अपनों के नहीं मिले शव तो कुश-कास के पुतले बनाकर किया अंतिम संस्कार,  देखा नहीं जा रहा नेपाल का ये दर्द

punjabkesari.in Thursday, Sep 03, 2026 - 03:57 PM (IST)

नारी डेस्क: नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के आठ दिन बाद भी जिन लोगों का कोई सुराग नहीं मिल सका है, उनके परिवार अब उनके लौटने की आखिरी उम्मीद भी छोड़ने लगे हैं। लापता लोगों के शव तक न मिल पाने के कारण परिजन कुश घास से बने प्रतीकात्मक पुतलों के जरिए अंतिम संस्कार की रस्में निभाने को मजबूर हैं। त्रासदी का आलम यह है कि कई परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोने के साथ-साथ अपना घर और जीवनभर की जमा-पूंजी भी गंवा दी है। उनके पास अब शोक मनाने के लिए भी अपनी कोई छत नहीं बची है। 

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 कई गांव और बस्तियां हुए तबाह

भोटेकोशी नदी में 26 अगस्त को आयी बाढ़ अपने साथ घर, सड़कें और पुल बहा ले गई। इस आपदा में सैकड़ों लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता हो गए। त्रिशूली नदी के किनारे बसे कई गांव और बस्तियां पूरी तरह तबाह हो गईं। 'ऑनलाइनखबर' समाचार पोर्टल ने बताया कि रसुवा जिले के पाहारेबेसी गांव में लोग आठ दिन से लापता अपने परिजनों की कोई खबर नहीं मिलने के बाद उनके लिए अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे हैं। हालांकि, इन परिवारों के लिए शोक की रस्में निभाना भी आसान नहीं है। कई परिवारों के घर और रहने की जगह बाढ़ में बह गई है, वहीं अंतिम संस्कार की रस्में कराने वाले पुजारियों की भी कमी है।


जलाए जा रहे प्रतीकात्मक पुतले


 रिपोर्ट के अनुसार, पाहारेबेसी के 20 से अधिक परिवार शोक की अवधि पूरी करने के लिए काठमांडू और अन्य स्थानों के लिए रवाना हो चुके हैं, जबकि कई अन्य परिवार भी वहां से जाने की तैयारी कर रहे हैं। 'द काठमांडू पोस्ट' के अनुसार, बाढ़ प्रभावित इलाकों में उन परिजनों के लिए कुश घास से प्रतीकात्मक पुतले बनाए जा रहे हैं, जिनका अब तक कोई पता नहीं चल पाया है। उनके जिंदा मिलने की उम्मीद लगातार कम होती जा रही है और ऐसे में परिवार इन्हीं पुतलों के जरिए अंतिम संस्कार की रस्में पूरी कर रहे हैं। खबर में कहा गया है कि इस बीच, काठमांडू में शोक की रस्में निभाने वाले परिवारों के लिए बनाए गए कई सार्वजनिक आश्रय पहले से ही भर चुके हैं। इसके चलते बाढ़ प्रभावित कुछ परिवारों को कमरा खाली होने का इंतजार करना पड़ रहा है। 

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बाढ़ ने कर दिया सब बर्बाद

 किरियापुत्री भवन ऐसा विशेष आश्रय स्थल होता है, जहां हिंदू परिवार किसी परिजन की मृत्यु के बाद अनिवार्य 13 दिनों की शोक और क्रिया संबंधी रस्में पूरी करने के लिए ठहरते हैं। कुछ परिवार शव मिलने और अंतिम संस्कार करने के बाद भी काठमांडू जाने को मजबूर हुए, क्योंकि उनके गांवों में अब उनके घर ही नहीं बचे हैं, जहां वे शोक की पारंपरिक रस्में पूरी कर सकें। परिवारों ने बताया कि वे प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार का सहारा इसलिए ले रहे हैं क्योंकि सभी लापता लोगों के शव मिलने की उम्मीद बहुत कम रह गई है। इसके अलावा, बरामद शवों की पहचान करना भी लगातार मुश्किल होता जा रहा है। इस बाढ़ में 7,000 से अधिक घर बह गए, जबकि कई बचे हुए मकान भी रहने लायक नहीं रह गए हैं।  उत्तरी और मध्य नेपाल के बड़े हिस्से को नक्शे से लगभग मिटाने वाली इस आपदा ने परिवारों से सिर्फ उनके अपने प्रियजन ही नहीं छीने हैं, बल्कि उनके घर और वे बुनियादी सुविधाएं भी छीन ली हैं, जिनके सहारे वे अपने परिजनों की मौत के बाद शोक और अंतिम संस्कार की सदियों पुरानी परंपराएं निभा सकें। 


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Content Writer

vasudha

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