Influencer को हुई Skin की Rare बीमारी, पहले समझती रहीं Sunburn, बाद में खुला राज

punjabkesari.in Wednesday, Oct 21, 2026 - 04:01 PM (IST)

नारी डेस्क:   चेहरे, गर्दन या शरीर के दूसरे हिस्सों पर अचानक काले धब्बे दिखाई देने लगें, तो कई लोग इसे धूप में रहने का असर या सामान्य टैनिंग समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन हर बार त्वचा का रंग बदलने की वजह धूप नहीं होती। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और बिजनेसवुमन सारा सरोश के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। गोवा में छुट्टियां मनाने के दौरान उनके शरीर पर गहरे रंग के निशान दिखाई देने लगे। शुरुआत में उन्हें लगा कि यह सनबर्न या टैनिंग के कारण हुआ है। हालांकि, करीब एक साल तक धब्बे बने रहने और धीरे-धीरे शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने के बाद उन्होंने त्वचा रोग विशेषज्ञ से सलाह ली। जांच के बाद उन्हें लाइकेन प्लेनस पिगमेंटोसस (Lichen Planus Pigmentosus या LPP) नाम की त्वचा संबंधी बीमारी के बारे में पता चला। सारा ने सोशल मीडिया पर अपना अनुभव साझा करते हुए लोगों को त्वचा में होने वाले ऐसे बदलावों को नजरअंदाज न करने की सलाह दी है।

गोवा की छुट्टियों के दौरान पहली बार दिखे थे काले धब्बे

सारा सरोश के मुताबिक, गोवा की यात्रा के दौरान उन्होंने पहली बार अपनी त्वचा पर गहरे रंग के निशान देखे थे। समुद्र किनारे समय बिताने के कारण उन्हें लगा कि तेज धूप से त्वचा का रंग बदल गया है। शुरुआत में उन्होंने इसे सामान्य टैनिंग समझा और उम्मीद की कि कुछ दिनों में त्वचा पहले जैसी हो जाएगी। लेकिन समय बीतने के बाद भी धब्बे कम नहीं हुए। इसके बजाय उनका रंग गहरा होने लगा और पिगमेंटेशन पीठ तथा छाती तक फैलने लगा। जब काफी समय तक कोई सुधार नहीं दिखा, तो सारा ने त्वचा रोग विशेषज्ञ से संपर्क किया। जांच के बाद उन्हें पता चला कि उनकी परेशानी सामान्य टैनिंग नहीं, बल्कि LPP नाम की त्वचा संबंधी स्थिति हो सकती है। सारा का अनुभव इस बात की याद दिलाता है कि त्वचा पर लगातार बने रहने वाले या फैलने वाले धब्बों को केवल धूप का असर मानकर छोड़ देना ठीक नहीं है।

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मुश्किल दौर के बाद शुरू हुई त्वचा की परेशानी

सारा ने अपनी बीमारी के बारे में बताते हुए जिंदगी के एक तनावपूर्ण दौर का भी जिक्र किया। उनके अनुसार, पिछले साल उनके वेयरहाउस में आग लग गई थी। इस घटना के बाद उन्हें कई तरह की परेशानियों और मानसिक तनाव से गुजरना पड़ा। सारा ने बताया कि घटना के करीब तीन सप्ताह बाद गोवा में उनकी त्वचा पर पिगमेंटेशन दिखाई देने लगा। डॉक्टर ने उनसे उस समय चल रहे तनाव और जीवन की परिस्थितियों के बारे में भी सवाल किए थे। हालांकि, सारा ने यह दावा नहीं किया कि वेयरहाउस में लगी आग या उससे पैदा हुआ तनाव ही उनकी बीमारी की वजह था। किसी एक घटना को LPP का सीधा कारण मानने के लिए वैज्ञानिक प्रमाण जरूरी हैं। फिलहाल इस बीमारी के सटीक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।

क्या है लाइकेन प्लेनस पिगमेंटोसस?

