एक साड़ी बनी 21 जिंदगियों का सहारा, रोंगटे खड़े कर देगा नेपाल बाढ़ का ये किस्सा

punjabkesari.in Monday, Aug 31, 2026 - 12:50 PM (IST)

नारी डेस्क:  नेपाल-तिब्बत सीमा के पास आई बाढ़ और पहाड़ से अचानक गिरे पत्थरों ने 21 बुजुर्ग तीर्थयात्रियों को ऐसी मुसीबत में डाल दिया, जहां हर पल जिंदगी और मौत के बीच का फासला कम होता जा रहा था। बस छोड़कर सुरक्षित जगह तक पहुंचने के लिए उन्हें कीचड़ भरी खड़ी ढलान चढ़नी पड़ी। कई बार पैर फिसले, रास्ता भटका और नीचे गहरी खाई का डर सामने था। इसी मुश्किल घड़ी में एक साड़ी उनके लिए सहारा बनी और एक-एक कर 21 लोगों को ऊपर सुरक्षित पहुंचाने में मददगार साबित हुई। शुक्रवार रात काठमांडू से चेन्नई पहुंचे इन तीर्थयात्रियों ने अपने खौफनाक अनुभव को साझा किया। उन्होंने बताया कि करीब डेढ़ दिन तक उन्हें बचाव का इंतजार करना पड़ा। तीन बसों के काफिले में शामिल बाकी यात्रियों की शनिवार तक जानकारी नहीं मिल सकी थी। चेन्नई से यात्रा पर निकले 49 अन्य तीर्थयात्रियों के एक समूह का भी उस समय तक पता नहीं चल पाया था।

अचानक गूंज उठी बम धमाके जैसी आवाज

वेलाचेरी के मुरुगु नगर निवासी नवु कबीरदास और उनकी पत्नी विजया भुवनेश्वरी भी इस समूह में शामिल थे। दोनों ने बताया कि एक वक्त ऐसा आया जब उन्हें लगा कि शायद वे जिंदा नहीं बच पाएंगे। बाद में सुरक्षित बाहर निकलने पर उन्हें लगा जैसे उन्हें नया जीवन मिला हो। ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक, यह बुजुर्ग दंपति कुंभकोणम की एक एजेंसी के जरिए यात्रा कर रहे 57 लोगों के समूह का हिस्सा था। यह समूह तीन बसों में रासुवा से आगे बढ़ रहा था। काफिले की दूसरी बस कीचड़ में फंस गई थी और मरम्मत के लिए कुछ देर रुकना पड़ा। यात्रियों के मुताबिक, यही कुछ मिनट बाद में उनकी जान बचाने वाले साबित हुए। कबीरदास ने बताया कि अचानक तेज आवाज सुनाई दी। उन्होंने कहा कि आवाज इतनी जोरदार थी, जैसे कोई बम फटा हो। इसके बाद ऊपर से पत्थर गिरने लगे और देखते ही देखते बाढ़ का पानी तेजी से उनकी ओर बढ़ आया। हालात ऐसे हो गए जैसे अचानक किसी बांध का पानी छोड़ दिया गया हो।

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ड्राइवर ने खतरा भांपा और सबको बस से उतारा

विजया भुवनेश्वरी के मुताबिक, नेपाली ड्राइवर ने खतरे को सबसे पहले भांप लिया। उसने सभी यात्रियों को बस से बाहर निकलकर ऊपर की ओर भागने के लिए कहा और खुद भी वहां से निकल गया। इसके बाद यात्री भी जान बचाने के लिए उसके पीछे दौड़ पड़े। समूह में ज्यादातर लोगों की उम्र 50 साल से अधिक थी। उनके लिए कीचड़ से भरी ढलान पर चढ़ना आसान नहीं था। ऊपर पहुंचने की कोशिश में कई लोग बार-बार फिसलकर नीचे आ रहे थे। हर कदम बेहद संभलकर रखना पड़ रहा था।

एक साड़ी बनी जिंदगी की रस्सी

इसी दौरान समूह की सदस्य पूंगोडी ने अपनी साड़ी उतारकर उसे ऊपर से नीचे की ओर लटका दिया। साड़ी और वहां मौजूद एक केबल को सहारा बनाकर यात्रियों ने धीरे-धीरे ढलान पार करना शुरू किया। भुवनेश्वरी ने बताया कि सभी ने साड़ी और केबल को कसकर पकड़ा और उसके सहारे ऊपर चढ़े। इस दौरान एक महिला अकेले ऊपर नहीं चढ़ पा रही थी। तब समूह के लोगों ने उसे साड़ी कमर से बांधने को कहा और ऊपर मौजूद लोगों ने उसे पकड़कर खींच लिया। इस तरह एक-एक कर सभी 21 लोग सुरक्षित ऊंचाई तक पहुंच सके।

