जालंधर के सोढल मेले की कहानी है बेहद दिलचस्प, जानें 300 साल पुराने मंदिर का इतिहास
punjabkesari.in Saturday, Sep 19, 2026 - 12:44 PM (IST)
नारी डेस्क : पंजाब के जालंधर में हर साल लगने वाला श्री सिद्ध बाबा सोढल मेला आस्था और लोकविश्वास का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। दूर-दूर से श्रद्धालु बाबा सोढल के दरबार में माथा टेकने और अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मुराद पूरी होती है। साल 2026 में श्री सिद्ध बाबा सोढल मेला 25 सितंबर, शुक्रवार को आयोजित होगा। आइए जानते हैं इस मंदिर और मेले से जुड़ी करीब 300 साल पुरानी मान्यताओं की कहानी।
करीब 300 साल पुराना बताया जाता है मंदिर का इतिहास
जालंधर स्थित श्री सिद्ध बाबा सोढल मंदिर का इतिहास करीब 300 साल पुराना बताया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, जिस स्थान पर आज मंदिर है, वहां कभी घना जंगल हुआ करता था। इसी जगह एक छोटा-सा तालाब भी था और उसके पास एक संत कुटिया बनाकर रहते थे। कहा जाता है कि चड्ढा बिरादरी की एक महिला संतान प्राप्ति की इच्छा लेकर संत के पास पहुंची। लोककथा के अनुसार, संत ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा कि उसके घर ऐसा बालक जन्म लेगा, जो आगे चलकर लोगों की सेवा करेगा। इसके बाद उसके घर एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम सोढल रखा गया।

तालाब से शेषनाग के रूप में प्रकट होने की मान्यता
बाबा सोढल से जुड़ी लोककथा में तालाब का विशेष महत्व बताया जाता है। मान्यता के अनुसार, एक दिन बाबा सोढल की माता तालाब के पास कपड़े धो रही थीं और बालक सोढल वहां खेल रहे थे। उनकी शरारतों से परेशान होकर माता ने उन्हें तालाब में चले जाने के लिए कह दिया। कहा जाता है कि उस समय बाबा सोढल की उम्र करीब चार वर्ष थी। माता की बात मानकर वह तालाब में कूद गए। जब काफी देर तक वह वापस नहीं आए तो उनकी माता विलाप करने लगीं। लोकविश्वास के अनुसार, इसी दौरान बाबा सोढल शेषनाग के रूप में प्रकट हुए।
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ऐसे शुरू हुआ सोढल मेले का सिलसिला
मान्यता है कि शेषनाग रूप में प्रकट हुए बाबा सोढल ने श्रद्धालुओं को आशीर्वाद दिया और कहा कि जो भी व्यक्ति यहां अपनी मनोकामना लेकर आएगा, उसकी मुराद पूरी होगी। इसके बाद वह फिर तालाब में समा गए। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी घटना के बाद से यहां श्रद्धालुओं के आने और मेला लगने का सिलसिला शुरू हुआ। आज भी बड़ी संख्या में लोग बाबा सोढल के दरबार में अपनी मनोकामना लेकर पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में तालाब के चारों ओर बनी सीढ़ियों और गोलाकार चबूतरे को भी शेषनाग के स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है।

अनंत चतुर्दशी पर लगता है मेला
श्री सिद्ध बाबा सोढल मेला हर साल भाद्रपद मास की अनंत चतुर्दशी के अवसर पर आयोजित किया जाता है। मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु बाबा को रोट या अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रसाद अर्पित करते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, बाबा सोढल को चढ़ाया गया प्रसाद घर की बेटी ग्रहण कर सकती है, जबकि उसके पति और बच्चों को यह प्रसाद देने की परंपरा नहीं है। यह एक धार्मिक और स्थानीय परंपरा है, जिसका पालन श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार करते हैं।
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लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है मंदिर
शेषनाग से जुड़ी मान्यता के अलावा मंदिर परिसर में बाबा सोढल का मंदिर भी है, जिसे इस धार्मिक स्थल का प्रमुख केंद्र माना जाता है। समय के साथ मंदिर की प्रसिद्धि बढ़ती गई और आज यह जालंधर के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। हर साल सोढल मेले के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। लोगों के लिए यह मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही आस्था, परंपरा और स्थानीय संस्कृति का भी हिस्सा है।

