ये गहने मेरे पैरों पर ज़्यादा खूबसूरत लगते थे... जब बड़ौदा की महारानी ने महफ़िल को चुप करा दिया

punjabkesari.in Monday, Jan 12, 2026 - 03:31 PM (IST)

 नारी डेस्क:  1950 का दशक। दुनिया नई-नई आज़ादी, बदलती सत्ता और ग्लैमर से भरे हाई-सोसाइटी दौर में कदम रख चुकी थी। इसी दौर में भारतीय रियासतों की शान, ठाठ और आत्मविश्वास ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर ऐसा असर छोड़ा कि आज भी उसकी मिसाल दी जाती है। इस कहानी की नायिका थीं बड़ौदा की महारानी सीता देवी।

जब पैरों की पायल बनी गले का हार

साल 1953 में महारानी सीता देवी ने अपनी बेहद कीमती रत्नजड़ित पायलें मशहूर अमेरिकी जौहरी हैरी विंस्टन को बेच दीं। इन पायलियों में बड़े-बड़े पन्ने (Emeralds) और हीरे (Diamonds) जड़े थे, जिनकी कीमत और खूबसूरती दोनों ही बेमिसाल थीं। हैरी विंस्टन ने उन रत्नों को निकालकर एक शानदार नेकलेस तैयार किया   ऐसा हार जो देखते ही देखते दुनिया के सबसे खास ज्वेलरी पीस में शामिल हो गया।

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1957 की न्यूयॉर्क बॉल और शाही टकराव

साल 1957, न्यूयॉर्क में एक भव्य बॉल (शाही पार्टी) का आयोजन हुआ। उस शाम वह हार पहने हुई थीं डचेस ऑफ विंडसर  वालिस सिम्पसन। वही महिला, जिनके लिए ब्रिटेन के राजा एडवर्ड अष्टम ने प्रेम में आकर पूरी ब्रिटिश गद्दी छोड़ दी थी।इत्तेफाक से उसी पार्टी में महारानी सीता देवी भी मौजूद थीं।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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एक वाक्य और सन्नाटा

जैसे ही महारानी सीता देवी की नजर उस हार पर पड़ी, उन्होंने मुस्कुराते हुए लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ ऊँची आवाज़ में कहा “ये गहने मेरे पैरों पर कहीं ज़्यादा खूबसूरत लगते थे!” बस… पूरी महफ़िल में सन्नाटा छा गया। डचेस ऑफ विंडसर बुरी तरह असहज हो गईं। वह जान गईं कि वह हार किसी आम शख्स का नहीं, बल्कि एक भारतीय महारानी की शान का हिस्सा था।

हार उसी रात लौटाया गया

कहा जाता है कि उसी रात डचेस ऑफ विंडसर ने वह हार हैरी विंस्टन को लौटा दिया। यह कोई तकरार नहीं थी, बल्कि इतिहास का वह पल था जब भारतीय शाही आत्मसम्मान ने बिना शोर मचाए अपनी जगह दिखा दी।

भारतीय रॉयल्टी का अंतरराष्ट्रीय रुतबा

यह घटना सिर्फ एक हार या पार्टी की कहानी नहीं है। यह उस दौर की याद दिलाती है जब भारतीय महारानियाँ न सिर्फ़ अपार धन की मालकिन थीं, बल्कि आत्मविश्वास, गरिमा और ठसक में भी किसी से कम नहीं थीं। महारानी सीता देवी ने यह साबित किया कि शान दिखाने के लिए आवाज़ ऊंची नहीं, बस आत्मविश्वास सच्चा होना चाहिए।

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इतिहास में दर्ज एक यादगार पल

आज यह किस्सा रॉयल ज्वेलरी हिस्ट्री, ब्रिटिश और भारतीय राजघरानों और 1950 के दशक की अंतरराष्ट्रीय हाई सोसाइटी का सबसे दिलचस्प अध्याय माना जाता है। यह कहानी याद दिलाती है कि भारतीय विरासत सिर्फ मंदिरों और किताबों में नहीं, बल्कि दुनिया की सबसे शानदार महफ़िलों में भी अपनी चमक छोड़ चुकी है।
  

 
 


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Content Editor

Priya Yadav

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