70-80 फीट ऊंची लहर की तरह बढ़ रहा था मलबा

कांचीपुरम के पंचायत यूनियन स्कूल की हेडमिस्ट्रेस सत्या भी इस समूह में थीं। उन्होंने बताया कि तीर्थयात्री सुबह करीब आठ बजे स्याब्रूबेसी से चीनी इमिग्रेशन के लिए निकले थे। उनकी बस काफिले के बीच में थी। तभी उन्हें सामने धूल का एक बड़ा गुबार दिखाई दिया। सत्या के मुताबिक, कुछ ही पलों में पत्थर और कीचड़ तेज लहर की तरह उनकी ओर बढ़ने लगे। उन्होंने बताया कि मलबे की ऊंचाई करीब 70 से 80 फीट तक दिखाई दे रही थी। उस समय किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर सुरक्षित जगह तक कैसे पहुंचा जाए।

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चार फीट चढ़ते तो पांच फीट नीचे फिसल जाते

सत्या ने बताया कि पहाड़ पर ऊपर जाने के लिए कोई साफ रास्ता नहीं था। यात्री जैसे-तैसे चढ़ने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन मिट्टी और कीचड़ के कारण स्थिति बेहद मुश्किल थी। उनके मुताबिक, चार फीट ऊपर चढ़ने के बाद कई बार पांच फीट नीचे फिसल जाना पड़ रहा था। मुश्किल रास्ते से गुजरते हुए यात्रियों ने एक व्यक्ति को कीचड़ में फंसा हुआ भी देखा। वह मदद के लिए हाथ हिला रहा था, लेकिन उस समय खुद की जान बचाना भी उनके लिए बड़ी चुनौती थी।

कैंप पहुंचकर मिली राहत, फोटो भेजकर दी सुरक्षित होने की खबर

काफी मशक्कत के बाद समूह आर्म्ड पुलिस फोर्स के कैंप तक पहुंचा। वहां उन्हें पानी और बिस्कुट मिले। कुछ यात्रियों के मोबाइल में नेटवर्क आ रहा था। इसी के जरिए उन्होंने तमिलनाडु में अपने परिजनों और परिचितों को एक तस्वीर भेजी, ताकि उन्हें भरोसा हो सके कि वे सुरक्षित हैं। हालांकि, यह राहत ज्यादा देर की नहीं थी। उन्हें अब भी सुरक्षित स्थान तक पहुंचना था और रास्ता आसान नहीं था।

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गलत रास्ते पर पहुंचे तो एक नेपाली ने दिखाई सही राह

अगले दिन यात्रियों ने झाड़ियों और संकरे रास्तों से करीब तीन घंटे पैदल सफर किया। उनका लक्ष्य उस जगह तक पहुंचना था, जहां से हेलीकॉप्टर के जरिए उन्हें निकाला जा सके। कबीरदास ने बताया कि रास्ते में एक जगह वे गलत दिशा में चले गए थे। तभी एक नेपाली व्यक्ति ने उन्हें सही रास्ता बताया। उन्हें पहले नीचे उतरना पड़ा और फिर दूसरी तरफ से ऊपर चढ़ना पड़ा। उनके मुताबिक, नीचे उतरना कई जगह ऊपर चढ़ने से भी ज्यादा मुश्किल था। उन्होंने बताया कि रास्ते में एक छोटी सी गलती भी भारी पड़ सकती थी। कुछ जगह ऐसी थीं, जहां से फिसलने पर करीब 50 फीट नीचे गिरने का खतरा था।

मिलिट्री हेलीकॉप्टर से निकाला गया, फिर पहुंचे चेन्नई

आखिरकार तीर्थयात्रियों को मिलिट्री हेलीकॉप्टर की मदद से सुरक्षित स्थान तक पहुंचाया गया। इसके बाद उनका सफर काठमांडू और नई दिल्ली होते हुए चेन्नई तक पहुंचा। मुश्किल सफर के दौरान कुछ यात्रियों के पासपोर्ट और दूसरे जरूरी दस्तावेज भी खो गए। इसके बावजूद 21 लोगों का सुरक्षित चेन्नई लौटना उनके लिए किसी नई जिंदगी से कम नहीं था। उनकी कहानी में जहां नेपाल की बाढ़ और भूस्खलन का खौफ है, वहीं एक साड़ी से जुड़ा वह पल भी है, जिसने मुश्किल वक्त में 21 लोगों को एक-दूसरे का सहारा बनकर आगे बढ़ने की हिम्मत दी। उस दिन उनके लिए वह साड़ी सिर्फ कपड़ा नहीं रही, बल्कि जिंदगी तक पहुंचने का सहारा बन गई।
  
 


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Content Editor

Priya Yadav

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