महिलाओं के लिए बिल्कुल सुरक्षित नहीं है देश के ये बड़े शहर, आ गई सेफ और अनसेफ शहरों की लिस्ट

punjabkesari.in Thursday, Aug 28, 2025 - 06:07 PM (IST)

नारी डेस्क: कोहिमा, विशाखापत्तनम, भुवनेश्वर, आइजोल, गंगटोक, ईटानगर और मुंबई भारत में महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित शहर बनकर उभरे हैं, जबकि पटना, जयपुर, फरीदाबाद, दिल्ली, कोलकाता, श्रीनगर और रांची इस मामले में सबसे निचले पायदान पर हैं। बृहस्पतिवार को जारी राष्ट्रीय वार्षिक महिला सुरक्षा रिपोर्ट एवं सूचकांक (एनएआरआई) 2025 तो कुछ यही बयां करता है। 


31 शहरों की लिस्ट जारी

यह राष्ट्रव्यापी सूचकांक 31 शहरों की 12,770 महिलाओं पर की गई रायशुमारी पर आधारित है। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा स्कोर 65 फीसदी रखा गया है और शहरों को उक्त मानक से ‘काफी ऊपर', ‘ऊपर', ‘समान', ‘नीचे' या ‘काफी नीचे' श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। सूचकांक में शीर्ष स्थान हासिल करने वाले कोहिमा और विशाखापत्तनम जैसे शहरों के अच्छे प्रदर्शन के पीछे मजबूत लैंगिक समानता, नागरिक भागीदारी, पुलिस व्यवस्था और महिला-अनुकूल बुनियादी ढांचे का हाथ बताया गया है। वहीं, इसमें सबसे निचले पायदान पर काबिज पटना और जयपुर जैसे शहरों के खराब प्रदर्शन के लिए कमजोर संस्थागत प्रतिक्रिया, पितृसत्तात्मक मानदंडों और शहरी बुनियादी ढांचे में कमी जैसे कारकों को जिम्मेदार ठहराया गया है। 


रात में सुरक्षित नहीं हैं महिलाएं

‘एनएआरआई-2025' में कहा गया है- “कोहिमा, विशाखापत्तनम, भुवनेश्वर, आइजोल, गंगटोक, ईटानगर और मुंबई राष्ट्रीय सुरक्षा रैंकिंग में सबसे आगे हैं, जिसके लिए मुख्यत: उच्च लैंगिक समानता, बेहतर बुनियादी ढांचा, पुलिस व्यवस्था और नागरिक भागीदारी जिम्मेदार है। वहीं, रांची, श्रीनगर, कोलकाता, दिल्ली, फरीदाबाद, पटना और जयपुर सबसे निचले स्थान पर हैं, जिसके पीछे खराब बुनियादी ढांचा, पितृसत्तात्मक मानदंड और कमजोर संस्थागत जवाबदेही जैसे कारकों का हाथ है।” रिपोर्ट में कहा गया है कि कुल मिलाकर सर्वेक्षण में शामिल दस में से छह महिलाओं ने अपने शहर में “सुरक्षित” महसूस करने की बात कही, लेकिन 40 प्रतिशत ने अभी भी खुद को “उतना सुरक्षित नहीं” या “असुरक्षित” माना। सर्वेक्षण से पता चला है कि रात में सुरक्षित महसूस करने की धारणा में भारी गिरावट आई है, खासकर सार्वजनिक परिवहन और मनोरंजन स्थलों में। इसमें पाया गया है कि शैक्षणिक संस्थानों में 86 फीसदी महिलाएं दिन में सुरक्षित महसूस करती हैं, लेकिन रात में या परिसर के बाहर वे अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता में घिरी रहती हैं। 


उत्पीड़न की शिकायत करने से बचती हैं महिलाएं

सर्वेक्षण के अनुसार, लगभग 91 फीसदी महिलाएं कार्यस्थल पर सुरक्षित महसूस करती हैं, लेकिन उनमें से लगभग आधी महिलाओं को यह स्पष्ट नहीं है कि उनके कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम (पीओएसएच) नीति लागू है या नहीं। इसमें कहा गया है कि जिन महिलाओं ने कार्यस्थल पर पीओएसएच नीति होने की बात कही, उनमें से अधिकतर ने इन्हें प्रभावी माना। सर्वेक्षण में शामिल केवल एक-चौथाई महिलाओं ने कहा कि उन्हें अधिकारियों के सुरक्षा संबंधी शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई करने का भरोसा है। 69 फीसदी महिलाओं ने कहा कि मौजूदा सुरक्षा प्रयास कुछ हद तक पर्याप्त हैं, जबकि 30 प्रतिशत से ज्यादा ने महत्वपूर्ण कमियों का जिक्र किया। केवल 65 फीसदी ने 2023-2024 के दौरान इसमें वास्तविक सुधार आने की बात कही। ‘एनएआरआई-2025' के अनुसार, “सर्वेक्षण में शामिल हर तीन में से दो महिलाएं उत्पीड़न की शिकायत नहीं करती हैं, जिसका मतलब यह है कि एनसीआरबी (राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो) के पास अधिकांश घटनाएं दर्ज ही नहीं होतीं।” इसमें अपराध के आंकड़ों को एनएआरआई जैसे धारणा-आधारित सर्वेक्षणों के साथ एकीकृत करने का आह्वान किया गया है।


खुद को  सीमित कर लेती हैं महिलाएं

 राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने ‘एनएआरआई-2025' जारी करते हुए कहा कि सुरक्षा को केवल कानून-व्यवस्था के मुद्दे के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह महिलाओं के जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती है, चाहे वह उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य, कार्य के अवसर और आवागमन की स्वतंत्रता हो। उन्होंने कहा कि जब महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं, तो “वे खुद को सीमित कर लेती हैं, और महिलाओं का खुद को सीमित कर लेना न केवल उनके अपने विकास, बल्कि देश के विकास के लिए भी ठीक नहीं है।” 
 


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Content Writer

vasudha

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