लाइकेन प्लेनस पिगमेंटोसस को संक्षेप में LPP कहा जाता है। यह त्वचा में होने वाली एक लंबे समय तक बनी रह सकने वाली सूजन संबंधी स्थिति है। इसमें त्वचा पर भूरे, गहरे भूरे या स्लेटी रंग के धब्बे दिखाई देने लगते हैं। इस बीमारी में त्वचा के अंदर होने वाली सूजन के कारण रंग बनाने वाले तत्व यानी मेलेनिन के वितरण पर असर पड़ सकता है। इसके परिणामस्वरूप त्वचा के कुछ हिस्सों का रंग गहरा दिखाई देने लगता है। यह स्थिति लाइकेन प्लेनस नाम की त्वचा संबंधी बीमारी से जुड़ी मानी जाती है, लेकिन हर मरीज में इसके लक्षण और गंभीरता एक जैसे नहीं होते। कई बार धब्बे बिना किसी खास दर्द या परेशानी के दिखाई देते हैं। कुछ लोगों को खुजली या जलन भी हो सकती है। चूंकि शुरुआत में इसके निशान सामान्य पिगमेंटेशन जैसे लग सकते हैं, इसलिए कई लोग लंबे समय तक इसकी सही वजह नहीं समझ पाते।

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शरीर के किन हिस्सों पर दिखाई देते हैं LPP के निशान?

लाइकेन प्लेनस पिगमेंटोसस के धब्बे शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर दिखाई दे सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं

चेहरा: चेहरे पर भूरे या गहरे रंग के धब्बे बन सकते हैं।

गर्दन: गर्दन के आसपास त्वचा का रंग गहरा दिखाई दे सकता है।

छाती और पीठ: कुछ लोगों में पिगमेंटेशन शरीर के इन हिस्सों तक भी फैल सकता है।

धूप के संपर्क में आने वाले हिस्से: कुछ मरीजों में त्वचा के खुले हिस्सों पर भी ऐसे निशान दिखाई देते हैं।

हर व्यक्ति में धब्बों का रंग, आकार और फैलने का तरीका अलग हो सकता है। कुछ लोगों में निशान धीरे-धीरे बढ़ते हैं, जबकि कुछ में लंबे समय तक बने रह सकते हैं।

क्या LPP एक ऑटोइम्यून बीमारी है?

ऑटोइम्यून बीमारियों में शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपने ही स्वस्थ ऊतकों पर हमला करने लगती है। लाइकेन प्लेनस से जुड़ी स्थितियों में प्रतिरक्षा प्रणाली की भूमिका मानी जाती है। LPP में भी त्वचा की सूजन के पीछे प्रतिरक्षा प्रणाली से जुड़ी प्रक्रिया शामिल हो सकती है। हालांकि, LPP के सटीक कारणों को अभी पूरी तरह नहीं समझा गया है। इसलिए इसे हर मामले में निश्चित रूप से एक ऑटोइम्यून बीमारी कहना सही नहीं होगा। साथ ही, LPP होने का मतलब यह भी नहीं है कि व्यक्ति को कोई दूसरी ऑटोइम्यून बीमारी जरूर है। केवल त्वचा पर काले धब्बे दिखाई देने से इस बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसके लिए त्वचा रोग विशेषज्ञ की जांच जरूरी होती है।

क्या धूप और तनाव से बढ़ सकती है यह परेशानी?

LPP के कारणों और इसे प्रभावित करने वाले कारकों पर अभी भी अध्ययन किया जा रहा है। कुछ मामलों में धूप और अल्ट्रावायलेट किरणों के संपर्क, कुछ रसायनों और दवाओं की भूमिका पर विचार किया गया है। हालांकि, हर मरीज में बीमारी की एक निश्चित वजह मिलना जरूरी नहीं है। तनाव शरीर पर कई तरह से असर डाल सकता है, लेकिन केवल तनाव को LPP का सीधा कारण मानने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। सारा सरोश के मामले में भी उनके तनावपूर्ण अनुभव और त्वचा की परेशानी के बीच सीधे संबंध की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसलिए अगर त्वचा पर धब्बे दिखाई देने लगें, तो उनकी वजह का अनुमान खुद लगाने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है।

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सामान्य टैनिंग और LPP में क्या अंतर है?

सामान्य टैनिंग और LPP में अंतर समझना जरूरी है, क्योंकि दोनों में त्वचा का रंग गहरा दिखाई दे सकता है।

सामान्य टैनिंग: तेज धूप में रहने के कारण त्वचा में मेलेनिन का उत्पादन बढ़ सकता है, जिससे रंग गहरा हो जाता है। धूप से बचाव करने और समय बीतने के साथ टैनिंग धीरे-धीरे कम हो सकती है।

LPP: इसमें त्वचा पर गहरे रंग के धब्बे लंबे समय तक बने रह सकते हैं। कुछ मामलों में ये धब्बे धीरे-धीरे फैल भी सकते हैं और इन्हें हल्का होने में काफी समय लग सकता है। हालांकि, केवल धब्बों के रंग या आकार को देखकर दोनों में अंतर करना हमेशा संभव नहीं होता। मेलाज्मा, दवाओं के कारण होने वाला पिगमेंटेशन और त्वचा की दूसरी समस्याएं भी इसी तरह के निशान पैदा कर सकती हैं। इसलिए लंबे समय तक बने रहने वाले या फैलने वाले धब्बों की जांच कराना जरूरी है।

