पुरी रथयात्रा के बाद भगवान जगन्नाथ के रथों का क्या होता है? जानिए कैसे भक्तों तक पहुंचती हैं पवित्र लकड़ियां

punjabkesari.in Sunday, Jul 26, 2026 - 03:31 PM (IST)

नारी डेस्क: ओडिशा के पुरी में होने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा देश ही नहीं, बल्कि दुनियाभर में प्रसिद्ध है। हर साल लाखों श्रद्धालु इस भव्य यात्रा के साक्षी बनने के लिए पुरी पहुंचते हैं। आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होने वाली यह यात्रा नौ दिनों तक चलती है और बहुड़ा यात्रा के साथ इसका समापन होता है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा में शामिल होने और भगवान के दर्शन करने से व्यक्ति को पुण्य की प्राप्ति होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यात्रा पूरी होने के बाद भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के विशाल रथों का क्या होता है?

हर साल नए बनाए जाते हैं भगवान के रथ

पुरी मंदिर की परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के रथ हर साल नए बनाए जाते हैं। इन रथों का निर्माण विशेष विधि और शुभ मुहूर्त के अनुसार किया जाता है। भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष, भगवान बलभद्र के रथ का नाम तालध्वज और देवी सुभद्रा के रथ का नाम दर्पदलन है। तीनों रथों की बनावट, ऊंचाई और पहियों की संख्या अलग-अलग होती है। भगवान जगन्नाथ के नंदीघोष रथ में 16 पहिए होते हैं, भगवान बलभद्र के तालध्वज रथ में 14 पहिए और देवी सुभद्रा के दर्पदलन रथ में 12 पहिए होते हैं।

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रथयात्रा के बाद रथों को नहीं रखा जाता सुरक्षित

रथयात्रा और नीलाद्रि बीजे की रस्म पूरी होने के बाद इन विशाल रथों को हमेशा के लिए संरक्षित नहीं रखा जाता। मंदिर की परंपरा के अनुसार, रथों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत खोल दिया जाता है और उनकी लकड़ियों को अलग-अलग कर लिया जाता है। अगले साल की रथयात्रा के लिए फिर से नए रथों का निर्माण किया जाता है। इसलिए पुराने रथों की लकड़ियों को धार्मिक महत्व के साथ संभाला जाता है।

रथ की लकड़ियां क्यों मानी जाती हैं पवित्र

भगवान के विग्रहों को धारण करने वाले इन रथों की लकड़ियों को सामान्य लकड़ी नहीं माना जाता। श्रद्धालुओं के लिए इनका विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है। मान्यता है कि इन पवित्र लकड़ियों में भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद जुड़ा होता है। इनका उपयोग कई धार्मिक कार्यों, यज्ञ, हवन और मंदिर से जुड़े अनुष्ठानों में किया जाता है। कई बार इनसे छोटे धार्मिक स्मृति-चिह्न और पूजा सामग्री भी तैयार की जाती है।

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रथ के पहियों की रहती है सबसे ज्यादा मांग

रथ के अलग-अलग हिस्सों में पहियों को सबसे खास माना जाता है। श्रद्धालुओं में इन पवित्र पहियों को प्राप्त करने की काफी इच्छा रहती है। रथयात्रा समाप्त होने के बाद रथों को खोलकर उनके हिस्सों को पुरी स्थित मंदिर कार्यालय के भंडार कक्ष में सुरक्षित रखा जाता है। इसके बाद मंदिर प्रशासन की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार श्रद्धालुओं को रथ के कुछ हिस्से उपलब्ध कराए जाते हैं। इनमें पहिए, लकड़ी के अन्य हिस्से और धार्मिक स्मृति-चिह्न शामिल हो सकते हैं।

भक्तों तक कैसे पहुंचती हैं रथ की पवित्र लकड़ियां

रथ की लकड़ियों और अन्य हिस्सों को प्राप्त करने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया अपनाई जाती है। मंदिर प्रशासन द्वारा इसके लिए नियम और व्यवस्था तय की जाती है। सबसे पहले रथ के पहियों और अन्य लकड़ी के हिस्सों की कीमत या न्यूनतम मूल्य निर्धारित किया जाता है। इसके बाद इच्छुक श्रद्धालु या संस्थाएं आवेदन कर सकती हैं। कई मामलों में इन पवित्र वस्तुओं को नीलामी प्रक्रिया के माध्यम से भक्तों को दिया जाता है। सबसे अधिक बोली लगाने वाले श्रद्धालु को इन्हें प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

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श्रद्धालुओं को देना होता है विशेष वचन

रथ के पवित्र हिस्से प्राप्त करने वाले लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इनका सम्मान बनाए रखेंगे। खरीदार या श्रद्धालु को यह सुनिश्चित करना होता है कि इन लकड़ियों का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं किया जाएगा और इन्हें केवल धार्मिक आस्था और श्रद्धा के उद्देश्य से रखा जाएगा।

घर में रख सकते हैं रथ की पवित्र लकड़ी

कई श्रद्धालु रथ की लकड़ी या उससे बने धार्मिक स्मृति-चिह्न को अपने घर में रखते हैं। मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा आती है और भगवान जगन्नाथ की कृपा बनी रहती है। हालांकि, इन पवित्र वस्तुओं को रखने के पीछे सबसे बड़ा भाव श्रद्धा और सम्मान का होता है। पुरी की यह परंपरा केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भगवान जगन्नाथ से जुड़ी गहरी आस्था और सदियों पुरानी संस्कृति का हिस्सा है।
  

 
 


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Content Editor

Priya Yadav

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