैसा दिखाई देता है। पारंपरिक रूप से इस साड़ी में लाल, काला और सफेद रंगों का इस्तेमाल अधिक किया जाता है। इन रंगों का संबंध ओडिशा की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से माना जाता है। यही वजह है कि यह साड़ी दूसरी संबलपुरी साड़ियों से अलग पहचान रखती है।

किन इलाकों में तैयार होती है यह खास साड़ी

पसापली संबलपुरी साड़ी मुख्य रूप से ओडिशा के बरगढ़, सोनपुर, बौध और बलांगीर जैसे क्षेत्रों में हाथ से बुनी जाती है। यहां के बुनकर पीढ़ियों से इस पारंपरिक कला को संजोए हुए हैं और आज भी पारंपरिक तकनीकों का इस्तेमाल कर इन साड़ियों को तैयार करते हैं।

महीनों की मेहनत से तैयार होती है एक साड़ी

संबलपुरी साड़ी कोई साधारण प्रिंटेड साड़ी नहीं होती। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी इकत (Ikat) बुनाई है। इसमें कपड़ा तैयार होने के बाद डिजाइन नहीं बनाया जाता, बल्कि बुनाई शुरू होने से पहले ही धागों को तय पैटर्न के अनुसार बांधकर रंगा जाता है। इसके बाद रंगे हुए ताने और बाने के धागों को बेहद सावधानी से करघे पर बुना जाता है। बुनाई पूरी होने पर अपने आप चौखाने वाला 'पसापली' पैटर्न और अन्य पारंपरिक आकृतियां जैसे शंख, चक्र और फूल उभरकर सामने आते हैं। एक अच्छी गुणवत्ता वाली पसापली संबलपुरी साड़ी तैयार करने में दो से तीन बुनकरों को लगभग 15 से 30 दिन का समय लग सकता है। कई बार डिजाइन की जटिलता के अनुसार इससे भी अधिक समय लगता है।

GI टैग से मिली वैश्विक पहचान

संबलपुरी हैंडलूम को भारत सरकार की ओर से जियोग्राफिकल इंडिकेशन (GI) टैग भी मिल चुका है। इसका अर्थ है कि इस बुनाई की असली पहचान ओडिशा के पारंपरिक कारीगरों और वहां की शिल्प परंपरा से जुड़ी हुई है। GI टैग मिलने के बाद इस हैंडलूम को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नई पहचान मिली है और इसकी मांग लगातार बढ़ी है।

फैशन में कभी पुरानी नहीं पड़ती यह साड़ी

पसापली संबलपुरी साड़ी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका आकर्षण समय के साथ कम नहीं होता। इसे औपचारिक कार्यक्रमों, त्योहारों, पारिवारिक समारोहों और ऑफिस जैसे अवसरों पर भी आसानी से पहना जा सकता है। आज की युवा पीढ़ी भी इस पारंपरिक साड़ी को आधुनिक अंदाज में स्टाइल कर रही है। सिल्वर ज्वेलरी, ऑक्सीडाइज्ड एक्सेसरीज और डिजाइनर ब्लाउज के साथ इसे नया और स्टाइलिश लुक दिया जा रहा है।

सिर्फ साड़ी नहीं, भारतीय विरासत की पहचान

सोनिया गांधी का यह लुक एक बार फिर भारतीय हैंडलूम की खूबसूरती और समृद्ध परंपरा को सामने लाता है। ऐसी साड़ियां सिर्फ पहनावे का हिस्सा नहीं होतीं, बल्कि इनमें बुनकरों की मेहनत, वर्षों पुरानी कला और भारतीय संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है। अगर कोई व्यक्ति ऐसी हैंडलूम साड़ी खरीदता है, तो वह केवल एक खूबसूरत परिधान नहीं चुनता, बल्कि देश के पारंपरिक कारीगरों और स्थानीय हस्तशिल्प को भी समर्थन देता है। यही वजह है कि पसापली संबलपुरी साड़ी आज भी भारतीय हस्तकला की सबसे प्रतिष्ठित और पसंदीदा पहचान मानी जाती है।
   
 
 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Editor

Priya Yadav

Related News

static