गर्भ में पल रहे  22 हफ्ते के बच्चे को थी गंभीर दिल की बीमारी, डॉक्टरों ने पेट में ही कर दिया बच्चे का इलाज

punjabkesari.in Tuesday, Feb 10, 2026 - 11:42 AM (IST)

नारी डेस्क:  मेडिकल विज्ञान ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। अब गर्भ में पल रहे बच्चे का इलाज केवल मां के जरिए ही नहीं, बल्कि सीधे भ्रूण तक दवा पहुंचाकर भी किया जा सकता है। हैदराबाद स्थित रेनबो चिल्ड्रन्स हार्ट इंस्टीट्यूट के डॉक्टरों ने इसी उन्नत तकनीक की मदद से 21 से 27 हफ्ते की गर्भावस्था के दौरान 5 गंभीर रूप से बीमार बच्चों की जान बचाई है।

पहले कैसे होता था गर्भ में बच्चे का इलाज

कुछ समय पहले तक अगर गर्भ में पल रहे बच्चे को कोई बीमारी होती थी, तो डॉक्टर गर्भवती महिला को दवाएं देते थे। ये दवाएं प्लेसेंटा के माध्यम से बच्चे तक पहुंचती थीं। हालांकि कई मामलों में दवा सही मात्रा और सही समय पर बच्चे तक नहीं पहुंच पाती थी, जिससे इलाज प्रभावी नहीं हो पाता था। अब मेडिकल टेक्नोलॉजी इतनी उन्नत हो गई है कि गर्भ के अंदर ही बच्चे को सीधे इलाज देना संभव हो गया है।

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शोग्रेन सिंड्रोम से पीड़ित थी गर्भवती महिला

रेनबो चिल्ड्रन्स हार्ट इंस्टीट्यूट में सामने आया यह मामला 29 वर्षीय गर्भवती महिला का है, जो शोग्रेन सिंड्रोम नाम की एक ऑटोइम्यून बीमारी से पीड़ित थी। यह बीमारी शरीर की नमी उत्पन्न करने वाली ग्रंथियों को नुकसान पहुंचाती है। इसी बीमारी के कारण महिला का पहला गर्भ पहले ही नष्ट हो चुका था, जिससे इस बार जोखिम और भी अधिक था।

जांच में सामने आई भ्रूण की गंभीर दिल की बीमारी

गर्भावस्था के 22वें सप्ताह में की गई भ्रूण इकोकार्डियोग्राफी जांच में पता चला कि गर्भ में पल रहे बच्चे को गंभीर दिल की समस्या है। बच्चे में इम्यून-मीडिएटेड कार्डियोमायोपैथी और सेकंड-डिग्री हार्ट ब्लॉक पाया गया। यह दोनों स्थितियां बच्चे के लिए बेहद खतरनाक मानी जाती हैं और समय पर इलाज न होने पर जान भी जा सकती है।

मां की एंटीबॉडीज़ कैसे पहुंचाती हैं बच्चे को नुकसान

डॉक्टरों के अनुसार, यह स्थिति तब पैदा होती है जब मां की एंटीबॉडीज़ प्लेसेंटा के ज़रिए भ्रूण के दिल तक पहुंच जाती हैं। ये एंटीबॉडीज़ बच्चे के विकसित हो रहे दिल को नुकसान पहुंचाने लगती हैं। इसके कारण बच्चे की दिल की धड़कन धीमी हो जाती है और दिल की पंपिंग क्षमता कमजोर पड़ जाती है। कई बार मां को खुद कोई लक्षण नहीं होते, लेकिन बच्चे की हालत तेजी से बिगड़ने लगती है।

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क्यों जरूरी था सीधे भ्रूण का इलाज

डॉक्टरों ने मां की स्थिति और बच्चे की हालत को देखते हुए यह फैसला किया कि केवल महिला को दवा देना पर्याप्त नहीं होगा। दवाएं समय पर और सही मात्रा में बच्चे तक नहीं पहुंच पा रही थीं। ऐसे में डॉक्टरों ने एक विशेष तकनीक अपनाई, जिसे प्रत्यक्ष भ्रूण इम्यूनोथेरेपी (Direct Fetal Immunotherapy) कहा जाता है।

