Parents ही नहीं, आज का पूरा System बच्चों को बना रहा Anxiety का शिकार

punjabkesari.in Wednesday, May 27, 2026 - 12:53 PM (IST)

नारी डेस्क:  आजकल शहरों के ज्यादातर घरों में शाम का एक जैसा दृश्य देखने को मिलता है। बच्चा डाइनिंग टेबल पर बैठा होमवर्क पूरा कर रहा होता है, एक पैरेंट लैपटॉप पर ऑफिस के ईमेल्स का जवाब दे रहा होता है और दूसरा फोन पर लगातार मैसेज और कॉल्स में व्यस्त रहता है। बाहर से सबकुछ सामान्य दिखाई देता है, लेकिन घर का माहौल भीतर से शांत नहीं होता। किसी के पास एक-दूसरे के लिए समय तो होता है, मगर सुकून नहीं। धीरे-धीरे यही माहौल बच्चों के मन पर असर डालने लगता है। उन्हें अलग से यह बताने की जरूरत नहीं पड़ती कि जिंदगी एक रेस बन चुकी है। वे अपने आसपास देखकर खुद ही समझ जाते हैं कि हर किसी को जल्दी है, हर किसी पर दबाव है और हर किसी को आगे निकलना है।

बच्चे शब्दों से नहीं, माहौल से सीखते हैं

बच्चे बहुत छोटी उम्र से ही अपने घर का भावनात्मक माहौल समझने लगते हैं। वे नोटिस करते हैं कि बड़े लोग हर वक्त फोन नोटिफिकेशन, टारगेट, मीटिंग और डेडलाइन में उलझे रहते हैं। यहां तक कि छुट्टियों वाले दिन भी पूरी तरह आराम नहीं होता। ऐसे माहौल में बच्चे धीरे-धीरे यह मानने लगते हैं कि लगातार व्यस्त रहना ही सफलता की निशानी है। वे यह महसूस करने लगते हैं कि अगर वे रुके या पीछे रह गए, तो शायद उनकी कोई अहमियत नहीं रहेगी।

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सिर्फ Parenting को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं

जब बच्चों में Anxiety, Stress या Emotional Breakdown की बात होती है, तो सबसे पहले सवाल पैरेंटिंग पर उठते हैं। लोग पूछते हैं कि क्या माता-पिता बच्चों पर ज्यादा दबाव डाल रहे हैं? क्या स्क्रीन टाइम ज्यादा है? क्या बच्चों को जरूरत से ज्यादा कंट्रोल किया जा रहा है? ये सवाल जरूरी जरूर हैं, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं बताते। असली समस्या उससे कहीं बड़ी है। आज का पूरा सिस्टम ही ऐसा बन चुका है जहां हर इंसान लगातार दबाव में जी रहा है। Parents भी उसी भागदौड़ का हिस्सा हैं।

काम का दबाव घर के माहौल को बदल रहा है

आज ज्यादातर परिवारों की जिंदगी नौकरी और प्रोफेशनल जिम्मेदारियों के हिसाब से चल रही है। माता-पिता बच्चों से प्यार जरूर करते हैं, लेकिन उनके पास समय और मानसिक ऊर्जा दोनों की कमी होती जा रही है। कई बच्चे ऐसे हैं जो अपने माता-पिता से दिनभर में मुश्किल से कुछ मिनट बात कर पाते हैं। सुबह जल्दी ऑफिस और रात को थककर घर लौटना अब आम बात हो गई है। ऐसे में बच्चों के मन की बातें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं। यही वजह है कि कई बच्चे बिना किसी बड़े हादसे के भी अंदर ही अंदर तनाव और अकेलेपन से जूझने लगते हैं।

स्कूलों में भी बढ़ रहा है Pressure

सिर्फ घर ही नहीं, स्कूलों का माहौल भी बच्चों पर भारी पड़ रहा है। हर जगह Competition बढ़ता जा रहा है। Marks, Ranking, Performance और Achievements को लेकर लगातार तुलना की जाती है। अब Extra Activities भी बच्चों की खुशी के लिए नहीं, बल्कि Future Profile मजबूत करने के लिए कराई जाने लगी हैं। बच्चे धीरे-धीरे यह महसूस करने लगते हैं कि उन्हें हर वक्त बेहतर साबित होना है। सबसे बड़ी बात यह है कि कई बच्चे Fail होने से ज्यादा इस बात से डरते हैं कि वे “Enough” नहीं हैं।

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हर परेशानी का हल सिर्फ Counselling नहीं

आजकल बच्चों की Mental Health को लेकर जागरूकता बढ़ी है और Counselling Services भी पहले से ज्यादा उपलब्ध हैं। यह अच्छी बात है, लेकिन अगर बड़ी संख्या में बच्चे Stress और Anxiety महसूस कर रहे हैं, तो हमें सिर्फ इलाज नहीं बल्कि उसकी जड़ पर भी ध्यान देना होगा। अगर पूरा माहौल ही लगातार दबाव और Competition से भरा होगा, तो सिर्फ Counselling से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो सकती।

बच्चों को चाहिए Balance और Emotional Safety

यह लेख Ambition या मेहनत के खिलाफ नहीं है। मेहनत और सपने जरूरी हैं, लेकिन बच्चों को ऐसा बचपन भी मिलना चाहिए जहां वे बिना डर और तुलना के खुद को समझ सकें। अगर बड़े लोग हमेशा भागदौड़ और तनाव में रहेंगे, तो बच्चे भी वही सीखेंगे। अगर हर चीज को Performance से जोड़ा जाएगा, तो बच्चे अपनी पहचान को सिर्फ सफलता से जोड़ने लगेंगे।

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अब सिस्टम बदलने की जरूरत है

अगर हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ी emotionally strong और mentally healthy बने, तो घर, स्कूल और Workplace तीनों जगह बदलाव लाने होंगे। बच्चों को ऐसा माहौल देना होगा जहां आराम करना कमजोरी न माना जाए और जहां सिर्फ जीतना ही जिंदगी का मकसद न हो। जब तक हम सिर्फ परिवारों को दोष देते रहेंगे और उस सिस्टम को नहीं बदलेंगे जो हर किसी पर लगातार दबाव बना रहा है, तब तक बच्चों की Mental Health Crisis बढ़ती ही जाएगी।
 

 
 


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Content Editor

Priya Yadav

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