हर 10 में से 1 स्टूडेंट के मन में आता है खुद की जान लेने का विचार, 34% बच्चे हमेशा रहते हैं उदास: Survey
punjabkesari.in Wednesday, Sep 30, 2026 - 10:43 AM (IST)
नारी डेस्क: सुप्रीम कोर्ट की बनाई एक टास्क फ़ोर्स के देशव्यापी सर्वे के अनुसार, हायर एजुकेशन इंस्टीट्यूट्स (HEIs) में लगभग 15 प्रतिशत छात्रों ने पिछले छह महीनों में कई हफ़्तों तक गंभीर तनाव, उदासी या एंग्जायटी का अनुभव किया, जबकि नौ प्रतिशत छात्रों ने बताया कि उन्हें पिछले साल अक्सर या बहुत ज़्यादा बार आत्महत्या के विचार आए। ये नतीजे छात्रों की मानसिक सेहत और आत्महत्या की रोकथाम पर बनी नेशनल टास्क फोर्स (NTF) की उस अंतिम रिपोर्ट का हिस्सा होंगे, जिसे 31 अक्टूबर तक सौंपा जाना है।

लाखों छात्रों पर किया गया सर्वे
यह सर्वे ऐसे समय में सामने आया है जब IIT दिल्ली और IIT बॉम्बे में छात्रों की मौत के बाद छात्रों की आत्महत्या के मामलों पर फिर से ध्यान दिया जा रहा है। NTF को हायर एजुकेशन संस्थानों के 2.43 लाख से ज़्यादा छात्रों से जवाब मिले। जवाब देने वालों में से लगभग 67 प्रतिशत छात्र अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणियों से थे। सर्वे में यह भी पाया गया कि लगभग 34 प्रतिशत छात्र कैंपस में अलग-अलग हद तक खुद को बाहरी महसूस करते थे। लगभग 15 प्रतिशत छात्रों ने पिछले छह महीनों में ऐसे समय का ज़िक्र किया जब वे बहुत ज़्यादा परेशान या तनावग्रस्त महसूस कर रहे थे, या कई हफ़्तों तक लगातार उदास या बेचैन रहे। नौ प्रतिशत छात्रों ने बताया कि पिछले साल उन्हें अक्सर या बहुत ज़्यादा बार आत्महत्या के विचार आए।
रोज़गार को लेकर चिंतित स्टूडेंट्स
सर्वे में पाया गया कि 56 प्रतिशत छात्रों ने गंभीर मामलों को निष्पक्ष रूप से संभालने के लिए प्रशासन पर भरोसा जताया, जबकि लगभग 32 प्रतिशत छात्रों ने कहा कि उनके संस्थान में काउंसलिंग की सुविधा नहीं है। अधिकारियों ने बताया कि स्टूडेंट्स ने अक्सर पढ़ाई से जुड़े विकल्पों और रोज़गार को लेकर चिंताएं ज़ाहिर कीं। टास्क फ़ोर्स ने कहा कि सामने आ रहे पैटर्न से पता चलता है कि स्टूडेंट्स के लिए स्टैंडर्ड सपोर्ट सिस्टम, फैकल्टी ट्रेनिंग, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कलंक को कम करने के उपाय, संकट के समय प्रतिक्रिया देने के प्रोटोकॉल, क्वालिटी डेटा का इस्तेमाल करके नियमित निगरानी और ज़्यादा जवाबदेह व पारदर्शी संस्थागत प्रशासन की ज़रूरत है।

ये है तनाव का कारण
छात्रों ने कई मुद्दों पर चिंता जताई, जैसे कि हाज़िरी के कड़े नियम, पढ़ाई और क्लिनिकल काम का भारी बोझ, मेडिकल छात्रों के लिए लंबे समय तक 'ऑन-कॉल' रहना, और ग्रेडिंग व प्लेसमेंट को लेकर कड़ी प्रतिस्पर्धा। रिपोर्ट में इन बातों का ज़िक्र किया गया: "गहरी सामाजिक भेदभाव की समस्या; मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में बड़े पैमाने पर यौन उत्पीड़न; मेडिकल, लॉ और राज्य के विश्वविद्यालयों में फैकल्टी द्वारा जेंडर के आधार पर भेदभाव (जैसे पढ़ाई में मदद, हॉस्टल में कर्फ्यू और नैतिक पहरेदारी); NEET-UG और JEE रैंक से जाति की पहचान; और एडमिशन, ग्रेडिंग, भाषा की बाधा और फैकल्टी के ध्यान देने के मामले में जाति के आधार पर अपमान और भेदभाव।"

