शरीर के सबसे अहम अंग को बूढ़ा बना रहा मोटापा, पेट की चर्बी है बेहद खतरनाक
punjabkesari.in Saturday, Jun 13, 2026 - 05:00 PM (IST)
नारी डेस्क: डॉक्टरों का कहना है कि आपका दिल आपकी सोच से ज़्यादा बूढ़ा हो सकता है। उन्होंने चेतावनी दी है कि भारत में मोटापा बढ़ने के कारण, कई लोगों की 'कार्डियक एज' (दिल की उम्र) उनकी असल उम्र से काफी ज़्यादा हो सकती है, जिससे उम्मीद से कहीं पहले दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। यह चिंता नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-6 (NFHS-6) के नतीजों के बाद सामने आई है, जिसमें भारतीय वयस्कों में मोटापे में तेज़ी से बढ़ोतरी देखी गई। सर्वे में पाया गया कि 2023-24 में 15-49 साल की उम्र की 30.7 प्रतिशत महिलाएं अधिक वज़न वाली या मोटापे से ग्रस्त थीं, जबकि NFHS-5 (2019-21) में यह आंकड़ा 24 प्रतिशत था। वहीं, पुरुषों में यह अनुपात 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 27.3 प्रतिशत हो गया।
दिल की बीमारियों का बढ़ रहा बोझ
विशेषज्ञों का कहना है कि इस ट्रेंड के साथ-साथ डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर (हाइपरटेंशन) के बढ़ते मामलों से दिल की बीमारियों का बोझ बढ़ सकता है। AIIMS, दिल्ली में कार्डियोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. नितिश नाइक ने कहा कि मोटापे, डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और सुस्त जीवनशैली वाले 35 साल के व्यक्ति का कार्डियोवैस्कुलर जोखिम प्रोफाइल काफी ज़्यादा उम्र वाले व्यक्ति जैसा हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, अधिक वजन और मोटापा गैर-संचारी रोगों (non-communicable diseases) के लिए प्रमुख जोखिम कारकों में से हैं, जिनमें दिल की बीमारी और स्ट्रोक शामिल हैं। ये बीमारियां दुनिया भर में मौत के प्रमुख कारण बनी हुई हैं। सुस्त जीवनशैली, ऑफिस में घंटों तक बैठे रहना, अस्वस्थ भोजन का सेवन और तनाव मोटापे को बढ़ावा देते हैं। कार्डियक एज (दिल की उम्र) के बारे में बताते हुए, कार्डियोवैस्कुलर सर्जन डॉ. चंदोला ने कहा कि यह दिल और रक्त वाहिकाओं की बायोलॉजिकल सेहत का पैमाना है। यह किसी व्यक्ति की उम्र (कितने साल वह जिया है) के बजाय अंग की शारीरिक स्थिति को दिखाता है।
बहुत देर बाद दिखाई देते हैं लक्षण
उन्होंने कहा कि 70 या 80 साल के व्यक्ति का दिल बहुत युवा हो सकता है अगर उसकी कार्डियोवैस्कुलर स्थिति अच्छी हो। इसी तरह, कम उम्र के व्यक्ति की कार्डियक एज ज़्यादा हो सकती है अगर उसमें कई जोखिम कारक मौजूद हों। डॉक्टर ने कहा- "लोग अक्सर सिर्फ़ शरीर के वज़न पर ध्यान देते हैं, लेकिन मेटाबोलिक सेहत भी उतनी ही जरूरी है। मोटापा चुपचाप रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ा सकता है और ब्लड प्रेशर बढ़ा सकता है। जब तक लक्षण दिखाई देते हैं, तब तक दिल और रक्त वाहिकाओं को काफ़ी नुकसान हो चुका होता है।" VMMC और सफदरजंग अस्पताल में कार्डियोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. एच.एस. इस्सर ने कहा कि शरीर में ज़्यादा फ़ैट, खासकर पेट के आसपास, क्रोनिक सूजन (inflammation) को बढ़ावा देता है, ब्लड प्रेशर बढ़ाता है, कोलेस्ट्रॉल का स्तर खराब करता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस को बढ़ावा देता है। ये सभी चीज़ें रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं और दिल पर ज़्यादा काम का बोझ डालती हैं। उन्होंने कहा कि मोटापा शायद ही कभी अकेले होता है।
पेट का मोटापा जयादा खतरनाक
उन्होंने कहा- "मोटापा कई मेटाबोलिक विकारों से गहराई से जुड़ा है, जिनमें डायबिटीज़, हाइपरटेंशन और असामान्य लिपिड स्तर शामिल हैं। ये सभी स्थितियां मिलकर कोरोनरी आर्टरी डिजीज़, हार्ट फेलियर और स्ट्रोक का जोखिम काफ़ी बढ़ा देती हैं। इसलिए, NFHS-6 में मोटापे में बढ़ोतरी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता का विषय है।" डॉ. इस्सर ने कहा कि पेट का मोटापा (एब्डॉमिनल ओबेसिटी) खास तौर पर खतरनाक होता है क्योंकि यह महत्वपूर्ण अंगों को घेर लेता है और मेटाबोलिक गड़बड़ी का कारण बनता है। उन्होंने विस्तार से बताया, "बहुत से लोग सिर्फ़ शरीर के वज़न पर ध्यान देते हैं, लेकिन कमर का घेरा और विसरल फ़ैट (अंदरूनी अंगों के आस-पास जमा चर्बी) भी उतने ही ज़रूरी हैं। हो सकता है कि कोई व्यक्ति देखने में बहुत ज़्यादा मोटा न लगे, फिर भी उसके पेट के हिस्से में जरूरत से ज़्यादा चर्बी जमा हो, जिससे दिल की बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है। यही एक वजह है कि भारतीयों में कम उम्र में ही दिल की बीमारियां देखने को मिल रही हैं।"

