Bengali Brides के लिए शाखा-पोला है सुहागन होने की निशानी, इसके बिना शादी मानी जाती है अधूरी

punjabkesari.in Friday, Oct 16, 2026 - 02:43 PM (IST)

नारी डेस्क: बंगाली विवाहित महिलाओं द्वारा पहनी जाने वाली सफेद और लाल चूड़ियां केवल पारंपरिक आभूषण नहीं हैं। 'शाखा पोला' के नाम से जानी जाने वाली ये चूड़ियां बंगाली परिवारों में विवाह, सांस्कृतिक पहचान और पुरानी परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई हैं। हालांकि इन्हें अक्सर वैवाहिक जीवन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, लेकिन इनका महत्व इनके दिखावे से कहीं अधिक है। चलिए जानते हैं 'शाखा पोला' बंगाली संस्कृति का एक स्थायी हिस्सा कैसे बनी हुई हैं।


 विवाह का सांस्कृतिक प्रतीक है शाखा पोला

'शाखा पोला' पारंपरिक आभूषण के एक टुकड़े से कहीं बढ़कर है। बंगाली हिंदू समाज में यह विवाह का एक सांस्कृतिक प्रतीक है, जो वैवाहिक पहचान, शुभता, पारिवारिक परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही रीति-रिवाजों की निरंतरता से जुड़ा है। विवाहित महिलाओं द्वारा आमतौर पर एक साथ पहनी जाने वाली ये दो चूड़ियां, अपनी सामग्री और रंगों के आधार पर एक-दूसरे से अलग होती हैं।शाखा पारंपरिक रूप से शंख से बनाई जाती है, जबकि पोला लाल मूंगे से बनता है - या आजकल के समय में, अन्य लाल सामग्रियों से भी बनाया जाता है। इनका महत्व केवल इनके रूप-रंग से ही नहीं, बल्कि बंगाली समाज और धार्मिक परंपराओं में पीढ़ियों से चले आ रहे इनके सांस्कृतिक अर्थों से भी जुड़ा है।


सफेद और लाल चूड़ियों का अर्थ

शाखा का सफेद रंग आमतौर पर पवित्रता, शांति और शुभता से जुड़ा है, जबकि पोला का लाल रंग जीवन-शक्ति, समृद्धि, प्रजनन क्षमता और वैवाहिक जीवन की ऊर्जा का प्रतीक है।  ये अर्थ हिंदू परंपराओं में मौजूद व्यापक प्रतीकात्मक जुड़ाव को दर्शाते हैं, जहां सफेद और लाल रंगों का लंबे समय से धार्मिक और अनुष्ठानिक महत्व रहा है। खास तौर पर, भारत के कई समुदायों में शादी-ब्याह के समारोहों, सिंदूर लगाने की रस्म और दुल्हन के कपड़ों में लाल रंग की प्रमुख भूमिका होती है। बंगाल में, सफेद और लाल रंग का यह मेल विवाहित महिलाओं और पारंपरिक बंगाली संस्कृति से जुड़कर एक खास क्षेत्रीय पहचान बन गया है।
 


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Content Writer

vasudha

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