World Kidney Day: मृत डोनर की दोनों किडनी भी दे सकती हैं मरीज को नई जिंदगी

punjabkesari.in Thursday, Mar 12, 2026 - 12:28 PM (IST)

नारी डेस्क:  हर साल विश्व किडनी डे पर यह याद दिलाया जाता है कि हमारी किडनी कितनी अहम होती है और जीवनदान देने का अवसर भी कितना कीमती है। देश में किडनी फेलियर से जूझ रहे हजारों मरीजों के लिए डोनर की कमी सबसे बड़ी चुनौती है। ऐसे में मृत डोनर से अंगदान करना मरीजों की नई जिंदगी की उम्मीद बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर मृत डोनर की दोनों किडनी एक साथ ट्रांसप्लांट की जाए, तो यह तकनीक मरीजों के लिए दोगुनी राहत और बेहतर स्वास्थ्य का रास्ता खोल सकती है। यह केवल एक ऑपरेशन नहीं, बल्कि लाखों परिवारों के लिए नई आशा और जीवन का तोहफ़ा बन सकता है।

जीवित डोनर और मृत डोनर में अंतर

किडनी ट्रांसप्लांट में दो तरह के डोनर होते हैं – लिविंग डोनर और मृत डोनर। लिविंग डोनर यानी कोई जीवित व्यक्ति अपनी किडनी दान करता है। इसके लिए कई कानूनी शर्तें, नियम और सामाजिक-आर्थिक बाधाएं होती हैं। कई बार मरीज और परिवार आर्थिक या सामाजिक कारणों से किडनी ट्रांसप्लांट नहीं कर पाते। वहीं, मृत डोनर से अंगदान करने पर अधिक संख्या में मरीजों की जिंदगी बचाई जा सकती है। हालांकि, भारत में मृत डोनर से अंगदान के प्रति जागरुकता अभी भी कम है, इसलिए बहुत कम लोग मृत्यु के बाद अंगदान के लिए आगे आते हैं।

Kidney खराब होने की पहली निशानी, लापरवाही खतरे में डाल सकती जान

दिल्ली में स्थिति चुनौतीपूर्ण

वर्ल्ड किडनी डे के मौके पर सामने आए आंकड़े इस समस्या की गंभीरता को दिखाते हैं। देश में हर साल लगभग 1 लाख मरीजों को किडनी ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है। लेकिन इनमें से केवल 35 हजार मरीजों को ही किडनी मिल पाती है। दिल्ली में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। यहां 100 मरीजों में से केवल 2 को ही मृत डोनर की किडनी मिल पाती है। इस कमी के चलते कई मरीज लंबी प्रतीक्षा सूची में शामिल होते हैं और उनकी जिंदगी जोखिम में रहती है।

ये भी पढ़ें:  अगर रात में नहीं आती नींद तो सोने से पहले खा लें यह चीज, जल्दी आएगी गहरी नींद

क्या है एन-ब्लॉक ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट?

हाल ही में दिल्ली के इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बिलियरी साइंसेज (ILBS) में एक मरीज को नई जिंदगी मिली। वह पिछले पांच सालों से किडनी फेलियर से जूझ रहा था। उसे मृत डोनर की किडनी प्रत्यारोपित की गई। डॉक्टरों के अनुसार कई बार मृत डोनर उपलब्ध होने के बावजूद पूरी किडनी उपयोग के योग्य नहीं होती। उदाहरण के लिए अगर डोनर को डायबिटीज या अन्य बीमारी रही हो, तो उसकी किडनी पूरी तरह उपयोग योग्य नहीं मानी जाती। ऐसी स्थिति में दोनों किडनी को एक साथ प्रत्यारोपित करने की नई तकनीक अपनाई जाती है, जिसे 'एन-ब्लॉक ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट' कहा जाता है।

एन-ब्लॉक ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट के फायदे

यह भारत में वयस्क मरीज में पहला सफल ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट था। आमतौर पर यह तकनीक बच्चों में इस्तेमाल होती रही है, लेकिन अब इसे एडल्ट मरीज में भी सफलता पूर्वक लागू किया गया। अमेरिका में भी ऐसे मामलों की संख्या बहुत कम है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह तकनीक खास तौर पर तब उपयोगी होती है जब डोनर की किडनी आकार में छोटी हो, या एक किडनी पर्याप्त कार्यक्षमता नहीं दे पाती। इस तकनीक से मरीजों को बेहतर रीनल फंक्शन मिलता है और उनकी जिंदगी की उम्मीदें बढ़ जाती हैं।

PunjabKesari

किडनी डोनर की कमी के बावजूद नई तकनीकें जैसे एन-ब्लॉक ड्यूल किडनी ट्रांसप्लांट मरीजों के लिए नई आशा की किरण साबित हो रही हैं। डोनर और परिवारों में जागरूकता बढ़ाना, मृत डोनर अंगदान को बढ़ावा देना और आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल करना किडनी फेलियर से जूझ रहे हजारों मरीजों की जिंदगी बदल सकता है।
 


सबसे ज्यादा पढ़े गए

Content Editor

Priya Yadav

Related News

static