इस साल अद्भुत संयोग के साथ शुरू होगा पितृपक्ष, 60 साल पहले हुआ था ऐसा
punjabkesari.in Wednesday, Sep 23, 2026 - 10:31 AM (IST)
नारी डेस्क: हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। पितृपक्ष पितरों की आत्मा की मुक्ति और शांति के लिए भाद्र मास में शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से आरम्भ होकर आश्विन मास में कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक चलता है। इस साल श्राद्ध पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर (शनिवार) को पूर्णिमा श्राद्ध से हो रही है और इसका समापन 10 अक्टूबर (शनिवार) को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा। इस बार पितृपक्ष का समय बहुत ही खास माना जा रहा है क्योंकि इस दौरान बहुत ही दुर्लभ संयोग का निर्माण होने जा रहा है।

16 दिन का रहेगा श्राद्ध पक्ष
इस बार श्राद्ध पक्ष 16 दिन का रहेगा, हालांकि एक दिन दो तिथियां के कारण श्राद्ध निर्धारित कालखंड में किए जाएंगे। ज्योतिष के जानकारों का मानना है कि ग्रह गोचर और परिभ्रमण की स्थिति के आधार पर इस बार श्राद्ध पक्ष विशेष ग्रहयोग में आ रहा है। 1966 के बाद 2026 में ग्रहयोग की पुनरावृत्ति हो रही है। शनि ग्रह को ज्योतिषीय मान्यता में पितरों का समकारक माना है। इस बार पितृपक्ष की शुरुआत पूर्णिमा तिथि पर शनिवार से और समापन सर्वपितृ अमावस्या तिथि पर भी शनिवार को हो रहा है। इसके साथ बुधादित्य योग और त्रिएकादश के योग बनने की स्थिति बताई गई है।
धरती लोक पर आते हैं पूर्वज
मान्यता है कि श्राद्ध कर्म करने से जीवन में सुख-समृद्धि, शांति और वंश वृद्धि का आशीष प्राप्त होता है। हर साल पितृपक्ष में पूर्वज पितृलोक से धरती लोक पर आते हैं और श्राद्ध मिलने पर प्रसन्न होकर स्वस्थ, चिरंजीवी, धनधान्यपूर्ण और परिवार के मंगल का आशीर्वाद देकर पितृ लोक को वापस जाते हैं। पिंडदान की परंपरा केवल प्रयाग, काशी और गया में है, लेकिन पितरों के पिंडदान और श्राद्ध कर्म की शुरुआत प्रयाग में क्षौर कर्म से होती है।

मुंडन संस्कार से होता हैश्राद्ध कर्म
पितृपक्ष में हर साल बड़ी संख्या में लोग देश के कोने कोने से पिंण्ड दान के लिए संगम आते हैं। पितृ मुक्ति का प्रथम एवं मुख्य द्वार कहे जाने के कारण संगमनगरी में पिंडदान और श्राद्ध कर्म का विशेष महत्व है। धर्म शास्त्रों में भगवान विष्णु को मोक्ष के देवता माना जाता है। प्रयाग में भगवान विष्णु बारह भिन्न रूपों में विराजमान हैं। मान्यता है कि त्रिवेणी में भगवान विष्णु बाल मुकुंद स्वरूप में वास करते हैं। प्रयाग को पितृ मुक्ति का पहला और मुख्य द्वार माना जाता है। काशी को मध्य और गया को अंतिम द्वार कहा जाता है। प्रयाग में श्राद्ध कर्म का आरंभ मुंडन संस्कार से होता है।

