लखनऊ अग्निकांड: 'पापा मुझे बचा लीजिए...', आखिरी कॉल सुनकर दौड़े पिता, लेकिन...

punjabkesari.in Tuesday, Jun 23, 2026 - 11:55 AM (IST)

 नारी डेस्क:  लखनऊ के अलीगंज इलाके में सोमवार को हुआ भीषण अग्निकांड अपने पीछे ऐसी दर्दनाक कहानियां छोड़ गया है, जिन्हें सुनकर किसी का भी दिल भर आए। आग ने देखते ही देखते पूरी इमारत को अपनी चपेट में ले लिया और अंदर मौजूद लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागने लगे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि बाहर निकलने का रास्ता कहां है और मदद कब पहुंचेगी। इस हादसे में 15 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हुए। लेकिन आंकड़ों से कहीं ज्यादा दर्द उन परिवारों के चेहरों पर दिखाई दिया, जिन्होंने अपने बच्चों, बेटों और घर के सहारे को इस हादसे में खो दिया।

'पापा, आग लग गई है... मुझे बचा लो'

हादसे के दौरान कई छात्रों और कर्मचारियों ने अपने परिजनों को आखिरी बार फोन किया। इनमें आलमबाग निवासी पारिजोत सिंह के बेटे का फोन भी शामिल था। पारिजोत सिंह बताते हैं कि दोपहर में अचानक उनके फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ उनका बेटा था, जिसकी आवाज में डर साफ महसूस हो रहा था। उसने घबराते हुए कहा, "पापा, यहां आग लग गई है... मुझे बचा लो।" यह सुनते ही पारिजोत सिंह के पैरों तले जमीन खिसक गई। बिना कुछ सोचे-समझे वह अलीगंज की ओर दौड़ पड़े। लेकिन जब तक वह मौके पर पहुंचे, हालात बेहद भयावह हो चुके थे। पुलिस और प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से किसी को भी अंदर जाने की अनुमति नहीं दी। उन्होंने बताया कि वह सिर्फ दूर खड़े होकर अपने बेटे के बारे में जानकारी जुटाने की कोशिश करते रहे, लेकिन बेबसी के अलावा उनके हाथ कुछ नहीं लगा।

बेटे की मदद की पुकार सुनकर भागे पिता

23 वर्षीय सुखमणि सिंह भी उसी इमारत में मौजूद था। आग लगने के बाद उसने भी अपने पिता को फोन किया। परिजनों के मुताबिक, दोपहर करीब 2:15 बजे सुखमणि का फोन आया था। उसने घबराई हुई आवाज में कहा, "पापा, ऑफिस में आग लग गई है... प्लीज मुझे बचा लीजिए।" बेटे की बात सुनते ही पिता तुरंत घर से निकल पड़े। रास्ते भर उन्हें यही उम्मीद थी कि वह समय रहते अपने बेटे तक पहुंच जाएंगे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब तक वह घटनास्थल पहुंचे, आग और धुआं पूरी इमारत को घेर चुका था।

दोस्त को फोन कर बोला- मुझे यहां से निकाल लो

25 वर्षीय आदित्य भी आग और धुएं के बीच फंस गया था। वह इमारत में स्थित एक एनिमेशन स्टूडियो में काम करता था। हादसे के दौरान आदित्य ने अपने एक दोस्त को फोन किया और मदद मांगी। दोस्त ने बताया कि आदित्य लगातार कह रहा था, "मुझे बचा लो, मैं यहां फंस गया हूं।" दोस्त तुरंत मौके की ओर दौड़ा, लेकिन वहां पहुंचकर उसने देखा कि पूरी बिल्डिंग धुएं से ढकी हुई है। अंदर क्या हो रहा है, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल था।

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बेटे को बचाने की गुहार लगाती रही मां

आदित्य की मां को जैसे ही हादसे की सूचना मिली, वह भी घटनास्थल पहुंच गईं। बदहवास हालत में वह बार-बार पुलिस और अधिकारियों से अंदर जाने देने की गुहार लगाती रहीं। मां का कहना था कि अगर समय रहते बचाव कार्य और तेजी से शुरू किया जाता तो शायद कई बच्चों की जान बचाई जा सकती थी। रोते हुए उन्होंने कहा कि उनका बेटा आज उनके साथ होता अगर हालात को थोड़ा पहले नियंत्रित कर लिया जाता। उनकी आंखों में अपने बेटे को खोने का दर्द साफ दिखाई दे रहा था।

जान बचाने के लिए खिड़कियों और पाइप का सहारा

आग इतनी तेजी से फैली कि कई लोगों को बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला। कुछ छात्र खिड़कियों तक पहुंच गए और जान बचाने के लिए तीसरी मंजिल से छलांग लगा दी। कई लोग पाइप और तारों के सहारे नीचे उतरने की कोशिश करते नजर आए। चारों तरफ धुआं, चीख-पुकार और अफरातफरी का माहौल था। नीचे खड़े लोग किसी तरह फंसे हुए लोगों को बचाने की कोशिश कर रहे थे।

घर का इकलौता कमाने वाला बेटा चला गया

हादसे में जान गंवाने वालों में अब्दुल रहमान भी शामिल था। उसके दोस्त सद्दाम शेख ने बताया कि अब्दुल किराये के मकान में रहकर नौकरी करता था।
करीब आठ-दस महीने पहले ही उसे नौकरी मिली थी और वह अपने परिवार के बेहतर भविष्य के सपने देख रहा था। उसके पिता लकवाग्रस्त हैं, जबकि मां गृहिणी हैं। परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी पूरी तरह उसी के कंधों पर थी। दो बड़ी बहनों की शादी हो चुकी है और घर में माता-पिता का सहारा सिर्फ अब्दुल ही था। उसकी मौत ने पूरे परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है।

पीछे छोड़ गया सवाल और आंसू

अलीगंज अग्निकांड ने न सिर्फ कई परिवारों की खुशियां छीन लीं, बल्कि सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन बच्चों ने भविष्य के सपने लेकर घर से कदम बाहर रखा था, वे अपने परिवारों के पास कभी वापस नहीं लौट सके। घटनास्थल पर मौजूद लोगों के मुताबिक, सबसे दर्दनाक पल वह था जब मोबाइल फोन पर मदद की गुहार लगाते बच्चों की आवाजें सुनाई दे रही थीं और उनके परिजन बाहर खड़े कुछ भी नहीं कर पा रहे थे।

यह हादसा उन परिवारों के लिए सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि ऐसा जख्म बन गया है जिसे शायद वक्त भी पूरी तरह नहीं भर पाएगा।

  

 
 


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Content Editor

Priya Yadav

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