अमीर लोगों में हार्ट अटैक और हार्ट फेलियर का खतरा ज्यादा? स्टडी में सामने आई चौंकाने वाली बात
punjabkesari.in Monday, Oct 19, 2026 - 12:45 PM (IST)
नारी डेस्क: आमतौर पर माना जाता है कि अच्छी आर्थिक स्थिति होने से बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती हैं और बीमारियों का खतरा कम हो जाता है। लेकिन भारत में हुए एक बड़े अध्ययन में दिल की सेहत को लेकर एक अलग तस्वीर सामने आई है। शोध के अनुसार, जिन लोगों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति बचपन से लेकर वयस्क होने तक बेहतर रही, उनमें लगातार आर्थिक रूप से कमजोर रहने वाले लोगों की तुलना में दिल की कुछ बीमारियों की संभावना अधिक पाई गई। इस अध्ययन में 65,364 भारतीयों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि अमीर होना अपने आप दिल की बीमारी का कारण है। शोध में आर्थिक स्थिति और हृदय रोगों के बीच संबंध देखा गया है।
65 हजार से ज्यादा लोगों पर किया गया अध्ययन
यह अध्ययन अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली और अमेरिका के हार्वर्ड टी.एच. चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ से जुड़े शोधकर्ताओं ने किया। इसके निष्कर्ष American Journal of Preventive Medicine में प्रकाशित हुए। शोध में 45 वर्ष और उससे अधिक उम्र के भारतीयों के आंकड़ों को शामिल किया गया। वैज्ञानिकों ने केवल लोगों की वर्तमान आर्थिक स्थिति पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि यह भी समझने की कोशिश की कि उनका बचपन आर्थिक रूप से कैसा था और बड़े होने के बाद उनकी स्थिति में क्या बदलाव आया। इसके आधार पर लोगों को चार समूहों में बांटा गया। पहले समूह में वे लोग थे, जिनकी आर्थिक स्थिति बचपन और वयस्क जीवन, दोनों में बेहतर रही। दूसरे समूह में वे लोग शामिल थे, जो बचपन में आर्थिक रूप से कमजोर थे, लेकिन बड़े होने के बाद उनकी स्थिति सुधर गई। तीसरे समूह में ऐसे लोग थे, जिनकी आर्थिक स्थिति बचपन में अच्छी थी, लेकिन बाद में कमजोर हो गई। चौथे समूह में वे लोग थे, जो दोनों ही चरणों में आर्थिक रूप से कमजोर रहे। लगातार अच्छी आर्थिक स्थिति वाले लोगों में हार्ट फेलियर की संभावना 1.8 गुना अध्ययन में पाया गया कि बचपन से लेकर वयस्क जीवन तक बेहतर आर्थिक स्थिति में रहने वाले लोगों में लगातार आर्थिक रूप से कमजोर रहने वालों की तुलना में कुछ हृदय रोगों की संभावना अधिक थी।

शोध के प्रमुख आंकड़े इस प्रकार हैं
हार्ट फेलियर: लगातार बेहतर आर्थिक स्थिति वाले लोगों में कंजेस्टिव हार्ट फेलियर की संभावना करीब 1.8 गुना पाई गई।
हार्ट अटैक: इस समूह में हार्ट अटैक की संभावना करीब 1.7 गुना थी।
दिल की धड़कन का अनियमित होना: ऐसे लोगों में अनियमित हृदय गति की संभावना करीब 1.43 गुना पाई गई।
हृदय रोग: दिल की बीमारियों की संभावना करीब 1.37 गुना थी।
कुल हृदय संबंधी बीमारियां: हृदय संबंधी बीमारियों को एक साथ देखने पर इस समूह में संभावना करीब 1.23 गुना पाई गई। यहां ध्यान देने वाली बात है कि ये आंकड़े दोनों समूहों के बीच देखे गए सांख्यिकीय संबंध को दर्शाते हैं। इन्हें किसी व्यक्ति के बीमार पड़ने की निश्चित भविष्यवाणी या आर्थिक संपन्नता के कारण बीमारी होने का प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। आर्थिक स्थिति बेहतर होने पर दिल की बीमारी का खतरा क्यों बढ़ सकता है शोधकर्ताओं के अनुसार, आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ जीवनशैली और खानपान में भी बदलाव आ सकता है। बेहतर आमदनी से सुविधाएं बढ़ती हैं, लेकिन यदि इसके साथ शारीरिक गतिविधियां कम हो जाएं और खानपान असंतुलित हो जाए, तो सेहत पर इसका असर पड़ सकता है।अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं ने कुछ संभावित कारणों की ओर इशारा किया है।
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प्रोसेस्ड फूड का ज्यादा सेवन
व्यस्त दिनचर्या में पैकेटबंद और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ, रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और अधिक चीनी वाले पेय पदार्थों का सेवन बढ़ सकता है। ऐसे खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन वजन, ब्लड शुगर और हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

