सेफ्टी या धोखा? बच्चों को ट्रैक करने के चक्कर में पेरेंट्स कर रहे बड़ी भूल
punjabkesari.in Monday, Oct 05, 2026 - 05:02 PM (IST)
नारी डेस्क: जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं और उनमें आत्मनिर्भरता बढ़ने लगती है तो माता-पिता की चिंता भी बढ़ने लगती है कि घर से बाहर रहने के दौरान बच्चा सुरक्षित है या नहीं। बच्चे अकेले स्कूल आने-जाने लगते हैं, घर से बाहर दोस्तों के साथ खेलने जाते हैं या किसी बड़े की निगरानी के बिना आसपास के इलाके में समय बिताने लगते हैं। ऐसे में माता-पिता बच्चों पर नजर रखने के लिए जीपीएस सुविधा वाले फोन, ऐप या स्मार्टवॉच जैसी 'लोकेशन ट्रेकिंग' प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करने पर विचार कर सकते हैं। यह प्रौद्योगिकी बच्चे की लोकेशन से जुड़ी जानकारी एकत्र करती है और उसे वास्तविक समय में मैप पर दिखाती है। इस प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल के कुछ फायदे हैं, लेकिन इसके कुछ जोखिम भी हैं जिनके बारे में जानना जरूरी है। तो माता-पिता को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

बच्चे की लोकेशन क्यों ट्रैक करें?
माता-पिता अक्सर आठ से 12 साल की उम्र के अपने बच्चों की लोकेशन ट्रैक करना शुरू कर देते हैं। इसके पीछे तर्क यह है कि लोकेशन ट्रैकिंग से बच्चों को बाहर आने-जाने की अधिक स्वतंत्रता मिलती है, माता-पिता को उनकी गतिविधियों की जानकारी रहती है और बच्चों की सुरक्षा को लेकर उनकी चिंता कुछ कम होती है। यह सुविधा केवल माता-पिता तक सीमित नहीं है। कुछ प्रौद्योगिकी में बच्चे भी अपने माता-पिता की लोकेशन देख सकते हैं। इसका इस्तेमाल परिवार की रोजमर्रा की जरूरतों और दिनचर्या को व्यवस्थित करने के लिए भी किया जा सकता है। मसलन, इससे माता-पिता को पता चल सकता है कि बच्चे को बस स्टॉप से कब लेने जाना है या रात का खाना कितने बजे तैयार रखना है।
लोकेशन ट्रैकिंग कैसे काम करती है?
लोकेशन ट्रैकिंग के लिए कई तरह के ऐप और उपकरण उपलब्ध हैं। इनमें एप्पल के फोन में मौजूद 'फाइंड माई' विशेषता, स्नैपचैट का 'स्नैप मैप', 'लाइफ360' जैसे परिवार के सदस्यों के बीच लोकेशन साझा करने वाले ऐप और 'स्पेसटॉक' जैसी बच्चों की स्मार्टवॉच शामिल हैं। छोटे बच्चों के मामले में स्मार्टवॉच जैसे उपकरण माता-पिता को अधिक सुविधाजनक लगते हैं, क्योंकि इनके जरिए स्मार्टफोन रखने से जुड़ी सभी सुविधाओं, खर्चों या जोखिमों के बिना बच्चे की लोकेशन पर नजर रखी जा सकती है। बड़े बच्चों और किशोरों के मामले में लोकेशन साझा करना अब दोस्तों के बीच संवाद का भी हिस्सा बन गया है। खासकर 'स्नैप मैप' में, जो पहले से मौजूद सोशल मीडिया के नेटवर्क का हिस्सा है और अक्सर माता-पिता की नजर से बाहर रहता है। किशोर आम तौर पर करीबी दोस्तों के साथ अपनी लोकेशन साझा करते हैं, ताकि वे आपस में मिल सकें और एक-दूसरे के संपर्क में बने रह सकें।

इसके क्या जोखिम हैं?
लोकेशन ट्रैकिंग से माता-पिता को बच्चे की गतिविधियों के बारे में उपयोगी जानकारी मिलती है, लेकिन इसका मतलब यह भी है कि बच्चे की रोजमर्रा की आवाजाही से जुड़ी जानकारी एकत्र व संग्रहित की जा रही है और तीसरे पक्ष द्वारा उसका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। लोकेशन साझा करने से युवाओं के पीछा किए जाने, उनकी निगरानी किए जाने और उनकी निजता के उल्लंघन का जोखिम भी रहता है। मसलन, घरेलू हिंसा में संलिप्त लोग बच्चों पर नजर रखने और उन्हें नियंत्रित करने के लिए इन प्रौद्योगिकी का दुरुपयोग कर सकते हैं। माता-पिता और देखभालकर्ताओं को लोकेशन ट्रैक करने वाले उपकरणों और ऐप की निजता संबंधी सेटिंग्स की जांच करनी चाहिए। उन्हें यह देखना चाहिए कि कौन-सी जानकारी एकत्र की जा रही है, उस तक किसकी पहुंच है, उसे कितने समय तक सुरक्षित रखा जाता है और क्या उसे किसी के साथ साझा या बेचा जाता है।
माता-पिता इस बारे में क्या सोचते हैं?
2023 में कईअभिभावकों के बीच किए गए एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि वे अक्सर इन प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल को लेकर दुविधा में रहते हैं और उन्हें चिंता होती है कि लगातार निगरानी रखने से बच्चे के साथ उनके भरोसे का रिश्ता कमजोर हो सकता है। हालांकि, कुछ माता-पिता का मानना था कि लोकेशन ट्रैकिंग उनके बच्चे की भलाई के लिए फायदेमंद है और इससे परिवार की रोजमर्रा की व्यवस्था संभालने में मदद मिलती है। कुछ अन्य माता-पिता ने कहा कि वे 'ट्रैकिंग' के बजाय 'चेकिंग इन' और 'टचिंग बेस' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं। एक अभिभावक ने कहा, ''हम इसका इस्तेमाल अपने बेटे की लोकेशन देखने के लिए करते हैं, ताकि उससे मिल सकें या यह पता कर सकें कि वह दोस्त के घर सुरक्षित पहुंचा है या नहीं। हमें 'ट्रैकिंग' शब्द पसंद नहीं है-हमें लगता है कि लगातार निगरानी रखना नुकसानदेह है, लेकिन हमें 'चेक इन' करने की सुविधा पसंद है।''
लोकेशन ट्रैक करना कब बंद कर देना चाहिए?
शोध से पता चलता है कि कुछ बच्चों की लोकेशन पर नजर रखना उनके युवा अवस्था तक जारी रहता है। कुछ युवाओं ने सोशल मीडिया पर अपनी नाराजगी भी जाहिर की है कि किस तरह यह प्रौद्योगिकी उनकी स्वतंत्रता और अपने फैसले खुद लेने की क्षमता को सीमित कर सकती है। इससे सहमति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल उठता है। जब किसी ऐप को पहली बार इंस्टॉल किया जाता है, तब बच्चा लोकेशन ट्रैक करने की अनुमति दे सकता है। लेकिन अगर यह निगरानी वर्षों तक जारी रहती है, तो क्या शुरुआत में दी गई वह सहमति तब भी मान्य मानी जानी चाहिए? माता-पिता को लोकेशन साझा करने के फैसले को एक बार का निर्णय मानने के बजाय बच्चे के साथ इस बारे में लगातार बातचीत करते रहना चाहिए।

