10-11 जुलाई को योगिनी एकादशी व्रत, पूजा के बाद जरूर पढ़ें यह कथा, मिलेगा पुण्य का फल
punjabkesari.in Thursday, Jul 09, 2026 - 05:10 PM (IST)
नारी डेस्क: आषाढ़ माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को योगिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। सनातन धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा और व्रत करने से पापों से मुक्ति मिलती है तथा शुभ फल की प्राप्ति होती है। इस वर्ष गृहस्थ श्रद्धालु 10 जुलाई को योगिनी एकादशी का व्रत रखेंगे, जबकि वैष्णव परंपरा का पालन करने वाले भक्त 11 जुलाई को व्रत करेंगे।
एकादशी तिथि और पारण का समय
वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण एकादशी तिथि 10 जुलाई सुबह 8:16 बजे से शुरू होकर 11 जुलाई सुबह 5:22 बजे तक रहेगी। गृहस्थों के लिए पारण का समय: 11 जुलाई, दोपहर 1:50 बजे से शाम 4:36 बजे तक। वैष्णव श्रद्धालुओं के लिए पारण का समय: 12 जुलाई, सुबह 5:32 बजे से सुबह 8:18 बजे तक। व्रत का पारण निर्धारित समय में ही करना शुभ माना जाता है।

योगिनी एकादशी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, योगिनी एकादशी का व्रत श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से व्यक्ति के पापों का क्षय होता है और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन व्रत कथा का श्रवण करने से विशेष पुण्य मिलता है। पौराणिक ग्रंथों में इसका फल अत्यंत महान बताया गया है।
भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाया था इस व्रत का महत्व
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से आषाढ़ कृष्ण पक्ष की एकादशी के महत्व, विधि और फल के बारे में जानने की इच्छा जताई। तब भगवान श्रीकृष्ण ने बताया कि यह योगिनी एकादशी कहलाती है। उन्होंने कहा कि जो श्रद्धालु इस व्रत को पूरी श्रद्धा और नियम के साथ करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं और उसे उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
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अलकापुरी के राजा कुबेर और हेम माली की कथा
प्राचीन समय में अलकापुरी पर धन के देवता कुबेर का शासन था। वे भगवान शिव के परम भक्त थे और प्रतिदिन उनकी विधिपूर्वक पूजा करते थे। पूजा के लिए आवश्यक पुष्प लाने की जिम्मेदारी हेम नामक माली की थी। हेम की पत्नी विशालाक्षी अत्यंत सुंदर थी। एक दिन वह मानसरोवर से फूल लेकर तो आया, लेकिन उन्हें समय पर राजा के पास पहुंचाने के बजाय पत्नी के साथ समय बिताने में व्यस्त हो गया। उधर शिव पूजा का समय बीतता जा रहा था और राजा कुबेर फूलों की प्रतीक्षा कर रहे थे।

राजा कुबेर का श्राप
जब हेम समय पर नहीं पहुंचा तो राजा ने सैनिकों को कारण जानने भेजा। सैनिकों ने लौटकर बताया कि हेम अपनी पत्नी के साथ घर में आनंद-विनोद कर रहा है और पूजा के लिए फूल नहीं लाया। यह सुनकर राजा कुबेर क्रोधित हो गए। उन्होंने हेम को दरबार में बुलाया और भगवान शिव की पूजा में लापरवाही तथा कर्तव्य की अवहेलना करने पर उसे श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से हेम स्वर्ग से पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसका शरीर कोढ़ से ग्रस्त हो गया और वह अपनी पत्नी से भी बिछड़ गया।
कठिन कष्टों के बीच मिली आशा की किरण
धरती पर हेम को अत्यंत कठिन जीवन बिताना पड़ा। वह जंगलों में भटकता रहा, भूख-प्यास और बीमारी से पीड़ित रहा। उसके जीवन में चारों ओर केवल दुख ही दुख था। एक दिन भटकते-भटकते वह महर्षि मार्कंडेय के आश्रम पहुंचा। वहां उसने अपनी पूरी व्यथा सुनाई और इस कष्ट से मुक्ति पाने का उपाय पूछा।
मार्कंडेय ऋषि ने बताया योगिनी एकादशी का उपाय
महर्षि मार्कंडेय ने हेम को बताया कि यदि वह आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का व्रत पूरे विधि-विधान और श्रद्धा से करेगा तथा भगवान विष्णु की पूजा करेगा, तो उसके सभी पाप और कष्ट दूर हो जाएंगे। ऋषि के बताए अनुसार हेम ने योगिनी एकादशी का व्रत किया और भगवान विष्णु की आराधना की।

भगवान विष्णु की कृपा से मिला नया जीवन
व्रत के प्रभाव और भगवान विष्णु की कृपा से हेम के सभी कष्ट दूर हो गए। उसका कोढ़ समाप्त हो गया और वह पुनः अपने पूर्व स्वरूप में लौट आया। इसके बाद उसे स्वर्ग लौटने का अवसर मिला, जहां वह अपनी पत्नी विशालाक्षी के साथ सुखपूर्वक रहने लगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, योगिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा के साथ इस पौराणिक कथा का श्रवण या पाठ करना शुभ माना जाता है। श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में सुख-समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।
नोट: योगिनी एकादशी से जुड़े फल और मान्यताएं धार्मिक ग्रंथों एवं परंपराओं पर आधारित हैं। श्रद्धालु अपनी आस्था और परंपरा के अनुसार इनका पालन करते हैं।

