2600 साल पुरानी मेडिकल विरासत को मिला सम्मान, Scotland में लगी Maharsi Sushruta की प्रतिमा

punjabkesari.in Tuesday, Jun 23, 2026 - 01:06 PM (IST)

नारी डेस्क: भारत के लिए यह गर्व का पल है। स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में स्थित रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स में महर्षि सुश्रुत की प्रतिमा लगाई गई है। महर्षि सुश्रुत को दुनिया में सर्जरी का जनक माना जाता है। हजारों साल पहले उन्होंने चिकित्सा और शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसा काम किया, जिसकी चर्चा आज भी होती है। उनकी प्रतिमा का स्थापित होना भारतीय ज्ञान और चिकित्सा परंपरा को मिला एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान माना जा रहा है।

काशी से जुड़ा वह इतिहास, जहां जन्मी सर्जरी की नींव

ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि सुश्रुत का संबंध काशी से बताया जाता है। लगभग ढाई हजार साल पहले की एक कथा प्रचलित है, जिसमें एक व्यक्ति की नाक कट जाने पर वह सहायता के लिए सुश्रुत के पास पहुंचा था। कहा जाता है कि उन्होंने उस समय उपलब्ध चिकित्सा ज्ञान और तकनीक के आधार पर उसकी नाक का पुनर्निर्माण किया। इसी घटना को आज की भाषा में प्लास्टिक सर्जरी के शुरुआती उदाहरणों में से एक माना जाता है, जिसके कारण सुश्रुत को “आधुनिक सर्जरी का जनक” भी कहा जाता है।

 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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दुनिया का पहला सर्जन माना जाता है सुश्रुत

महर्षि सुश्रुत को चिकित्सा इतिहास में दुनिया के शुरुआती सर्जनों में गिना जाता है। बताया जाता है कि उन्होंने 300 से अधिक प्रकार की सर्जिकल प्रक्रियाओं का उल्लेख और अभ्यास किया था। उनके पास 120 से अधिक सर्जिकल उपकरणों का ज्ञान और उपयोग था, जो उस समय की चिकित्सा समझ से कहीं आगे की बात थी। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह मानी जाती है कि उन्होंने उपचार को केवल अनुभव पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अवलोकन और संरचना पर आधारित किया।

1120 बीमारियों और विस्तृत चिकित्सा ज्ञान का दस्तावेज

सुश्रुत की सबसे महत्वपूर्ण रचना “सुश्रुत संहिता” मानी जाती है, जिसे सर्जरी पर दुनिया का पहला विस्तृत ग्रंथ कहा जाता है। इस ग्रंथ में 184 अध्यायों के माध्यम से 1120 से अधिक रोगों का वर्णन किया गया है। इसके अलावा इसमें लगभग 700 औषधीय पौधों, 64 खनिजों और 57 पशु-उत्पादों का उल्लेख भी मिलता है। यह ग्रंथ सिर्फ सर्जरी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें शरीर रचना, बाल रोग, स्त्री रोग, विष विज्ञान और मानसिक रोगों का भी विस्तृत विवरण मिलता है।

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शिक्षा और प्रयोग पर आधारित चिकित्सा पद्धति

महर्षि सुश्रुत का मानना था कि किसी भी सर्जन के लिए शरीर की संरचना को समझना सबसे जरूरी है। इसी उद्देश्य से वे मानव शरीर की गहन अध्ययन पद्धति अपनाते थे, जिसमें मृत शरीर के माध्यम से संरचना को समझने की प्रक्रिया शामिल थी। छात्रों को प्रशिक्षण देने के लिए वे कद्दू, खरबूजे, पशुओं की त्वचा और अन्य प्राकृतिक वस्तुओं पर अभ्यास करवाते थे, ताकि वे वास्तविक सर्जरी के लिए तैयार हो सकें।

गुरु धन्वंतरि से शिक्षा और मानव सेवा का संकल्प

कहा जाता है कि महर्षि सुश्रुत ने आयुर्वेद की शिक्षा गुरु दिवोदास धन्वंतरि से प्राप्त की थी। शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने जीवन को मानव सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनकी एक प्रसिद्ध सीख आज भी उद्धृत की जाती है  “जो रोगी के दुख को अपना दुख समझे, वही सच्चा वैद्य है।” आज की आधुनिक शल्य चिकित्सा को जहां लगभग 400 साल पुराना माना जाता है, वहीं सुश्रुत के कार्य उससे हजारों वर्ष पहले के बताए जाते हैं। यूरोप में आधुनिक सर्जरी के विकास से पहले ही भारत में सर्जरी की विस्तृत अवधारणा मौजूद थी। इसी कारण आज भी चिकित्सा विशेषज्ञ सुश्रुत के योगदान को चिकित्सा विज्ञान की आधारशिला मानते हैं।

एडिनबर्ग में प्रतिमा स्थापना के पीछे खास पहल

इस प्रतिमा की स्थापना यूके में रहने वाले भारतीय मूल के सर्जन प्रोफेसर चंद्रा चेरुवू के नेतृत्व में की गई। यह प्रतिमा “चेरुवू फैमिली फाउंडेशन” द्वारा दान की गई है। प्रतिमा को तमिलनाडु के तिरुवन्नामलाई के एक मूर्तिकार ने तैयार किया है। प्रोफेसर चेरुवू ने सुश्रुत पर एक पुस्तक भी लिखी है, जिसमें ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर सर्जरी के शुरुआती विकास को विस्तार से समझाया गया है।

भारत की प्राचीन चिकित्सा परंपरा को वैश्विक पहचान

रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग द्वारा सुश्रुत की प्रतिमा को स्वीकार किया जाना केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि वैश्विक चिकित्सा इतिहास में भारतीय योगदान की स्वीकृति के रूप में देखा जा रहा है। इस कदम ने एक बार फिर यह चर्चा तेज कर दी है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की कई नींवें भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में पहले ही रखी जा चुकी थीं। 

 
 


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Content Editor

Priya Yadav

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