भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा सबसे पहले सालबेग की मजार पर क्यों रुकती है?

punjabkesari.in Monday, Jul 13, 2026 - 06:07 PM (IST)

नारी डेस्क : पुरी की विश्व प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा केवल आस्था का महापर्व नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और सामाजिक समरसता का भी अद्भुत संदेश देती है। इस यात्रा की सबसे खास परंपराओं में से एक है कि भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के रथ हर वर्ष मुस्लिम भक्त सालबेग की मजार के सामने कुछ समय के लिए रुकते हैं। यह परंपरा सदियों से निभाई जा रही है और सच्ची भक्ति की मिसाल मानी जाती है।

कौन थे सालबेग?

लोक मान्यताओं के अनुसार, सालबेग एक मुगल सूबेदार के पुत्र थे। उनकी मां हिंदू थीं और बचपन से ही उनका झुकाव भगवान जगन्नाथ की भक्ति की ओर था। जब वे पुरी पहुंचे, तो भगवान जगन्नाथ के प्रति उनकी श्रद्धा और गहरी हो गई। हालांकि, उस समय गैर-हिंदुओं को जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। मंदिर में प्रवेश न मिल पाने के बावजूद सालबेग की आस्था कभी कम नहीं हुई। उन्होंने भगवान जगन्नाथ की महिमा में कई भजन और स्तुतियां लिखीं, जो आज भी ओडिशा में श्रद्धा के साथ गाई जाती हैं।

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जब भगवान ने किया अपने भक्त का इंतजार

मान्यता है कि एक बार सालबेग गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। उन्होंने भगवान जगन्नाथ से प्रार्थना की कि वे जल्द स्वस्थ हो जाएं ताकि रथ यात्रा के दौरान प्रभु के दर्शन कर सकें। इसी दौरान रथ यात्रा शुरू हुई, लेकिन सालबेग समय पर नहीं पहुंच पाए। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ का रथ उनकी कुटिया के सामने आकर अपने आप रुक गया। लाख कोशिशों के बावजूद रथ आगे नहीं बढ़ा।

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सपने में मिला भगवान का संदेश

सात दिनों तक रथ वहीं रुका रहा, और मंदिर के सभी अनुष्ठान रथ पर ही किए गए। कथा के अनुसार, उस समय पुरी के राजा और मंदिर के सेवक काफी चिंतित हो गए। तभी मंदिर के मुख्य पुजारी को सपने में भगवान जगन्नाथ ने दर्शन देकर कहा कि वे अपने प्रिय भक्त सालबेग का इंतजार कर रहे हैं। जब सालबेग वहां पहुंचे और उन्होंने प्रभु के दर्शन किए, तभी रथ दोबारा आगे बढ़ा। इस घटना को सच्ची भक्ति की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

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आज भी निभाई जाती है यह परंपरा

इसी घटना की स्मृति में आज भी हर वर्ष जगन्नाथ रथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के रथ पुरी में स्थित सालबेग की मजार के सामने कुछ समय के लिए रुकते हैं। यह परंपरा धर्म, जाति और समुदाय से ऊपर उठकर भक्ति, समानता और प्रेम का संदेश देती है।

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क्या कहती है यह परंपरा?

जगन्नाथ संस्कृति का मूल संदेश है कि भगवान के लिए किसी व्यक्ति की जाति, धर्म या पहचान नहीं, बल्कि उसकी सच्ची श्रद्धा और भक्ति सबसे महत्वपूर्ण होती है। सालबेग की मजार पर रथ का रुकना इसी भावना का जीवंत उदाहरण माना जाता है।


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Content Editor

Monika

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