इच्छामृत्यु की प्रक्रिया शूरू, हरीश राणा को दी जा रहीं दिमाग को सुकून देने वाली दवाएं

punjabkesari.in Saturday, Mar 21, 2026 - 01:31 PM (IST)

नारी डेस्क : जिंदगी और मौत का फैसला आमतौर पर इंसान के हाथ में नहीं होता। हर व्यक्ति को उतनी ही जिंदगी जीनी पड़ती है जितनी उसकी किस्मत में लिखी होती है। हालांकि, कभी-कभी लोग निराशा में आकर अपनी जिंदगी खुद खत्म कर लेते हैं, लेकिन इच्छामृत्यु जैसे मामलों में कानून और अदालत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। भारत में पहली बार पैसिव इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की प्रक्रिया लागू की जा रही है। 13 साल से कोमा जैसी स्थिति में रहने वाले हरीश राणा को दिल्ली के एम्स में रखा गया है। वेंटिलेटर और फीडिंग ट्यूब हटाने के बाद डॉक्टर इस बात का खास ख्याल रख रहे हैं कि इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें न्यूनतम दर्द महसूस हो।

हरीश राणा की पैसिव इच्छामृत्यु प्रक्रिया

हरीश राणा की लाइफ सपोर्ट सिस्टम धीरे-धीरे हटाई जा रही है। अस्पताल सूत्रों के अनुसार, 2013 में हुए हादसे के बाद 13 साल से कोमा में रहने वाले हरीश को अब सामान्य बेड पर रखा गया है। सुप्रीम कोर्ट से अनुमति मिलने के बाद एम्स का मेडिकल बोर्ड उनकी हर स्थिति पर नजर रख रहा है। डॉक्टर अभी भी उन्हें ब्रेन सुकून देने वाली दवाएं दे रहे हैं ताकि दर्द और बेचैनी न हो।

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माता-पिता और परिवार को दी जा रही काउंसलिंग

गाजियाबाद के हरीश राणा के माता-पिता और भाई एम्स में ही हैं और उनकी रोजाना काउंसलिंग की जा रही है। पैलिएटिव मेडिसिन और एनेस्थीसिया विभाग की हेड डॉ. सीमा मिश्रा की टीम इस प्रक्रिया को अंजाम दे रही है। डॉक्टर के अनुसार, इस प्रक्रिया में न्यूट्रिशनल सपोर्ट और जीवनरक्षक दवाओं को धीरे-धीरे हटाया जाता है। मरीज को पैलिएटिव सीडेशन दिया जाता है ताकि वह आरामदायक रहे। इसका उद्देश्य यह है कि मृत्यु न लंबी खिंचे और न ही जल्दी आए।

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बेस्ट इंटरेस्ट प्रिंसिपल (Best Interest Principle)

यूथनेशिया मामलों में “बेस्ट इंटरेस्ट प्रिंसिपल” अपनाया जाता है। जब मरीज स्वयं निर्णय नहीं ले सकता, तो मेडिकल बोर्ड और परिवार के सदस्य यह तय करते हैं कि मरीज की भलाई में क्या निर्णय सबसे सही होगा। हरीश राणा केस में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट के जजों ने भी इसी सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए मंजूरी दी।

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कोर्ट ने दी 30 दिन की विचार अवधि से छूट

सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड और परिवार के अनुरोध पर 30 दिन की विचार अवधि में छूट दी। क्योंकि इस अवधि के बाद यह स्पष्ट हो गया था कि हरीश राणा की रिकवरी लगभग असंभव है। 2013 में हरीश राणा को पीजी हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद गंभीर सिर की चोट लगी थी। वह उस समय पंजाब यूनिवर्सिटी में बी-टेक कर रहे थे। हादसे के बाद से उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और वह बिस्तर पर स्थिर अवस्था में हैं।


 


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Monika

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