क्या है प्रत्यक्ष भ्रूण इम्यूनोथेरेपी

प्रत्यक्ष भ्रूण इम्यूनोथेरेपी एक अत्याधुनिक और विशेष इलाज पद्धति है। इसमें उन्नत इमेजिंग और आधुनिक मशीनों की मदद से दवा को सीधे गर्भ में मौजूद बच्चे तक पहुंचाया जाता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम द्वारा कड़ी निगरानी में की जाती है। यह कोई सामान्य इलाज नहीं है, बल्कि केवल बहुत गंभीर और चुनिंदा मामलों में ही इसका उपयोग किया जाता है।

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इलाज के बाद बच्चे की हालत में बड़ा सुधार

इस विशेष इलाज के बाद बच्चे की हालत में साफ सुधार देखा गया। बच्चे की दिल की धड़कन सामान्य हो गई और दिल की पंपिंग क्षमता भी बेहतर हो गई। इलाज के बाद बच्चे की हृदय गति 150 बीट प्रति मिनट तक पहुंच गई, जो पूरी तरह सामान्य मानी जाती है। इसके बाद बच्चे का जन्म सुरक्षित तरीके से हुआ और जन्म के बाद भी उसका दिल ठीक से काम करता रहा।

डॉक्टरों की राय: समय पर इलाज है जीवन रक्षक

रेनबो चिल्ड्रन्स हार्ट इंस्टीट्यूट की पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. श्वेता बखरू ने बताया कि इम्यून से जुड़ी भ्रूणीय दिल की बीमारियां बहुत तेजी से गंभीर हो सकती हैं और अक्सर देर से पकड़ में आती हैं। ऐसे मामलों में सीधे भ्रूण को दिया गया इलाज ही बच्चे की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभाता है।

हर मामले में नहीं किया जाता यह इलाज

डॉ.  ने स्पष्ट किया कि यह इलाज हर गर्भावस्था में नहीं किया जाता। यह एक अत्यधिक विशेष प्रक्रिया है, जिसे तभी अपनाया जाता है जब सामान्य इलाज के बावजूद बच्चे की हालत लगातार बिगड़ रही हो। इसके लिए उन्नत तकनीक और अनुभवी डॉक्टरों की टीम की जरूरत होती है।

दुनिया के चुनिंदा संस्थानों में शामिल हुआ यह केंद्र

सीनियर पीडियाट्रिक कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. ने कहा कि इस तकनीक की सफलता ने रेनबो चिल्ड्रन्स हार्ट इंस्टीट्यूट को दुनिया के उन गिने-चुने मेडिकल सेंटर्स में शामिल कर दिया है, जहां इस तरह की जटिल और दुर्लभ भ्रूणीय दिल की बीमारियों का सफल इलाज किया जा रहा है।

अब तक 5 बच्चों की बचाई गई जान

रेनबो चिल्ड्रन्स हार्ट इंस्टीट्यूट में अब तक 21 से 27 हफ्ते की गर्भावस्था वाले 5 बच्चों का इस तकनीक से सफल इलाज किया जा चुका है। सभी मामलों में बच्चों के दिल की कार्यक्षमता में सुधार हुआ, शरीर में जमा अतिरिक्त पानी कम हुआ और दिल की खतरनाक धड़कन की समस्याएं भी नियंत्रित हुईं। सभी बच्चों का जन्म सुरक्षित हुआ और फॉलो-अप जांच में उनकी स्थिति संतोषजनक पाई गई।

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भविष्य के लिए नई उम्मीद

डॉक्टरों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में गर्भ में होने वाली गंभीर और दुर्लभ दिल की बीमारियों के इलाज की दिशा बदल सकती है। यह उन परिवारों के लिए नई उम्मीद लेकर आई है, जिनके लिए पहले इलाज के विकल्प बहुत सीमित थे। यह सफलता मेडिकल साइंस में एक बड़ा कदम मानी जा रही है।  


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Content Editor

Priya Yadav

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