₹18 करोड़ में बिकी जांगर सिंह श्याम की पेंटिंग, आदिवासी कला के इस कलाकार ने बनाया रिकॉर्ड
punjabkesari.in Tuesday, Sep 29, 2026 - 04:55 PM (IST)
नारी डेस्क : भारत की आदिवासी कला को वैश्विक पहचान दिलाने वाले कलाकार जांगर सिंह श्याम एक बार फिर चर्चा में हैं। मध्य प्रदेश के रहने वाले इस प्रसिद्ध कलाकार की 1999 में बनाई गई एक ऐक्रेलिक पेंटिंग मुंबई की पुंडोले नीलामी में ₹18 करोड़ के हैमर प्राइस पर बिकी। यह उनकी किसी भी कृति के लिए नीलामी में अब तक की सबसे बड़ी कीमत है। खास बात यह है कि इस पेंटिंग का अनुमानित मूल्य ₹4 से ₹6 करोड़ रखा गया था, लेकिन बोली लगने के बाद इसकी कीमत कई गुना बढ़ गई।
कौन थे जांगर सिंह श्याम?
जांगर सिंह श्याम का जन्म 1962 में मध्य प्रदेश के मंडला जिले के पाटनगढ़ गांव में हुआ था। वह पर्धान गोंड समुदाय से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने अपने समुदाय की पारंपरिक कहानियों, प्रकृति, जीव-जंतुओं और आध्यात्मिक मान्यताओं को चित्रों के जरिए एक अलग पहचान दी। उनकी कला में बारीक बिंदुओं और रेखाओं का खास इस्तेमाल दिखाई देता है, जिसे आगे चलकर ‘जांगरह कलम’ के नाम से पहचान मिली।

मिट्टी की दीवारों से बड़े कला मंचों तक पहुंची कला
जांगर की शुरुआती कला गांवों की मिट्टी की दीवारों पर दिखाई देती थी। 1980 के दशक की शुरुआत में उनकी मुलाकात प्रसिद्ध कलाकार जगदीश स्वामीनाथन से हुई। स्वामीनाथन ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें भोपाल स्थित भारत भवन में काम करने का अवसर दिया। यहीं से उनकी कला ने स्थानीय सीमाओं से बाहर निकलकर आधुनिक भारतीय कला की दुनिया में अपनी जगह बनानी शुरू की। उन्होंने पारंपरिक पर्धान गोंड कला की दृश्य भाषा को कागज और कैनवास पर उतारते हुए अपनी एक अलग शैली विकसित की। उनकी कृतियों में पेड़, पक्षी, जानवर, देवी-देवता और आध्यात्मिक आकृतियां प्रमुखता से दिखाई देती हैं।

₹18 करोड़ वाली पेंटिंग में क्या खास है?
पुंडोले में नीलाम हुई 1999 की यह बिना शीर्षक वाली पेंटिंग काफी बड़े आकार की है। करीब 91×69 इंच। इसमें पेड़ के बीच एक आध्यात्मिक आकृति दिखाई देती है, जिसके आसपास सांप और पक्षी नजर आते हैं। यह कृति इससे पहले किसी नीलामी में पेश नहीं की गई थी। इसकी शुरुआती अनुमानित कीमत ₹4–6 करोड़ थी। नीलामी के दौरान बोली करीब ₹7–9 करोड़ तक पहुंचने के बाद मुकाबला तेज हुआ। आखिरकार एक खरीदार ने ₹18 करोड़ की हैमर बोली लगाकर इसे अपने नाम कर लिया।

एक ही सप्ताह में बना दूसरा रिकॉर्ड भी
दिलचस्प बात यह है कि जांगर सिंह श्याम की कला ने इसी सप्ताह एक और बड़ा रिकॉर्ड बनाया था। इससे पांच दिन पहले मुंबई की सफ्रोनआर्ट नीलामी में उनकी ‘बेल मुखोटा (गोंड)’ नाम की कृति लगभग ₹2.88 करोड़ में बिकी थी। इसने उस समय कलाकार के लिए नया रिकॉर्ड बनाया था, जिसे कुछ ही दिनों बाद पुंडोले की ₹18 करोड़ वाली बिक्री ने काफी पीछे छोड़ दिया।
आदिवासी कला के लिए क्यों खास है यह रिकॉर्ड?
जांगर सिंह श्याम की बढ़ती नीलामी कीमत सिर्फ एक कलाकार की सफलता नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे भारतीय आदिवासी कला की बढ़ती स्वीकार्यता के रूप में भी देखा जा रहा है। लंबे समय तक आदिवासी कला को मुख्यधारा की आधुनिक कला से अलग रखकर देखा जाता रहा, लेकिन जांगर की कृतियों की बढ़ती मांग इस धारणा को बदलती दिखाई दे रही है। उनकी कला ने पर्धान गोंड समुदाय की परंपराओं और कहानियों को आधुनिक चित्रकला की भाषा में दुनिया के सामने रखा। यही वजह है कि आज उनकी कृतियां भारतीय कला बाजार में बड़े संग्रहकर्ताओं की रुचि का हिस्सा बन रही हैं।

जांगर सिंह श्याम की विरासत
जांगर सिंह श्याम का जीवन हालांकि लंबा नहीं रहा। 2001 में 40 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। उनके असमय निधन के कारण उनकी मौलिक कृतियों की संख्या सीमित है, जो कला बाजार में उनकी रचनाओं की दुर्लभता का एक महत्वपूर्ण कारण भी मानी जाती है। आज उनकी कला जिस कीमत पर नीलाम हो रही है, वह इस बात का संकेत है कि भारतीय कला जगत में आदिवासी और स्वदेशी कलाकारों की रचनाओं को तेजी से नई पहचान मिल रही है। ₹18 करोड़ का यह रिकॉर्ड जांगर सिंह श्याम की कलात्मक विरासत को एक नई ऊंचाई देता है और पर्धान गोंड समुदाय की कला को भी वैश्विक कला बाजार में मजबूत जगह दिलाता है।

