Rajesh Kumar के लिए भारी पड़ा खेती का फैसला, 2 करोड़ के कर्ज में डूबे; अंत में फिल्म बनी सहारा

punjabkesari.in Saturday, Aug 22, 2026 - 04:36 PM (IST)

नारी डेस्क: टीवी के लोकप्रिय शो साराभाई वर्सेज साराभाई में रोसेश का किरदार निभाकर घर-घर पहचान बनाने वाले अभिनेता राजेश कुमार ने अपनी जिंदगी के एक मुश्किल दौर के बारे में खुलकर बात की है। एक्टिंग से ब्रेक लेकर खेती में हाथ आजमाने का उनका फैसला आसान नहीं रहा। करीब पांच साल तक खेती करने के दौरान उन्हें लगातार नुकसान उठाना पड़ा और एक समय ऐसा आया जब उन पर करीब 2 करोड़ रुपये का कर्ज हो गया। हालांकि, राजेश आज भी उस दौर को अपनी नाकामी मानने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि इस अनुभव ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया और मुश्किल हालात में भी आध्यात्मिकता ने उन्हें मानसिक रूप से संभाले रखा।

2017 में एक्टिंग छोड़कर गांव लौटे थे राजेश

राजेश कुमार ने साल 2017 में एक्टिंग से दूरी बनाने का फैसला किया और अपने होमटाउन बिहार लौट गए। यहां उन्होंने खेती और बागवानी में अपना भविष्य तलाशने की कोशिश की। उनके इस फैसले के पीछे खेती और किसानों को लेकर उनकी बढ़ती दिलचस्पी के साथ-साथ आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु की शिक्षाओं का भी असर था। राजेश के मुताबिक, वह सद्गुरु की कई बातों से प्रभावित हुए थे और ईशा फाउंडेशन के कुछ कार्यक्रमों से भी जुड़े। उन्होंने 'रैली फॉर रिवर्स' अभियान में भी हिस्सा लिया और कई कार्यक्रमों की मेजबानी की थी। इसी दौरान खेती को लेकर उनके मन में एक अलग तरह की सोच बनी।

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सद्गुरु की इस बात ने किया प्रभावित

राजेश ने एक बातचीत में बताया कि 'रैली फॉर रिवर्स' के दौरान सद्गुरु अक्सर युवाओं को खेती की ओर आने के लिए प्रेरित करते थे। उनका एक संदेश राजेश के मन में गहराई से बैठ गया। राजेश का मानना था कि अगर किसानों की समस्याओं को समझना है तो केवल बाहर से उन्हें सलाह देने के बजाय खुद खेती के मैदान में उतरकर देखना चाहिए कि असल परेशानी क्या है। इसी सोच के साथ उन्होंने एक्टिंग से दूरी बनाई और खुद किसान बनने का फैसला किया।

खेती में लगाया पैसा, लेकिन लगातार बढ़ता गया नुकसान

खेती का काम शुरू करने के बाद राजेश को जल्द ही समझ आ गया कि जमीन पर काम करना जितना आसान दिखाई देता है, असल में उतना ही चुनौतीपूर्ण है। उन्होंने बागवानी की शुरुआत की, पेड़ लगाए और धीरे-धीरे खेती की बारीकियों को समझने की कोशिश की। लेकिन समस्याएं लगातार सामने आती रहीं। राजेश के मुताबिक, उन्हें खेती, मिट्टी और खेत की पूरी प्रक्रिया समझने में करीब पांच साल लग गए। इस दौरान उन्हें कई बड़े झटकों का सामना करना पड़ा।

बाढ़ ने तबाह कर दी मेहनत

राजेश ने बताया कि जब उन्होंने पेड़ लगाए तो करीब 35 साल बाद उस इलाके में बाढ़ आ गई। बाढ़ में उनका लगाया हुआ काफी कुछ बह गया और उन्हें फिर से शुरुआत करनी पड़ी। उन्होंने हिम्मत नहीं छोड़ी और दोबारा करीब 15 हजार पेड़ लगाए। लेकिन इसके बाद कोरोना महामारी ने उनकी योजनाओं को प्रभावित कर दिया। उन्होंने एक बार फिर नए सिरे से काम शुरू करने की कोशिश की, मगर इस बार जमीन का जलस्तर खत्म होना उनके लिए बड़ी समस्या बन गया। एक के बाद एक आई इन मुश्किलों ने खेती के पूरे काम को आर्थिक रूप से बेहद कठिन बना दिया।

