जब महाबली भीम को भी रखना पड़ा सबसे कठिन व्रत, जानिए भीमसेनी एकादशी की पौराणिक कथा

punjabkesari.in Thursday, Jun 25, 2026 - 10:37 AM (IST)

नारी डेस्क: सनातन धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व बताया गया है, लेकिन ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से वर्ष भर की सभी एकादशियों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है। यही कारण है कि इसे ‘महाएकादशी’ भी कहा जाता है। इस वर्ष 25 जून 2026, गुरुवार को निर्जला एकादशी का व्रत रखा जा रहा है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसकी विशेषता यह है कि इसमें पूरे दिन अन्न तो दूर, जल का सेवन भी नहीं किया जाता। यही वजह है कि इसे सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है।

क्यों कहलाती है भीमसेनी एकादशी

निर्जला एकादशी का संबंध महाभारत काल के पराक्रमी योद्धा भीमसेन से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि पांडवों में सबसे बलशाली भीम भोजन के अत्यंत प्रिय थे और उनके लिए उपवास करना बेहद कठिन था। इसी कारण वे अन्य एकादशी व्रतों का पालन नहीं कर पाते थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भीमसेन के इसी प्रसंग के कारण निर्जला एकादशी को ‘भीमसेनी एकादशी’ या ‘पांडव एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है।

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जब भीमसेन ने पूछा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग

एक बार महाबली भीम ने महर्षि वेदव्यास से प्रश्न किया कि वे न तो नियमित रूप से व्रत रख पाते हैं और न ही अन्य धार्मिक अनुष्ठानों का पालन कर पाते हैं। ऐसे में उन्हें मोक्ष की प्राप्ति कैसे होगी? भीम के इस प्रश्न पर महर्षि वेदव्यास ने उन्हें बताया कि प्रत्येक माह आने वाली दोनों एकादशियों का व्रत करना अत्यंत शुभ और मोक्षदायक माना गया है। जो व्यक्ति श्रद्धा के साथ इन व्रतों का पालन करता है, उसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

भोजन प्रिय होने के कारण भीम ने जताई असमर्थता

वेदव्यास जी की बात सुनकर भीमसेन ने विनम्रता से कहा कि उनके लिए नियमित उपवास रखना संभव नहीं है। उन्होंने बताया कि उनके उदर में ‘वृक’ नामक अग्नि विद्यमान है, जो भोजन से ही शांत होती है। यदि वे लंबे समय तक भोजन न करें तो उन्हें अत्यधिक कष्ट होता है। इसके बाद भीम ने महर्षि से ऐसा उपाय बताने का अनुरोध किया, जिससे उन्हें बार-बार व्रत न रखना पड़े और फिर भी धर्म, पुण्य तथा मोक्ष की प्राप्ति हो सके।


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वेदव्यास जी ने बताया निर्जला एकादशी का महत्व

भीम की जिज्ञासा का समाधान करते हुए महर्षि वेदव्यास ने ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी अर्थात निर्जला एकादशी के व्रत का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पूरे वर्ष की अन्य एकादशियों का व्रत नहीं कर सकता, तो वह केवल निर्जला एकादशी का व्रत रखकर भी सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त कर सकता है। इस व्रत का पालन सूर्योदय से लेकर अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक किया जाता है। इस दौरान अन्न और जल दोनों का त्याग करना होता है तथा भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा-अर्चना करनी चाहिए।

निर्जला एकादशी व्रत से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभ

धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और नियमों के साथ निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसे वर्ष भर की 24 एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त होता है। इसके साथ ही उसके पापों का क्षय होता है और भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में सुख, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। मान्यता यह भी है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को अंत समय में मोक्ष और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

भीमसेन ने भी रखा निर्जला एकादशी का व्रत

महर्षि वेदव्यास के उपदेश को सुनने के बाद भीमसेन ने निर्जला एकादशी का व्रत रखने का संकल्प लिया। उन्होंने पूरे नियम और श्रद्धा के साथ इस कठिन व्रत का पालन किया। कहा जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से उन्हें भगवान श्रीहरि विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त हुई और अंततः उन्हें स्वर्ग लोक की प्राप्ति हुई। इसी घटना के बाद निर्जला एकादशी का महत्व और अधिक बढ़ गया तथा इसे भीमसेनी एकादशी के नाम से जाना जाने लगा।

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आज भी कायम है सदियों पुरानी परंपरा

निर्जला एकादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि संयम, श्रद्धा और आत्मनियंत्रण का प्रतीक मानी जाती है। आज भी देशभर में लाखों श्रद्धालु इस दिन भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं, दान-पुण्य करते हैं और निर्जला व्रत रखकर सुख-समृद्धि एवं मोक्ष की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सच्चे मन से किया गया यह व्रत व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है और उसे भगवान विष्णु की असीम कृपा प्राप्त होती है।
 

 


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Content Editor

Priya Yadav

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