एकादशी पर चावल वर्जित, लेकिन जगन्नाथ पुरी में लगता है महाभोग ,जानिए ‘अनोखी कथा

punjabkesari.in Friday, Feb 13, 2026 - 09:31 AM (IST)

 नारी डेस्क:  हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। साल में आने वाली हर एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित होती है। इस दिन लोग व्रत रखते हैं, पूजा-पाठ करते हैं और सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। एकादशी से जुड़े कई नियम हैं, जिनमें सबसे प्रमुख नियम है  इस दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। मान्यता है कि एकादशी पर चावल खाना अशुभ माना जाता है। कुछ धार्मिक कथाओं में तो यह भी कहा गया है कि इस दिन चावल खाने से व्यक्ति को अगले जन्म में निम्न योनि में जन्म मिल सकता है। यही कारण है कि जो लोग व्रत नहीं भी रखते, वे भी इस दिन चावल खाने से बचते हैं। लेकिन इन सब नियमों के बीच एक ऐसा स्थान है जहां यह नियम उल्टा दिखाई देता है  और वह है ओडिशा का प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर।

क्यों खास है जगन्नाथ पुरी?

पुरी में विराजमान हैं भगवान जगन्नाथ (भगवान कृष्ण का रूप), उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा। यहां प्रतिदिन चार बार भगवान को भोग लगाया जाता है और बाद में वही महाप्रसाद भक्तों में वितरित किया जाता है। पूरे भारत में यह एकमात्र मंदिर है जहां एकादशी के दिन भी भगवान को चावल का महाभोग लगाया जाता है। यही कारण है कि यहां की एकादशी को “उल्टी एकादशी” कहा जाता है।

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क्या है ‘उल्टी एकादशी’ की कथा?

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी भगवान जगन्नाथ का प्रसाद ग्रहण करने पुरी आए। लेकिन जब तक वे पहुंचे, तब तक सारा प्रसाद भक्तों में बंट चुका था। केवल एक पत्तल में थोड़ा-सा प्रसाद बचा था, जिसे एक कुत्ता चाट रहा था। ब्रह्मा जी की भक्ति सच्ची और निर्मल थी। उन्होंने बिना किसी भेदभाव के उसी कुत्ते के साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करना शुरू कर दिया। उसी समय देवी एकादशी वहां प्रकट हुईं। उन्होंने आश्चर्य से पूछा  “आज एकादशी के दिन आप चावल का प्रसाद कैसे खा सकते हैं? यह तो नियम के विरुद्ध है।” तभी स्वयं भगवान जगन्नाथ प्रकट हुए। उन्होंने देवी एकादशी से कहा  “जहां सच्ची भक्ति होती है, वहां नियमों का बंधन नहीं होता। मेरे महाप्रसाद पर किसी व्रत का प्रतिबंध लागू नहीं होता।”

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भगवान ने यह भी कहा कि उनके महाप्रसाद को ग्रहण करना स्वयं में पवित्र है, चाहे वह किसी भी तिथि पर क्यों न हो। कथा के अनुसार, भगवान ने देवी एकादशी को दंड स्वरूप उल्टा लटका दिया, जिससे पुरी में एकादशी का नियम भी उल्टा हो गया। तभी से यहां एकादशी पर भी चावल का भोग लगाया जाता है।

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क्या है इस परंपरा का संदेश?

इस कथा का मुख्य संदेश यह है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति सबसे ऊपर होती है। नियमों का पालन जरूरी है, लेकिन जब बात भगवान के प्रसाद और निष्कपट भक्ति की हो, तो वहां कठोर नियमों की बाध्यता नहीं रहती। इसी वजह से आज भी पुरी के जगन्नाथ मंदिर में एकादशी के दिन चावल का महाप्रसाद बनता है और हजारों भक्त श्रद्धा से उसे ग्रहण करते हैं।

जहां पूरे देश में एकादशी पर चावल खाना वर्जित माना जाता है, वहीं जगन्नाथ पुरी में यह परंपरा इसके ठीक विपरीत है। “उल्टी एकादशी” की यह कथा हमें सिखाती है कि भगवान के लिए सबसे महत्वपूर्ण हमारी सच्ची भक्ति और भाव है, न कि केवल नियमों का पालन।  

 


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Content Editor

Priya Yadav

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