गेमिंग के दौरान दिमाग में कौन-सा हार्मोन होता है एक्टिव? बॉडी पर क्या असर पड़ता है?

punjabkesari.in Saturday, Feb 07, 2026 - 01:02 PM (IST)

नारी डेस्क:  आज के डिजिटल दौर में वीडियो गेम बच्चों से लेकर बड़ों तक की रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। मोबाइल, लैपटॉप या गेम कंसोल पर घंटों गेम खेलना आम बात हो गई है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ज्यादा गेमिंग दिमाग और शरीर के लिए हानिकारक है, या इसके कुछ फायदे भी हैं? वैज्ञानिकों के अनुसार गेमिंग का असर सीधे हमारे दिमाग और हार्मोन सिस्टम पर पड़ता है।

गेमिंग और दिमाग का कनेक्शन

आजकल वीडियो गेम इस तरह बनाए जाते हैं कि खिलाड़ी लंबे समय तक उनसे जुड़े रहें। इसके लिए गेम में रंग, आवाज़, टास्क, रिवॉर्ड सिस्टम और लेवल को बहुत सोच-समझकर डिजाइन किया जाता है। गेम खेलते समय दिमाग के कई हिस्से एक साथ सक्रिय होते हैं, खासतौर पर वे हिस्से जो रिवॉर्ड, इमोशन और डिसीजन लेने से जुड़े होते हैं। यही वजह है कि गेमिंग खिलाड़ियों को लंबे समय तक जोड़े रखती है।

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डोपामिन: गेमिंग का सबसे बड़ा हार्मोन

गेम खेलते समय सबसे पहले जो हार्मोन एक्टिव होता है, वह है डोपामिन। इसे फील गुड हार्मोन कहा जाता है। जब खिलाड़ी गेम में कोई लेवल पूरा करता है, जीत हासिल करता है या कोई रिवॉर्ड पाता है, तो दिमाग डोपामिन रिलीज करता है। डोपामिन की वजह से खिलाड़ी खुशी और उत्साह महसूस करता है और गेम खेलते रहने के लिए प्रेरित होता है।

लेकिन अगर गेमिंग लगातार लंबे समय तक होती रहे, तो दिमाग ज्यादा डोपामिन रिलीज करने लगता है। धीरे-धीरे दिमाग डोपामिन के प्रति कम संवेदनशील हो जाता है। इसका मतलब यह है कि खुशी पाने के लिए खिलाड़ी को पहले से और ज्यादा गेम खेलना पड़ता है। लंबे समय तक ज्यादा गेमिंग करने वालों में थकान, चिड़चिड़ापन, फोकस की कमी और ब्रेन फॉग जैसे लक्षण देखने को मिल सकते हैं।

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फाइट या फ्लाइट मोड हो जाता है एक्टिव

एक्शन या लड़ाई वाले वीडियो गेम खेलने पर शरीर का फाइट या फ्लाइट रिस्पॉन्स भी एक्टिव हो जाता है। यह वही सिस्टम है जो खतरे के समय हमें सतर्क करता है। ऐसे गेम्स के दौरान दिमाग कई बार खतरे को असली मान लेता है, जिससे गुस्सा, बेचैनी और आक्रामक व्यवहार बढ़ सकता है। इस स्थिति में दिमाग का भावनात्मक हिस्सा ज्यादा सक्रिय हो जाता है, जबकि तार्किक सोच थोड़ी कमजोर पड़ सकती है।

एड्रेनालिन और कोर्टिसोल का असर

तेज रफ्तार और रोमांचक गेम खेलने पर एड्रेनालिन हार्मोन रिलीज होता है। इससे हार्ट रेट और ब्लड प्रेशर बढ़ सकते हैं। लगातार ऐसा होने पर शरीर पर दबाव पड़ता है और खिलाड़ी को बेचैनी या थकान महसूस हो सकती है। साथ ही कोर्टिसोल, जिसे स्ट्रेस हार्मोन कहा जाता है, गेमिंग के दौरान बढ़ सकता है। अगर कोर्टिसोल लंबे समय तक सक्रिय रहे, तो नींद में परेशानी, मूड खराब होना, डिप्रेशन और जंक फूड की क्रेविंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

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गेमिंग पूरी तरह खतरनाक नहीं

वैज्ञानिकों का मानना है कि गेमिंग अपने आप में खतरनाक नहीं है। अगर इसे सीमित समय में और संतुलित तरीके से खेला जाए, तो इसके फायदे भी हैं। सही मात्रा में गेमिंग से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, याददाश्त, सीखने की गति और समस्या सुलझाने की स्किल बढ़ती है।कुछ गेम्स क्रिएटिविटी और स्ट्रैटेजिक थिंकिंग को भी बढ़ावा देते हैं।

गेमिंग का असर सीधे दिमाग और हार्मोन सिस्टम पर पड़ता है। छोटे-छोटे गेमिंग से खुशी और उत्साह मिलता है। लंबे समय तक अत्यधिक गेमिंग से डोपामिन, एड्रेनालिन और कोर्टिसोल हार्मोन असंतुलित हो सकते हैं। सही संतुलन और समय पर गेमिंग से दिमाग और शरीर दोनों को फायदा पहुंच सकता है।

इसलिए समय का ध्यान रखते हुए गेमिंग करना और ब्रेक लेना जरूरी है, ताकि हार्मोन सिस्टम स्वस्थ रहे और गेमिंग के फायदे मिलते रहें।
 


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Content Editor

Priya Yadav

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