डॉक्टर कैसे करते हैं बीमारी की पहचान

LPP की पहचान के लिए त्वचा रोग विशेषज्ञ सबसे पहले धब्बों का रंग, आकार, जगह और उनकी अवधि देखते हैं। डॉक्टर मरीज से यह भी पूछ सकते हैं कि निशान कब दिखाई दिए, क्या वे फैल रहे हैं और क्या उनके साथ खुजली या जलन जैसी परेशानी भी है। कुछ मामलों में बीमारी की पुष्टि करने या त्वचा की दूसरी समस्याओं से अंतर समझने के लिए स्किन बायोप्सी की सलाह दी जा सकती है। इस जांच में त्वचा का बहुत छोटा नमूना लेकर माइक्रोस्कोप से उसकी जांच की जाती है। हालांकि, हर मरीज को बायोप्सी की जरूरत नहीं होती। इसका फैसला डॉक्टर मरीज की स्थिति के आधार पर करते हैं।

क्या LPP का इलाज संभव है?

LPP का इलाज मरीज की त्वचा की स्थिति, सूजन और पिगमेंटेशन की गंभीरता पर निर्भर करता है। ऐसा कोई एक उपचार नहीं है जो हर मरीज में समान रूप से असर करे। डॉक्टर जरूरत के अनुसार सूजन कम करने वाली दवाएं, त्वचा पर लगाने वाली क्रीम या पिगमेंटेशन को नियंत्रित करने के लिए दूसरे उपचार सुझा सकते हैं। इस स्थिति में धब्बों को हल्का होने में लंबा समय लग सकता है। कुछ लोगों में बीमारी की सक्रियता कम होने के बाद भी त्वचा का गहरा रंग लंबे समय तक बना रह सकता है। इसलिए इलाज का उद्देश्य बीमारी की गतिविधि को नियंत्रित करना और त्वचा के रंग में आए बदलाव को कम करना हो सकता है।

बिना डॉक्टर की सलाह के स्टेरॉयड क्रीम, तेज केमिकल वाले प्रोडक्ट या पिगमेंटेशन हटाने के घरेलू नुस्खे इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। गलत उत्पाद त्वचा में जलन पैदा कर सकते हैं और कुछ मामलों में रंगत की समस्या बढ़ा सकते हैं।

त्वचा पर काले धब्बे दिखें तो क्या करें?

अगर चेहरे, गर्दन, छाती या पीठ पर अचानक गहरे रंग के धब्बे दिखाई देने लगें, तो उनकी अवधि और बदलाव पर ध्यान दें। यदि निशान लगातार बढ़ रहे हों, रंग गहरा हो रहा हो या कई सप्ताह तक बने रहें, तो त्वचा रोग विशेषज्ञ से सलाह लें।इसके अलावा, धूप में निकलते समय त्वचा को ढकना और अपनी त्वचा के अनुकूल सनस्क्रीन इस्तेमाल करना मददगार हो सकता है। ध्यान रखें कि सनस्क्रीन LPP का इलाज नहीं है, लेकिन धूप से बचाव त्वचा की देखभाल का अहम हिस्सा है। बिना चिकित्सकीय सलाह के कई तरह की क्रीम एक साथ लगाने से भी बचें।

सारा सरोश ने लोगों को क्या सलाह दी?

सारा सरोश ने अपने अनुभव के जरिए लोगों को त्वचा में होने वाले बदलावों के प्रति सतर्क रहने का संदेश दिया है। शुरुआत में जिन निशानों को उन्होंने सनबर्न समझा था, वे लंबे समय तक बने रहे और धीरे-धीरे शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने लगे। बाद में डॉक्टर की जांच से उन्हें अपनी त्वचा की स्थिति के बारे में पता चला।

उनका अनुभव बताता है कि त्वचा पर दिखाई देने वाले हर काले धब्बे को सामान्य टैनिंग मानना सही नहीं है। अगर निशान लंबे समय तक बने रहें या उनका रंग और आकार बदलने लगे, तो समय पर जांच कराना जरूरी है।

ध्यान रखें: त्वचा पर पिगमेंटेशन होने का मतलब हमेशा LPP नहीं होता। सही कारण जानने के लिए त्वचा रोग विशेषज्ञ से जांच कराएं और बिना सलाह के कोई दवा या क्रीम इस्तेमाल न करें।

  


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Content Editor

Priya Yadav

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