शहीद भगत सिंह का आखिरी पैगाम, जानिए खत में क्या किया था बयान?

9/28/2020 5:22:38 PM

इतिहास के पन्नों को जब जब पलटा जाएगा उन पर भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव का नाम पहले नंबर पर होगा। यह तीन नौजवान अपने जीवन, परिवार और खुद की खुशियों की परवाह न करते हुए हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर लटक गए। आज जरूरत है आप अपने बच्चों को उनकी दी गई इस कुरबानी पर जरूर बताएं कि भला ये तीनों युवक कौन थे... आइए नजर डालते हैं इनके जीवन पर....

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सबसे पहले बात करते हैं भगत सिंह के बारे में, भगत सिंह का जन्म पाकिस्तान के बंगा गांव में हुआ। बचपन से ही उन्हें देशभक्ति से जुड़े कार्यक्रमों में जाना पसंद था। जलियांवाले बाग हत्याकांड के बाद से तो जैसे उन्होंने ठान ही लिया था कि अब वह अपने हिंदुस्तान को अंग्रेजों से आजाद करवाकर ही रहेंगे। जैसे जैसे भगत सिंह बड़े होते गए वैसे-वैसे मन में देश के प्रति आजादी का प्रेम भी बढ़ता चला गया। कहते हैं न आप जीवन में जिस चीज की चाह रखते हैं, अगर वह चाह सच्ची है तो भगवान उसे पूरा करने के लिए रास्ते खोलते ही रहते हैं। National College Of Arts, Lahore में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात राजगुरु और सुखदेव से हुई। 

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राजगुरू महाराष्ट्र के रहने वाले थे और सुखदेव जी का जन्म लुधियाना पंजाब का था।भगत सिंह ने जब जलियांवाले बाग में हुए हत्याकांड को देखा , तब उनकी उम्र लगभग 10-12 साल थी। भगत सिंह देर रात तक देशभक्ति से जुडे़ कार्यक्रमों में बैठे रहते।उन्हें शायरी करने का काफी शौंक था। जिस दिन भगत सिंह को फांसी पर चढ़ना था, तो उस वक्त भी वह कुछ लिख रहे थे। आइए जानते हैं क्या लिखा था उन्होंने अपने आखिरा खत में...

 

भगत सिंह की आखिरी शायरी असल में उनके खुद के ख्याल थे, जिसमें उन्होंने लिखा कि जीने का दिल हर किसी का होता है। मेरा भी दिल था कि मैं अपनी मां का हर सपना पूरा करू., मगर इस घुटन और गुलामी भरे माहौल में मैं नहीं जी सकता।मैं दुनिया में अपना नाम रौशन करने के लिए नहीं बल्कि नौजवानों में देश के प्रति सच्ची भावना और गुलामों वाली जिंदगी न जीने की सीख दिए जा रहा हूं। मैं आशा करका हूं मेरी कुरबानी व्यर्थ नहीं जाएगी।


Harpreet

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