कैंसर की ज्यादातर दवाएं विदेश से क्यों मंगवाई जाती हैं?
punjabkesari.in Tuesday, Mar 03, 2026 - 06:24 PM (IST)
नारी डेस्क : कैंसर एक गंभीर और जानलेवा बीमारी है, जो हर साल लाखों लोगों की जान लेती है। भारत में भी हर साल बड़ी संख्या में लोग कैंसर की चपेट में आते हैं। इलाज के दौरान सबसे बड़ी चुनौती होती है। कैंसर की दवाओं की उपलब्धता और उनकी ऊंची कीमत। अक्सर देखा जाता है कि कैंसर की आधुनिक और प्रभावी दवाएं भारत में नहीं, बल्कि अमेरिका और यूरोप जैसे देशों से आयात की जाती हैं। सवाल यह है कि जब भारत जेनेरिक दवाओं का बड़ा केंद्र है, तो फिर कैंसर के इलाज में विदेशी दवाओं पर निर्भरता क्यों बनी हुई है?
रिसर्च और डेवलपमेंट सबसे बड़ी वजह
डॉक्टर के अनुसार, किसी नई कैंसर दवा को विकसित करने में औसतन 10 से 15 साल का समय लग जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में रिसर्च, लैब टेस्ट, क्लीनिकल ट्रायल और मंजूरी जैसे कई चरण शामिल होते हैं, जिन पर अरबों डॉलर का खर्च आता है। पश्चिमी देशों की बड़ी फार्मा कंपनियां दशकों से इस स्तर की रिसर्च में भारी निवेश कर रही हैं, जबकि भारत में अभी भी उतना मजबूत रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर और फंडिंग उपलब्ध नहीं है।

क्लीनिकल ट्रायल की जटिल प्रक्रिया
किसी भी कैंसर दवा को बाजार में लाने से पहले उसे कई कठिन क्लीनिकल ट्रायल से गुजरना पड़ता है। विकसित देशों में इन ट्रायल्स के लिए उन्नत तकनीक, बड़े पैमाने पर डेटा एनालिसिस और बेहतर मेडिकल सुविधाएं मौजूद हैं। यही कारण है कि नई और प्रभावी दवाओं का विकास अधिकतर अमेरिका और यूरोप में होता है।
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पेटेंट कानून बनता है बड़ी रुकावट
डॉक्टर बताते हैं कि जब कोई विदेशी कंपनी नई दवा विकसित करती है, तो वह उस पर पेटेंट ले लेती है। अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संपदा कानूनों के तहत 20 साल तक कोई दूसरी कंपनी उस दवा का जेनेरिक वर्जन नहीं बना सकती। इम्यूनोथेरेपी और बायोलॉजिक्स जैसी आधुनिक कैंसर दवाएं अभी भी पेटेंट के दायरे में हैं, इसलिए भारतीय कंपनियां उन्हें बनाने में सक्षम नहीं हैं और मरीजों को इन्हें आयात करना पड़ता है।

कच्चे माल पर आयात निर्भरता
भारत भले ही जेनेरिक दवाओं के निर्माण में आगे हो, लेकिन कैंसर की दवाओं के लिए जरूरी एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स (API) और विशेष रसायनों के मामले में देश काफी हद तक आयात पर निर्भर है। जटिल कैंसर दवाओं के लिए आवश्यक हाई-टेक रॉ मटेरियल का उत्पादन भारत में अभी सीमित है।
बायोलॉजिक्स और जीन थेरेपी में तकनीकी कमी
आज कैंसर का इलाज केवल कीमोथेरेपी तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्सनलाइज्ड मेडिसिन, बायोलॉजिक्स और जीन थेरेपी की ओर बढ़ रहा है। ये दवाएं जीवित कोशिकाओं से बनाई जाती हैं और इनके लिए अत्याधुनिक बायोटेक लैब की जरूरत होती है। अमेरिका और यूरोप में यह तकनीक दशकों से विकसित है, जबकि भारत अभी इस दिशा में शुरुआती चरण में है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि भारत तेजी से स्वदेशी कैंसर दवाओं और बायोसिमिलर्स की दिशा में आगे बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में रिसर्च, तकनीक और निवेश बढ़ने के साथ उम्मीद की जा रही है कि कैंसर के इलाज में विदेशी दवाओं पर निर्भरता धीरे-धीरे कम होगी।