शारीरिक गतिविधियों में कमी
ऑफिस में लंबे समय तक बैठकर काम करना, वाहन पर अधिक निर्भर रहना और रोजाना चलने-फिरने के कम मौके मिलना शारीरिक गतिविधि को घटा सकता है। नियमित व्यायाम की कमी दिल की सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकती है।
मोटापा और पेट के आसपास चर्बी बढ़ना
शोध में आर्थिक स्थिति में बदलाव के साथ बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई), पेट के आसपास जमा चर्बी, हाई ब्लड प्रेशर और डायबिटीज जैसे जोखिम कारकों का संबंध भी देखा गया। इन स्थितियों को नियंत्रित न किया जाए, तो हृदय रोगों का खतरा बढ़ सकता है। हालांकि, ये संभावित वजहें हैं। अध्ययन से यह साबित नहीं होता कि बेहतर आर्थिक स्थिति वाले सभी लोगों की जीवनशैली खराब होती है या उनकी बीमारी का कारण केवल खानपान और कम शारीरिक गतिविधि है।
जिनकी आर्थिक स्थिति बाद में सुधरी, उनमें भी दिखा जोखिम अध्ययन में उन लोगों के स्वास्थ्य का भी विश्लेषण किया गया, जिनकी आर्थिक स्थिति बचपन में कमजोर थी, लेकिन वयस्क होने तक बेहतर हो गई। इस समूह में भी अधिकांश हृदय रोगों की संभावना लगातार आर्थिक रूप से कमजोर रहने वाले लोगों से अधिक पाई गई।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, भारत जैसे देश में सामाजिक और आर्थिक बदलावों के साथ बीमारियों का स्वरूप भी बदल रहा है। पहले जिन बीमारियों को अपेक्षाकृत संपन्न लोगों से जोड़कर देखा जाता था, वे अब आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को भी प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए दिल की बीमारी की रोकथाम के लिए केवल आमदनी या सामाजिक स्थिति को देखना पर्याप्त नहीं है। खानपान, शारीरिक गतिविधि, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और अन्य स्वास्थ्य जोखिमों पर भी ध्यान देना जरूरी है। गरीब परिवारों के लिए दिल की बीमारी इलाज के साथ आर्थिक संकट भी दिल की बीमारी का असर केवल मरीज की सेहत तक सीमित नहीं रहता। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए अस्पताल में भर्ती होने और लंबे समय तक इलाज कराने का खर्च बड़ी परेशानी बन सकता है।
Global Heart जर्नल में प्रकाशित एक अलग अध्ययन के अनुसार, भारत में हार्ट फेलियर के मरीज को एक बार अस्पताल में भर्ती कराने का औसत खर्च करीब 1.19 लाख रुपये था। इलाज के लिए कई परिवारों को अपनी बचत का इस्तेमाल करना पड़ता है या रिश्तेदारों से आर्थिक मदद लेनी पड़ती है। कुछ परिवारों को कर्ज भी लेना पड़ सकता है। इस अध्ययन से जुड़े शोधकर्ताओं ने बताया कि मरीज के अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी खर्च खत्म नहीं होता। दवाओं, नियमित जांच और आगे के इलाज पर भी पैसा खर्च होता है। स्वास्थ्य बीमा और सरकारी योजनाएं मददगार हो सकती हैं, लेकिन कई परिवारों को फिर भी अपनी जेब से बड़ी रकम देनी पड़ती है।

दिल को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें
आर्थिक स्थिति चाहे जैसी भी हो, कुछ आदतें दिल की सेहत को बेहतर बनाए रखने में मदद कर सकती हैं। रोजाना अपनी क्षमता के अनुसार शारीरिक गतिविधि करें और लंबे समय तक लगातार बैठे रहने से बचें। खाने में सब्जियां, फल, साबुत अनाज और संतुलित आहार शामिल करें। नमक, अतिरिक्त चीनी और अत्यधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन सीमित रखें। ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की समय-समय पर जांच कराएं। धूम्रपान और तंबाकू से दूर रहें। यदि परिवार में दिल की बीमारी का इतिहास है या कोई अन्य जोखिम कारक मौजूद है, तो डॉक्टर से उचित सलाह लें।

