राखी सिर्फ धागा नहीं... है सदियों पुराना इतिहास, जानें सबसे पहले किसने बांधी थी ये डोर!
punjabkesari.in Sunday, Aug 09, 2026 - 03:38 PM (IST)
नारी डेस्क : रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते, प्रेम और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उसकी लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना करती है। वहीं भाई अपनी बहन की रक्षा करने का वचन देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर राखी बांधने की परंपरा की शुरुआत कैसे हुई? इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इन्हीं में से एक कथा माता लक्ष्मी और राजा बलि से जुड़ी है।
माता लक्ष्मी ने राजा बलि को बांधी थी राखी
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी, तो वामन अवतार में भगवान विष्णु ने अपने दो कदमों में धरती और आकाश को नाप लिया। तीसरे कदम के लिए राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया। राजा बलि की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान मांगने के लिए कहा। राजा बलि ने भगवान से अपने साथ रहने का वरदान मांग लिया। कहा जाता है कि भगवान विष्णु राजा बलि के साथ पाताल लोक में रहने लगे। इधर माता लक्ष्मी भगवान विष्णु के वापस न लौटने से चिंतित हो गईं। नारद जी से उन्हें पता चला कि भगवान विष्णु पाताल लोक में राजा बलि के यहां द्वारपाल के रूप में रह रहे हैं। माता लक्ष्मी पाताल लोक पहुंचीं और राजा बलि को अपना भाई बनाया। उन्होंने राजा बलि की कलाई पर राखी बांधी। जब राजा बलि ने उनसे उपहार मांगने को कहा, तो माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को अपने साथ वापस ले जाने की इच्छा जताई। राजा बलि ने माता लक्ष्मी की बात स्वीकार कर भगवान विष्णु को उनके साथ जाने की अनुमति दे दी। इसी कथा को रक्षाबंधन से जुड़ी प्रमुख पौराणिक मान्यताओं में गिना जाता है।

द्रौपदी और श्रीकृष्ण की कथा भी है प्रसिद्ध
रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य लोकप्रिय कथा महाभारत काल की है। मान्यता है कि एक बार श्रीकृष्ण की उंगली में चोट लगने पर द्रौपदी ने अपनी साड़ी का कपड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया था। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को उनकी रक्षा का वचन दिया था। आगे चलकर जब कौरव सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया गया, तब श्रीकृष्ण ने उनकी लाज बचाई। इसी वजह से द्रौपदी और श्रीकृष्ण का यह प्रसंग भी भाई-बहन के प्रेम और रक्षा के भाव से जोड़कर देखा जाता है।
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इंद्राणी ने भी इंद्र को बांधी थी राखी
रक्षाबंधन से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा इंद्र और इंद्राणी की है। मान्यता के अनुसार, जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध चल रहा था और इंद्र संकट में थे, तब इंद्राणी ने उनकी कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था। इस रक्षा सूत्र को सुरक्षा और विजय का प्रतीक माना गया। इसके बाद से भी रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा से रक्षाबंधन को जोड़कर देखा जाता है।

राखी बांधते समय इन बातों का रखें ध्यान
रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने को लेकर भी कई पारंपरिक मान्यताएं हैं। वास्तु एवं ज्योतिषाचार्य पंडित बद्रीलाल दाधीच के अनुसार, राखी बांधते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। मान्यता के अनुसार, राखी बांधते समय भाई का मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना शुभ माना जाता है। दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके राखी बांधने से बचने की सलाह दी जाती है।
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तिलक और आरती करें
बहन को पहले भाई के माथे पर तिलक लगाना चाहिए। इसके बाद आरती करके उसकी कलाई पर राखी बांधने की परंपरा है। राखी बांधने के बाद भाई को मिठाई खिलाई जाती है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, भाई को राखी बांधने के बाद श्रीफल यानी नारियल भेंट करना शुभ माना जाता है। इसे सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

राखी का असली मतलब है रक्षा का वचन
रक्षाबंधन की अलग-अलग पौराणिक कथाएं भले ही अलग हों, लेकिन इन सभी में एक बात समान है—रक्षा, विश्वास और प्रेम का भाव। आज के समय में राखी केवल भाई की कलाई पर बांधा जाने वाला धागा नहीं है, बल्कि यह भाई-बहन के बीच मजबूत रिश्ते, एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहने और सुरक्षा का प्रतीक बन चुकी है।

