वैज्ञानिकों ने बनाया मटर के दाने जितना ‘Mini-Brain’ जो पहले ही बता देगा दिमाग की बीमारी!
punjabkesari.in Friday, Jan 02, 2026 - 04:52 PM (IST)
नारी डेस्क : जैसे हम अपने शरीर की देखभाल करते हैं ताकि बीमार न पड़ें, वैसे ही हमारे दिमाग की देखभाल भी उतनी ही ज़रूरी होती है। अक्सर हम दिमाग से जुड़े छोटे-छोटे संकेतों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं, लेकिन यही लापरवाही आगे चलकर बड़ी मानसिक बीमारियों की वजह बन सकती है। इसी दिशा में वैज्ञानिकों ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। वैज्ञानिकों ने लैब में छोटे-छोटे दिमाग तैयार किए हैं, जिन्हें ‘मिनी-ब्रेन’ (Mini-Brain) या ब्रेन ऑर्गेनॉइड्स (Brain Organoid) कहा जाता है। ये मिनी-ब्रेन अब सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) और बाइपोलर डिसऑर्डर (Bipolar disorde) जैसी गंभीर मानसिक बीमारियों के शुरुआती संकेत पहचानने में मदद कर रहे हैं
क्या होते हैं ‘मिनी-ब्रेन’ (Mini-Brain)?
मिनी-ब्रेन असल दिमाग जैसे नहीं होते, लेकिन ये मटर के दाने जितने छोटे होते हैं और इंसानी दिमाग की कुछ अहम गतिविधियों की नकल करते हैं। इन्हें इंसान की त्वचा और रक्त कोशिकाओं से लैब में तैयार किया जाता है। अमेरिका के जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी (Johns Hopkins University) के वैज्ञानिकों ने इन मिनी-ब्रेन का इस्तेमाल करके यह समझने की कोशिश की कि सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) और बाइपोलर डिसऑर्डर (Bipolar disorde) से पीड़ित लोगों का दिमाग सामान्य लोगों से कैसे अलग काम करता है।

अब तक कैसे होता था मानसिक बीमारियों का पता?
अभी तक सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) और बाइपोलर डिसऑर्डर (Bipolar disorde) का पता सिर्फ लक्षणों और व्यवहार के आधार पर लगाया जाता था।
जैसे, सोचने में परेशानी
मूड में अचानक बदलाव
भ्रम या डर
भावनात्मक असंतुलन
इन बीमारियों का कोई पक्का मेडिकल टेस्ट नहीं था, जिससे सही पहचान करना मुश्किल हो जाता था।
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मिनी-ब्रेन से क्या नई जानकारी मिली?
वैज्ञानिकों ने तीन तरह के मिनी-ब्रेन बनाए
सिज़ोफ्रेनिया (Schizophrenia) मरीजों से
बाइपोलर डिसऑर्डर (Bipolar disorde) मरीजों से
पूरी तरह स्वस्थ लोगों से
इन मिनी-ब्रेन को माइक्रोचिप और सेंसर से जोड़कर उनकी न्यूरॉन गतिविधि (दिमागी कोशिकाओं के संकेत) का अध्ययन किया गया।

मशीन लर्निंग से मिली बड़ी सफलता
रिसर्च मे शीन लर्निंग तकनीक की मदद से दिमागी संकेतों को समझा।
बिना किसी उत्तेजना के मिनी-ब्रेन ने 83% सटीकता से बीमारी की पहचान की
जब मिनी-ब्रेन को हल्की इलेक्ट्रिक उत्तेजना दी गई, तो सटीकता बढ़कर 92% हो गई
इससे पता चला कि बीमारी से जुड़े दिमागी संकेत तब ज्यादा साफ दिखते हैं, जब दिमाग सक्रिय होता है।
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एक्सपर्ट क्या कहते हैं?
इस स्टडी की प्रमुख वैज्ञानिक एनी कथुरिया कहती हैं कि मानसिक बीमारियों को देखना मुश्किल होता है, क्योंकि इनमें दिमाग का कोई एक खास हिस्सा खराब नहीं होता। लेकिन मिनी-ब्रेन से अब हम यह समझ पा रहे हैं कि दिमाग अंदर से कैसे बदलता है।
भविष्य में क्या फायदा होगा?
इस खोज से भविष्य में कई बड़े फायदे हो सकते हैं।
मानसिक बीमारियों की जल्दी और सही पहचान।
मरीज के लिए सही दवा और सही मात्रा तय करना।
नई दवाओं का लैब में ही परीक्षण।
ट्रायल-एंड-एरर इलाज में कमी।

क्या मिनी-ब्रेन असली दिमाग जैसे हैं?
नहीं। वैज्ञानिकों का कहना है कि मिनी-ब्रेन असली दिमाग से काफी कम जटिल होते हैं। अभी और रिसर्च की जरूरत है, ताकि इन संकेतों को सीधे इंसानी दिमाग से जोड़ा जा सके। मिनी-ब्रेन तकनीक मानसिक स्वास्थ्य की दुनिया में एक नई उम्मीद बनकर उभरी है। हालांकि इलाज में अभी समय लगेगा, लेकिन यह खोज सिज़ोफ्रेनिया और बाइपोलर डिसऑर्डर को बेहतर तरीके से समझने और इलाज की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।