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बेटे के स्कूल के बाहर भी बेचनी पड़ी सब्जियां

खेती से नियमित आमदनी नहीं होने का असर राजेश की निजी जिंदगी पर भी पड़ा। उन्होंने बताया कि एक समय ऐसा था जब उन्हें अपने बेटे के स्कूल के बाहर सब्जियां तक बेचनी पड़ीं। उनकी बचत धीरे-धीरे खत्म हो गई और रोजमर्रा के खर्च पूरे करना भी मुश्किल होने लगा। बावजूद इसके, राजेश का कहना है कि उन्होंने इस स्थिति को अपनी जिंदगी की हार नहीं माना।

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खेती के दौरान 2 करोड़ रुपये के कर्ज में डूबे

राजेश कुमार ने एक पुराने इंटरव्यू में अपनी आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हुए बताया था कि खेती का काम शुरू करने के बाद उन पर करीब 2 करोड़ रुपये का कर्ज हो गया था। उन्होंने बताया था कि कमाई का कोई स्थायी जरिया नहीं था और लगातार बढ़ते खर्चों के कारण उनकी बचत भी खत्म हो गई। स्थिति ऐसी हो गई थी कि गुजारा करना तक मुश्किल लगने लगा था। राजेश ने इस दौर को बेहद कठिन जरूर बताया, लेकिन उन्होंने इसे अपनी पूरी जिंदगी की असफलता मानने से इनकार किया।

आध्यात्मिकता ने मुश्किल दौर में संभाला

आर्थिक नुकसान और लगातार आने वाली परेशानियों के बीच राजेश के लिए सबसे बड़ा सहारा उनकी आध्यात्मिक सोच बनी। उनका कहना है कि इसी वजह से वह एंग्जायटी, डिप्रेशन, निराशा या गुस्से में नहीं गए। राजेश के मुताबिक, उन्हें पता था कि उस समय चीजें उनके मुताबिक नहीं चल रही थीं, लेकिन उन्होंने अपनी कोशिश और प्रक्रिया को रोकने का फैसला नहीं किया। उनके लिए आध्यात्मिकता का मतलब यही था कि परिस्थितियां जैसी भी हों, व्यक्ति अपने प्रयास को जारी रखे।

अब खेती को नाकामी नहीं मानते राजेश

राजेश आज पीछे मुड़कर उस पूरे सफर को देखते हैं तो वह इसे सिर्फ नुकसान या असफलता के तौर पर नहीं देखते। उनका कहना है कि उन्होंने उस दौरान बहुत कुछ सीखा और खेती की असल चुनौतियों को करीब से समझा। उनके लिए यह अनुभव किसी एक परिणाम तक पहुंचने से ज्यादा महत्वपूर्ण रहा। वह कहते हैं कि अब वह अपनी जिंदगी के अनुभवों को सफलता या नाकामी के पैमाने पर नहीं तौलना चाहते।

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फिल्मों ने फिर दिया सहारा

खेती के इस लंबे और मुश्किल दौर के बाद राजेश कुमार ने दोबारा एक्टिंग की दुनिया में वापसी की। धीरे-धीरे फिल्मों और दूसरे प्रोजेक्ट्स के जरिए उनके काम को फिर से रफ्तार मिली। हाल के वर्षों में वह सैयारा, है जवानी तो इश्क होना है, ओह माय डॉग और निशांची जैसी फिल्मों में नजर आए हैं। हालांकि, उन्हें सबसे ज्यादा पहचान साराभाई वर्सेज साराभाई के रोसेश के किरदार से मिली थी।

खेती से मिले आर्थिक झटकों के बाद एक्टिंग ने उन्हें दोबारा संभलने का मौका दिया, लेकिन राजेश के लिए खेती का वह अनुभव आज भी उनकी जिंदगी का एक अहम हिस्सा है। उनके मुताबिक, वह दौर भले ही आर्थिक तौर पर बेहद मुश्किल रहा हो, लेकिन उसने उन्हें जिंदगी, मेहनत और असफलता को देखने का एक अलग नजरिया जरूर दिया। 

 
 


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Content Editor

Priya Yadav

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