आपके बच्चे को भी हो गया है डिजिटल जुनून? तो उसे सजा ना दो उसकी तकलीफ समझो
punjabkesari.in Monday, Feb 09, 2026 - 10:56 AM (IST)
नारी डेस्क: मोबाइल, टैबलेट और वीडियो गेम्स आज बच्चों की दुनिया का अहम हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक सब कुछ एक स्क्रीन में सिमट गया है। लेकिन यही डिजिटल जुनून धीरे-धीरे बच्चों के लिए साइलेंट किलर साबित हो रहा है, क्योंकि इसका असर शोर नहीं मचाता सीधे उनके मन, शरीर और भविष्य पर चोट करता है।

कैसे बन रहा है डिजिटल जुनून ख़तरनाक?
मानसिक सेहत पर वार: ज्यादा स्क्रीन टाइम से चिड़चिड़ापन, एंग्ज़ायटी, ध्यान की कमी और अकेलापन बढ़ता है।
नींद का दुश्मन: देर रात तक स्क्रीन देखने से नींद का चक्र बिगड़ता है, जिससे सीखने और याददाश्त पर असर पड़ता है।
शारीरिक नुकसान:आंखों में जलन, सिरदर्द, गर्दन-पीठ दर्द और मोटापे का जोखिम बढ़ता है।
सोशल स्किल्स कमजोर:असली दोस्तों और परिवार से दूरी बढ़ती है; बातचीत और भावनात्मक समझ घटती है।
आदत से लत तक: गेम्स और शॉर्ट वीडियोज़ का डोपामिन हिट बच्चों को बार-बार स्क्रीन की ओर खींचता है।
बच्चों की हालत बिगड़ने के संकेत
मोबाइल, टैबलेट और गेम्स की चमक के पीछे छिपी है बच्चों की मौन पुकार जो वे शब्दों में नहीं, व्यवहार में ज़ाहिर कर रहे हैं। ऐसे में अगर बच्चा स्क्रीन हटते ही बेचैनी, रोना या गुस्सा करने लगता है तो यह खतरे की चेतावनी है। नजर रखें कि बच्चा देर से तो नहीं सो रहा और बार- बार जागता तो नहीं। डिजिटल जुनून का सबसे बड़ा इशारा है कि बच्चे का पढ़ाई में ध्यान कम लगने लगता है, होमवर्क से बचने लगता है। अगर बच्चा दोस्तों से कट रहा है या परिवार से बातचीत कम कर रहा है तो यह भी खतरे की निशानी है। बच्चे के शरीर पर ही इसका असर दिखने लगता है , उन्हें अकसर आंखों में जलन, सिरदर्द, गर्दन/पीठ दर्द की शिकायत रहती है। ये संकेत बताते हैं कि बच्चा ओवरस्टिमुलेशन और डिजिटल थकान से जूझ रहा है पर बोल नहीं पा रहा।

पेरेंट्स सुनें बच्चों की मौन आवाज
पहले तो बच्चे को जज ना करें “क्यों खेल रहे हो?” की जगह पूछें“तुम्हें इसमें क्या अच्छा लगता है?”। पेरेंट्स का खुद का स्क्रीन व्यवहार बच्चे कॉपी करते हैं, इसलिए रोज 20–30 मिनट बिना फोन के साथ बैठें। बच्चा खुद खुलने लगेगा। स्क्रीन टाइम, खेल, पढ़ाई और नींद सबका संतुलित टाइमटेबल बनाएं । बच्चे को आउटडोर खेल, ड्रॉइंग, म्यूज़िक, बोर्ड गेम्स के चॉइस दें। डिजिटल डिटॉक्स को सज़ा न बनाएं, वीकेंड पर फैमिली डिजिटल ब्रेक सब साथ में।
कब प्रोफेशनल मदद लें?
अगर बच्चा लगातार उदास, अत्यधिक आक्रामक या पूरी तरह अलग-थलग हो रहा है, तो काउंसलर/चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट से बात करना समझदारी है। याद रखें स्क्रीन दुश्मन नहीं, असंतुलन दुश्मन है। बच्चों की मौन पुकार सुनने के लिए उन्हें “कम फोन” नहीं, ज़्यादा समझ चाहिए।

